भगवान शंकर संबंधी 10 महत्वपूर्ण सवाल, जो आप नहीं जानते होंगे...

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को आदि और अनादि माना गया है। हिन्दू धर्म में वे सर्वोच्च हैं। उनका किसी भी तरह से जाने और अनजाने अपमान करने वाले का जीवन सही नहीं रहता। हम यहां बात करेंगे त्रिदेवों में (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) से एक की जो माता पार्वती के पति हैं जिन्हें शंकर कहा जाता है और जिनको भक्तलोग भी कहते हैं।
महा+ईश को मिला कर महेश शब्द बनता है। महा का अर्थ है महानतम, सर्वोच्च या सबसे बड़ा और ईश का अर्थ है ईश्वर, देव। महा+ईश= महेश वा महादेव। का महेश स्वरुप 'महेश परिवार (शिव परिवार)' के रूप में दर्शाया जाता है। महेश्वरी समाज की उत्पत्ति इसी से होती है।

शंकर के संबध में विधर्मियों ने कुछ सवाल खड़े किए हैं तो कुछ धर्मियों ने भी उनके संबंध में भ्रम को फैलाने का पाप किया है। दोनों ही क्षमा योग्य नहीं है। आओ आज हम आपको भगवान शिव के संबध में कुछ महत्वपूर्ण सवालों के जवाब देते हैं।

1. प्रश्न : क्या ‍भगवान शंकर भांग का सेवन करते थे या किसी भी प्रकार का नशा करते थे?
उत्तर : इसका जवाब है नहीं। शिव पुराण सहित किसी भी ग्रंथ में ऐसा नहीं लिखा है कि भगवान शिव भांग का सेवन करते थे।

बहुत से लोगों ने भगवान शिव के ऐसे ‍भी चित्र बना लिए हैं जिसमें वे चिलम पीते हुए नजर आते हैं। यह दोनों की कृत्य भगवान शंकर का अपमान करने जैसा है। यह भगवान शंकर की छवि खराब किए जाने की साजिश है।
2. प्रश्न : क्या भगवान शंकर को नहीं मालूम था कि गणेशजी मेरे पुत्र हैं। फिर उन्होंने अनजाने में उनकी गर्दन काट दी और फिर जब उन्हें मालूम पड़ा तो उन्होंने उस पर हाथी की गर्दन जोड़ दी? जब शिव यह नहीं जान सके कि यह मेरा पुत्र है तो फिर वह कैसे भगवान?
उत्तर : कुछ विधर्मी (अपना धर्म छोड़कर दूसरे का धर्म अपनाने वाला) इस तरह का प्रश्न करके हिन्दुओं के मन में भगवान शिव के प्रति भ्रम और संदेह डालना चाहते हैं। उनका तर्क है कि यदि शिव अपने पुत्र को नहीं पहचान सकें तो वे मेरी मुसीबतों में मुझे कैसे पहचानेंगे?

इसका जवाब है कि भगवान शिव के संपूर्ण चरित्र को पढ़ना जरूरी है। उनके जीवन को लीला क्यों कहा जाता है? लीला उसे कहते हैं जिसमें उन्हें सबकुछ मालूम रहता है फिर भी वे अनजान बनकर जीवन के इस खेल को सामान्य मानव की तरह खेलते हैं। लीला का अर्थ नाटक या कहानी नहीं। एक ऐसा घटनाक्रम जिसकी रचना स्वयं प्रभु ही करते हैं और फिर उसमें इन्वॉल्व होते हैं। वे अपने भविष्य के घटनाक्रमों को खुद ही संचालित करते हैं। दरअसल, भविष्य में होने वाली घटनाओं को अपने तरह से घटाने की कला ही लीला है। यदि भगवान शिव ऐसा नहीं करते तो आज गणेश प्रथम पुज्यनीय देव न होते और न उनकी गणना देवों में होती।

