साहित्य 2010 : खट्टा ज्यादा, मीठा कम

बरसते रहे विवादों के बादल...

स्मृति आदित्य|
साहित्य शब्द के अभिप्राय( जिसमें सबका हित हो) की दृष्टि से अगर बीते साल के साहित्य-संसार पर नजर डालें तो खट्टा या कहें कि कड़वा ज्यादा नजर आता है। बीते साल साहित्य जगत में विवादों की कालिमा छाई रहीं। महात्मा गाँधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूतिनारायण राय ने 'नया ज्ञानोदय' को दिए साक्षात्कार में शर्मनाक स्त्री विरोधी टिप्‍पणी की। इस बात की पूरे समाज ने एक स्वर में भर्त्सना की। वहीं बुकर अवॉर्ड विजेता अरुंधति राय ने कश्मीर को भारत का हिस्सा ना बता कर सस्ता प्रचार हासिल करने की चेष्टा की। सम्मान और पुरस्कार की परंपरा जारी रही वहीं कुछ नामचीन हस्ताक्षर हमसे बिछुड़ गए।

वीसी विभूति का विवाद व्याप्त रहा
एक कुलपति जो साहित्यकार भी कहे जाते हैं। विभूतिनारायण राय के नाम से जाने जाते हैं। महात्मा गाँधी जैसे महापुरुष के नाम से स्थापित अंतरराष्‍ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा की बागडोर इनके हाथ में है। से प्रकाशित 'नया ज्ञानोदय' में एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आजकल लेखिकाओं में ये साबित करने की होड़ लगी है कि उनसे बड़ी 'छिनाल' कोई नहीं है। राय ने इसके अलावा भी कई सारी आपत्तिजनक बातें कहीं हैं। राय के इस बयान के बाद लेखिकाओं सहित समूचे साहित्य समाज ने उन्हें यूनिवर्सिटी में वाइस चाँसलर के पद से हटाने की माँग की। विभूति नारायण राय 1975 बैच के आईएएस ऑफिसर भी रह चुके हैं और 2008 में उन्हें महात्मा गाँधी यूनिवर्सिटी का कुलपति बनाया गया था। इस अश्लील टिप्पणी पर संज्ञान लेते हुए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने विभूति नारायण राय के खिलाफ कार्रवाई की।
मानव संसाधन मंत्रालय ने कहा, 'यदि यह सही है तो यह संपूर्ण नारी समाज का अपमान है। महिलाओं के खिलाफ ऐसी टिप्पणी उनके सम्मान को ठेस पहुँचाने वाली और मर्यादा के प्रतिकूल है।'

महिला साहित्यकारों के बारे में की गई घिनौनी टिप्पणी के सिलसिले में महिलाओं का एक दल मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल से मिला। इससे पहले विभूतिनारायण राय कपिल सिब्‍बल से मिले। सूत्रों के मुताबिक सिब्‍बल ने उनको धैर्यपूर्वक सुनने के बाद कहा कि आप एक संवैधानिक पद पर हैं और इस मामले में काफी कंट्रोवर्सी हो चुकी है, लिहाजा आप अनकंडीशनल माफीनामा लिख कर दें। माफीनामे में लिखें कि मैं अपने शब्‍दों के लिए माफी चाहता हूँ और आगे इस तरह के लेखन, इस तरह के बयान से बचूँगा।
विभूतिनारायण राय ने कपिल सिब्‍बल से गुजारिश की कि वे एक लेखक हैं और भविष्‍य में लेखन को लेकर ऐसी सतर्कता की गारंटी मुझसे न लें। इस पर कपिल सिब्‍बल ने कहा कि फिर आपको लेखक ही रहना चाहिए, वीसी नहीं होना चाहिए।

हार कर विभूतिनारायण राय ने माफी माँगी और उन्हें माफी मिल गई। मानव संसाधन मंत्री ने कहा कि हम वीसी को बर्खास्त नहीं कर सकते। यह विजिटर के अधिकार की बात है। पहली नजर में इस विवाद का पटाक्षेप हुआ। बाजार से के अंक उठा लिए गए। लेकिन इस सारे प्रकरण में कई साहित्यकारों की दोहरी मानसिकता खुलकर सामने आई जब वे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से विभूतिनारायण के पक्ष में खड़े नजर आए।
दूसरी तरफ भारतीय ज्ञानपीठ, जो लेखकों के सम्मान और उनके अधिकारों की रक्षा के प्रतीक के रूप में जाना जाता है, की प्रतिष्ठा पर भी प्रश्नचिन्ह लगे। संपादक रवीन्द्र कालिया के विरोध में भी खासा माहौल बना। ज्ञानपीठ ने विभूति नारायण राय को अवर समिति से निकाल दिया और उनके स्थान पर नामवर सिंह को रखा गया।

ज्ञानपीठ के न्यासियों की बैठक में इस कांड की वजह से उत्पन्न हालात पर चर्चा हुई। उससे ठीक पहले अशोक वाजपेयी ने ज्ञानपीठ से अपनी दोनों पुस्तकें वापस लेकर रवींद्र कालिया के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव बढ़ाया। उनसे पहले गिरिराज किशोर और प्रियंवद ने भी अपनी पुस्तकें वापस लीं। अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता को पत्र भेज कर कहा है कि उन्होंने नैतिक आधार पर ज्ञानपीठ से अपने रिश्ते तोड़े हैं।
बहरहाल, 2010 का साल भारतीय साहित्य-संसार के लिए इस प्रकरण की वजह से विक्षुब्ध करने वाला रहा। हमारे साहित्यकार आधुनिक होने की त्वरा में मर्यादा को कैसे कूड़ेदान में डाल रहे हैं और लेखिकाओं के प्रति उनके भीतर किस तरह के विकार पल रहे हैं, इस घटनाक्रम ने इसी चिंतन के लिए विवश कर दिया है।

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