ऐसा रोज होता है महिलाओं के साथ


बात किसी बाबा-जोगी, गुरु, संबंधी, सहकर्मी या अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए शोषण की ही नहीं, बल्कि बात है महिलाओं या युवतियों के प्रति उस सोच, विचार, नजरिये और भावों की, जो बार उन्हें पीड़िता की श्रेणी में खड़ा करते हैं। कभी खूबसूरती, कभी सिर्फ रंग रूप, शारीरिक सौष्ठव जिसे तथाकथित "हॉट" शब्द से नवाजा जाता है, कभी अहम या स्वाभिमानी स्वभाव के कारण, तो कभी अपने कपड़ों के कारण उसके प्रति आपका नजरिया और भाव बदल जाते हैं। लेकिन तब का क्या, जब उनके पास न रंग-रूप होता है, न शारीरिक सौष्ठव और ना ही भद्दे कपड़े...। मेरा मतलब यहां नवजात से लेकर कम उम्र की मासूम बच्चियों और उम्रदराज महिलाओं से है जो किसी भी तरह से यौन भावनाओं को पैदा करने में कोई किरदार नहीं निभाती... तब.... तब कहां से आती है उनके प्रति घृणित सोच... यह महिलाओं से ज्यादा पुरुषों के लिए सोचने का विषय है... क्योंकि इन परिस्थियों में बदलाव के लिए उन्हें ही इस सोच की जिम्मेदारी लेनी होगी।
हर दिन कहीं न कहीं कोई महिला, युवती, मासूम और यहां तक कि उम्रदराज महिलाएं शोषण का शिकार होती हैं। कभी बस की भीड़ के बीच उन्हें आगे-पीछे, दाएं या बाएं से उन्हें छूने की कोशिश की जाती है, तो कभी देखने वाले की सिर्फ नजरें ही आत्मा को भेद कर रख देती हैं और इसके लिए शर्मसार भी उसे ही होना पड़ता है सिर झुकाकर या आंखें फेरकर। कभी आते-जाते रास्ते चलते हुए उसके अंगों को छूने का क्षणिक प्रयास उसे शर्मसार कर जाता है, तो कभी हर दिन बस स्टॉप से लेकर घर तक उसका पीछा करती नजरें उसे भय से भर देती हैं।
स्कूल में बढ़ने वाली बच्चियां न जाने कितनी बार शिक्षक द्वारा पीठ पर हाथ फेरने को अपनी शाबासी समझ गौरवान्वित होती हैं, तो कभी असहज। कभी घर पर आया कोई रिश्तेदार का गोद में बैठाकर दुलार करना उसे अच्छा लगने के बजाए दूर रहने पर मजबूर करता है, तो कभी घर में ही पिता, भाई या चाचा या नौकर से वह असहज महसूस करती है क्योंकि रात को सोते वक्त उसने इन रिश्तों को अपने आसपास अलग तरह से प्यार करते पाया, और मां को न बताने की चेतावनी देते भी।

कभी-कभी तो उसके चेहरे पर सिर्फ इसलिए तेजाब डाल दिया जाता है कि उसने प्रेम प्रस्ताव स्वीकार न कर, जीवन में अपना लक्ष्य प्राप्त करने का हवाला दिया होता है, जो कथित प्रेमी को नागवार गुजरता है, या फिर वह नहीं चाहता कि उसके सिवा दुनिया में कोई और उसकी पसंद की लड़की को देख सके।

एक वक्त इन खबरों को पढ़ना सुनना अचंभित, चिंतित और या शर्मसार करता था लेकिन हर दिन घटती इस तरह की घटनाएं आम हैं और चिंता की सीमा को पार कर चुकी हैं। अब सच को बनकाब करती ये खबरें शर्म से ज्यादा क्रोध या फिर रोमांच को जन्म देती हैं, इसमें कोई शक नहीं।

हालांकि ऐसा नहीं है कि हर बार वह चुप रहती है। अब वह भी आवाज उठाना जानती है, प्रेम और में अंतर करना समझती है और न्याय की लड़ाई लड़ना भी। लेकिन उससे भी पहले उसे एक लड़ाई खुद से लड़नी होती है, फिर अपनों से और फिर सबसे बड़ी लड़ाई दुनिया से। अंत में अगर वह खुद में बाकी बच जाए तो न्याय की लड़ाई भी लड़ लेती है... लेकिन सवाल यहां न्याय के साथ-साथ उसके प्रति उपजती घृणित, अपमानित करती भावनाओं का है। क्या इनसे आजादी संभव है?

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