विशेष दार्शनिक क्षेत्रों में माना जाता है कि लीला ऐसी वृत्ति है जिसका आनन्द प्राप्ति के सिवा और कोई अभिप्राय नहीं। इसीलिए कहते हैं सृष्टि और प्रलय सब ईश्वर की लीला ही है। अवतार धारण करने पर इस लोक में आकर भगवान् जो कृत्य करते हैं, उन सब की गिनती भी लीलाओं में ही होती है। लोक व्यवहार में वे सब कृत्य जो भगवान् के किसी अवतार के कार्यों के अनुकरण पर अभिनय या नाटक के रूप में लोगों को दिखाए जाते हैं।

भगवान राम को सभी कुछ मालूम था कि क्या घटनाक्रम होने वाला है। उन्हें मालूम था कि मृग के रूप में आया यह राक्षस कौन है। लेकिन सीता ने उनकी नहीं मानी और तब उन्होंने लक्ष्मण को सीता के पहरे के लिए छोड़ कर मृग के पीछे चले गए।

इसी तरह भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि तू किसी को नहीं मार रहा है। यह सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। अब तो यह बस खेल है। बर्बरिक से जब महाभारत का वर्णन पूछा गया तो उसने कहा कि मुझे तो दोनों ही ओर से श्रीकृष्ण ही यौद्धाओं को मारते हुए नजर आ रहे थे।

3. प्रश्न : क्या भगवान शिव ही शंकर, महेश, रुद्र, महाकाल, भैरव आदि हैं?
उत्तर : त्रिदेवों में से एक महेश को ही भगवान शिव या शंकर भी कहा जाता है। वेदों में रुद्रों का जिक्र है। कहते हैं कि उन्हीं में से एक महाकाल हैं। दूसरे तारा, तीसरे बाल भुवनेश, चौथे षोडश श्रीविद्येश, पांचवें भैरव, छठें छिन्नमस्तक, सातवें द्यूमवान, आठवें बगलामुख, नौवें मातंग, दसवें कमल। अन्य जगह पर रुद्रों के नाम:- कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, आपिर्बुध्य, शम्भू, चण्ड तथा भव का उल्लेख मिलता है।

शिव, शंकर, महादेव : शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं– शिव, शंकर, भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है।

शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विलय के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।

अन्य अंशावतार- इन अवतारों के अतिरिक्त शिव के दुर्वासा, हनुमान, महेश, वृषभ, पिप्पलाद, वैश्यानाथ, द्विजेश्वर, हंसरूप, अवधूतेश्वर, भिक्षुवर्य, सुरेश्वर, ब्रह्मचारी, सुनटनतर्क, द्विज, अश्वत्थामा, किरात और नतेश्वर आदि अवतारों का उल्लेख भी 'शिव पुराण' में हुआ है।

कहते हैं कि शिव ने स्वयं से अपनी शक्ति को पृथक किया तथा शिव एवं शक्ति ने व्यवस्था हेतु एक कर्ता पुरुष का सृजन किया जो विष्णु कहलाए। भगवान विष्णु के नाभि से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। विष्णु ने ब्रह्मदेव को निर्माण का कार्य सौंपकर स्वयं पालन का कार्य वहन किया। फिर स्वयं शिव के अंशावतार शंकर ने सृष्टी के विलय के कार्य का वहन किया। कई जगहों पर शंकर को ही 'महेश' कहा जाने लगा। जैसे की ब्रम्हा, विष्णु और महेश। वस्तुतः शंकर यह अर्थात शिव का अंशावतार है। महारुद्र शिव के कुछ विशेष अंशावतारों को रुद्रावतार के नाम से जाना जाता है, जैसे हनुमानजी को रुद्रावतार कहा जाता है। हनुमान ग्यारहवें रुद्रावतार माने जाते हैं। कई बार रुद्रावतार के लिए केवल 'रूद्र' इस शब्द का ही प्रयोग किया जाता है जोकि गलत है, जैसे की कई बार हनुमान को ग्यारहवां रुद्र कहा जाता है जबकि वे ग्यारहवें रुद्रावतार है। उसी तरह शिव के कई अवतार हुए जिनमें से एक महेश को ही माता पार्वती का पति कहा गया है।

भैरव भी कई हुए हैं जिसमें से काल भैरव और बटुक भैरव दो प्रमुख हैं। माना जाता है कि (नंदी) और महाकाल शिव के द्वारपाल हैं। रुद्र देवता शिव की पंचायत के सदस्य हैं। वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है।

शिव के द्वारपाल:- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल।

शिव पंचायत के देवता:- 1.सूर्य, 2.गणपति, 3.देवी, 4.रुद्र और 5.विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

शिव पार्षद:- जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं ‍उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि ‍शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी।
शिव गण:- भगवान शिव के गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से ‘वीरभद्र’ नामक गण उत्पन्न किया।

इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे- भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं।

सप्तऋषि गण शिव के शिष्य हैं:- शिव ने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए 7 ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के 7 बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन 7 रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं।

देवों के देव महादेव : देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं।

4. प्रश्न : क्या शिव स्वयंभू हैं?
उत्तर : एक तरह से भगवान शंकर स्वयंभू हैं क्योंकि उनकी उत्पत्ति निराकार रूप से हुई थी। स्कंद पुराण में कहा गया है- ब्रह्मा, विष्णु, महेश (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति महेश्वर अंश से ही होती है। भगवान शिव स्वयंभू हैं इस तथ्य को जानने के लिए वेद और पुराण पढ़ाना होंगे। दरअसल, शिव को ही ब्रह्मरूप, रुद्र, महेश, महाकाल, सदाशिव आदि संज्ञा दी जाने के कारण उन्हें स्वंभू माना गया। यद‍ि हम पार्वती के पति शंकर की बात कर रहे हैं तो वे भगवान तो हैं लेकिन परब्रह्म नहीं। परमेश्वर स्वरूप तो हैं लेकिन परमेश्वर नहीं। वे परमेश्वर के निराकर रूप से उत्पन्न हैं।

5. ‍‍ब्रह्मा, विष्णु और महेश का पिता कौन, जानिए....
शिव पुराण अनुसार परम ब्रह्म अर्थात एकाक्षर ब्रह्म। परम अक्षर ब्रह्म। वह परम ब्रह्म भगवान सदाशिव है। अर्वाचीन और प्राचीन विद्वान उन्हीं को ईश्‍वर कहते हैं। एकांकी रहकर स्वेच्छा से सभी ओर विहार करने वाले उस सदाशिव ने अपने विग्रह (शरीर) से शक्ति की सृष्टि की, जो उनके अपने श्रीअंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी। सदाशिव की उस पराशक्ति को प्रधान प्रकृति, गुणवती माया, बुद्धितत्व की जननी तथा विकाररहित बताया गया है। वह शक्ति अम्बिका (पार्वती या सती नहीं) कही गई है। उसको प्रकृति, सर्वेश्वरी, त्रिदेवजननी (ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता), नित्या और मूल कारण भी कहते हैं। सदाशिव द्वारा प्रकट की गई उस शक्ति की 8 भुजाएं हैं। पराशक्ति जगत जननी वह देवी नाना प्रकार की गतियों से संपन्न है और अनेक प्रकार के अस्त्र शक्ति धारण करती है।

गीताप्रेश गोरखपुर द्वारा प्रकाशित देवी भागवत पुराण के पहले स्कंथ में नारदजी से कहते हैं कि तुम जो पूछ रहे हो ठीक यही प्रश्न मेरे पिताजी ब्रह्मा ने देवाधिदेव श्रीहरि (विष्णु) से जो जगत के स्वामी हैं से किया था। लक्ष्मीजी उन देवाधिदेव (देवो के देव) की सेवा में रहती हैं। कौस्तुभ मणि से जो सुसोभित हैं, जो शंख, गदा और चक्र लिए हुए हैं और जिनकी चार भुजाएं हैं। वे पितांबर धारण करते हैं। वक्ष स्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह चमकता रहता है।

एक बार इन देवाधिदेव को तपस्या करते हुए देखकर ब्रह्माजी ने इनसे पूछा कि भगवन आप दो सभी देवों के देव हैं। आप सारे संसार के शासक होते हुए भी समाधि लगाए बैठे हैं? आप किस भगवान का ध्यान कर रहे हो?

ब्रह्माजी के विनित वचन सुनकर भगवान श्रीहरि उनसे कहने लगे- देवता, दानव और मानव सभी यह जानते हैं कि तुम सृष्‍टि करते हो, मैं पालन करता हूं और शंकर (रुद्र) संहार किया करते हैं। किंतु फिर भी वेद के पारगामी पुरुष अपनी युक्ति से यह सिद्ध करते हैं कि रचने, पालने और संहार करने की ये योग्यता जो हमें मिली है इसकी अधिष्‍ठात्री शक्तिदेवी है। उस शक्ति के अधिन होकर ही मैं इस शेषनाग की शय्या पर सोता और सृष्टि करने का अवसर आते ही जाग जाता हूं। मैं सदा तप करने में लगा रहता हूं क्योंकि उस शक्ति के शासन से कभी मुक्त नहीं रह सकता। कभी अवसर मिलता है तो लक्ष्मी के साथ अवसर बिताने का सौभाग्य प्राप्त होता है। मैं कभी तो दानवों के साथ युद्ध करता रहता हूं और अखिल जगत को भय पहुंचाने वाले दैत्यों के विकराल शरीर को शांत करना मेरा परम कर्तव्य हो जाता है। मैं सब प्रकार से उन्हीं शक्ति के अधिन रहता हूं और उन्हीं का कार्य किया करता हूं। ब्रह्माजी मेरी जानकारी में उन भगवती शक्ति से बढ़कर दूसरे कोई देवता नहीं।

देवीभागवत पुराण में दुर्गाजी कहती हैं कि देवी हिमालय को ज्ञान देते हुए कहती है कि एक सदाशिव ब्रह्म की साधना करो। जो परम प्रकाशरूप है। वही सब के प्राण और सबकी वाणी है। वही परम तत्व है। उसी अविनाशी तत्व का ध्यान करो। वह ब्रह्म ओंकारस्वरूप है और वह ब्रह्मलोक में स्थित है।

6. प्रश्न : क्या शिवलिंग के रूप में महेश की ही पूजा होती है?
उत्तर : शिव के संबंध में हम उपर लिख आए हैं। इससे स्पष्‍ट हो जाता है कि शिव कौन और महेष कौन हैं। हालांकि सभी शिव के ही अंश और रूप हैं। इसीलिये भक्तों ने शिवलिंग की पूजा को महेष (शंकर) आदि से जोड़कर भी देखा। जबकि शिवलिंग की पूजा का अर्थ है उस एक निराकर ब्रह्म की ज्योतिरूप में या पिंड रूप में पूजा एवं प्रार्थना करना।

7. प्रश्न : क्या शिवलिंग का अर्थ शिव का शिश्न है?
उत्तर : आमतौर पर शिवलिंग को गलत अर्थों में लिया जाता है, जो कि अनुचित है या उचित यह हम नहीं जानते। वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन: सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है।

वस्तुत: यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। यही सबका आधार है। बिंदु एवं नाद अर्थात शक्ति और शिव का संयुक्त रूप ही तो शिवलिंग में अवस्थित है। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना की जाती है।

ब्रह्मांड का प्रतीक ज्योतिर्लिंग : शिवलिंग का आकार-प्रकार ब्रह्मांड में घूम रही हमारी आकाशगंगा की तरह है। यह शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड में घूम रहे पिंडों का प्रतीक है, कुछ लोग इसे यौनांगों के अर्थ में लेते हैं और उन लोगों ने शिव की इसी रूप में पूजा की और उनके बड़े-बड़े पंथ भी बन गए हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने धर्म को सही अर्थों में नहीं समझा और अपने स्वार्थ के अनुसार धर्म को अपने सांचे में ढाला।

शिवलिंग का अर्थ है भगवान शिव का आदि-अनादी स्वरूप। शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है। धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है। वातावरण सहित घूमती धरती या सारे अनन्त ब्रह्माण्ड (ब्रह्माण्ड गतिमान है) का अक्स/धुरी ही लिंग है। पुराणों में शिवलिंग को कई अन्य नामों से भी संबोधित किया गया है जैसे- प्रकाश स्तंभ लिंग, अग्नि स्तंभ लिंग, उर्जा स्तंभ लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ लिंग आदि। लेकिन बौद्धकाल में धर्म और धर्मग्रंथों के बिगाड़ के चलते लिंग को गलत अर्थों में लिया जाने लगा जो कि आज तक प्रचलन में है।

शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।

ज्योतिर्लिंग : ज्योतिर्लिंग उत्पत्ति के संबंध में पुराणों में अनेक मान्यताएं प्रचलित हैं। वेदानुसार ज्योतिर्लिंग यानी 'व्यापक ब्रह्मात्मलिंग' जिसका अर्थ है 'व्यापक प्रकाश'। जो शिवलिंग के 12 खंड हैं। शिवपुराण के अनुसार ब्रह्म, माया, जीव, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी को ज्योतिर्लिंग या ज्योति पिंड कहा गया है।

8. प्रश्न : शिव को अर्द्धनारीश्वर क्यों कहा जाता है?
उत्तर : शिव को अर्द्धनारीश्वर कहे जाने का अर्थ यह नहीं है कि शिव आधे पुरुष ही हैं या उनमें संपूर्णता नहीं। शिव आधे होते हुए भी पूरे हैं। इस सृष्टि के आधार और रचयिता यानी स्त्री-पुरुष शिव और शक्ति के ही स्वरूप हैं। इनके मिलन और सृजन से यह संसार संचालित और संतुलित है। दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। नारी प्रकृति है और नर पुरुष। यह बताता है कि शिव जब शक्ति युक्त होता है तभी समर्थ होता है। शक्ति के अभाव में शिव ‘शिव’ न होकर ‘शव’ रह जाता है।

9. प्रश्न : शिव पर बेल पत्र क्यों चढ़ाए जाते हैं?
उत्तर : पुराण में एक शिकारी की कथा है। एकबार उसे जंगल में देर हो गई। तब उसने एक बेल वृक्ष पर रात बिताने का निश्चय किया। जगे रहने के लिए उसने एक तरकीब सोची। वह सारी रात एक-एक पत्ता तोड़कर नीचे फेंकता रहा। कथानुसार, बेल के पत्ते शिव को बहुत प्रिय हैं। बेल वृक्ष के ठीक नीचे एक शिवलिंग था।

शिवलिंग पर प्रिय पत्तों का अर्पण होते देख शिव प्रसन्न हो उठे, जबकि शिकारी को अपने शुभ काम का अहसास न था। उन्होंने शिकारी को दर्शन देकर उसकी मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। कथा से यह साफ है कि शिव कितनी आसानी से प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महिमा की ऐसी कथाओं और बखानों से पुराण भरे पड़े हैं।
10. प्रश्न : क्या है शिवरात्रि और महाशिवरात्रि?
उत्तर : यूं तो शिव की उपासना के लिए सप्ताह के सभी दिन अच्छे हैं, फिर भी सोमवार को शिव का प्रतीकात्मक दिन कहा गया है। इस दिन शिव की विशेष पूजा-अर्चना करने का विधान है। हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते हैं। लेकिन फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी पर पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है, जिसे बड़े ही हषोर्ल्लास और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

शिवरात्रि बोधोत्सव है। ऐसा महोत्सव, जिसमें अपना बोध होता है कि हम भी शिव का अंश हैं, उनके संरक्षण में हैं। माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में इसी दिन आधी रात में भगवान शिव का निराकार से साकार रूप में (ब्रह्म से रुद्र के रूप में) अवतरण हुआ था। ईशान संहिता में बताया गया है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की रात आदि देव भगवान श्रीशिव करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाले लिंगरूप में प्रकट हुए।

ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चंदमा सूर्य के नजदीक होता है। उसी समय जीवनरूपी चंदमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। इसलिए इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने का विधान है।

प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए ब्रह्मांड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म कर देते हैं। इसलिए इसे महाशिवरात्रि या जलरात्रि भी कहा गया है। इस दिन भगवान शंकर की शादी भी हुई थी। इसलिए रात में शंकर की बारात निकाली जाती है। रात में पूजा कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेल पत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।


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