चुनाव परिणामों में आश्चर्य के तत्व नहीं

अवधेश कुमार|
परिणाम आने के पहले एक्जिट पोल ने इसकी दिशा दे दी थी। इन चुनाव परिणामों से केवल उनको ही आश्चर्य हुआ होगा, जो धरातली वास्तविकता से परे अपने राजनीतिक विचारों के मद्दे नजर पूर्व आकलन कर रहे थे। सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश को लें तो भाजपा की ऐसी विजय से बहुत लोग विस्मित हैं। वे यह नहीं सोचते कि परिवार और पार्टी में इतनी बड़ी कलह तथा कानून और व्यवस्था के स्तर पर विफल सरकार को जनता क्यों दोबारा सत्ता में वापस लाएगी, जबकि उसके पास विकल्प मौजूद हैं। सत्ता में रहते वक्त हमेशा नेतागण अपनी क्षमता और लोकप्रियता का जरुरत से ज्यादा आकलन करते हैं तथा उनके आसपास के लोग उनको और आकाश में चढ़ाने की भूमिका निभा देते हैं। 

के साथ ऐसा ही हुआ है। उनके सबसे बड़े सलाहकार रामगोपाल यादव ने उन्हें प्रधानमंत्री मटेरियल तक घोषित कर दिया। चुनाव में जय-पराजय होती रहती है, लेकिन अखिलेश यादव ने जिस ढंग से विद्रोह करके पूरी पार्टी को अपने एकछत्र साम्राज्य में लाया तथा स्वयं एवं अपनी पत्नी डिंपल यादव को मुख्य प्रचारक बना दिया, उसके पीछे भाव तो यही था न कि इन दोनों की लोकप्रियता इतनी है कि विजय के लिए और किसी की आवश्यकता भी नहीं। इसमें उन्होंने अपने पिता तक को चुनाव प्रचार से वानप्रस्थ लेने को विवश कर दिया। कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी के गठबंधन का भी कोई तार्किक आधार नहीं था। यह सोचना कि इससे मुस्लिम मतों के बंटवारे को रोका जा सकेगा, गलत आकलन था। कारण, कांग्रेस तो पिछले 28 वर्षों से अपने जनाधार के लिए प्रदेश में तरस रही है। मुसलमान उसके साथ होते तो उसकी 2012 एवं उसके पूर्व 2007 में वैसी दुर्दशा नहीं हुई होती। कांग्रेस के पास ऐसा जनाधार है भी नहीं कि इसे किसी पार्टी को स्थानांतरित करा सके। 
 
वास्तव में इन सब हालातों में यदि अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की विजय होती, तो यह आश्चर्य की बात होती। जनता को यदि समाजवादी पार्टी को विजयी नहीं बनाना था, तो उसके पास दो विकल्प थे, भाजपा एवं बसपा। बसपा का शासन लोगों ने 2007-12 देखा है। उसमें ऐसा कुछ नहीं था जिससे उसकी तरफ बहुमत का आकर्षण हो। दूसरी ओर भाजपा है, जिसने परिवर्तन का नारा दिया। हर चुनाव में एक प्रमुख कारक होता है जो राज्यव्यापी भूमिका निभाता है और अन्य कारक या उपकारक उसके ईर्द-गिर्द जुड़ते जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने परिवर्तन का जो नारा दिया वह लोगों को अपील करने लगा। जब मोदी कहते थे कि उत्तर प्रदेश के पास सब कुछ है लेकिन अच्छी सरकार नहीं है, तो यह लोगों को अपील करता था। इसने एक मनोवैज्ञानिक स्थिति कायम की। वैसे भी 18 से 30 वर्ष के युवा मतदाताओं ने केन्द्र में भाजपा की सरकार देखी है, 2002 तक की सरकार को लेकर उनका कोई परिपक्व अनुभव नहीं है। इस कारण भी भाजपा की ओर उनका आकर्षण स्वाभाविक था। अगर लोगों को परिवर्तन करना था, तो फिर बसपा से भाजपा उनको हर दृष्टि से बेहतर विकल्प लगा। इससे पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी के प्रति लोगों का विश्वास अभी कायम है। उनकी लोकप्रियता बनी हुई है।
 
भाजपा ने विजय के लिए अगड़ों और गैर यादव अति पिछड़ी जातियों का समीकरण बनाने की जो कोशिश की वह वाकई सफल रही है। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में एक जाति विशेष को पुलिस प्रशासन में जरुरत से ज्यादा तरजीह देने से अन्य जातियां नाराज थीं एवं उनके पास भाजपा विकल्प में रूप में था। हम यह न भूलें कि बसपा में जो विद्रोह हुआ और उससे अति पिछड़े निकले उससे उसकी छवि को धक्का लगा। बसपा ने आरंभ में मुसलमानों एवं दलितों का समीकरण बनाने की कोशिश की। मुसलमानों की आबादी के अनुपात से ज्यादा 100 टिकट दिए, जिससे दूसरी जातियां नाराज हुईं। जब मायावती को लगा कि खेल खराब हो रहा है तो उनने फिर पिछड़ जातियों का सम्मेलन आरंभ किया लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। वैसे भी जिन लोगों ने 2007 से 2012 के बीच उनका शासन देखा है उसमें कोई ऐसा आदर्श तत्व नहीं था, जिससे उनके प्रति बहुमत का आकर्षण हो। मुसलमानों ने भाजपा को हराने के लिए जो रणनीतिक आरंभ किया उसका असर भी हिन्दुओं पर हुआ और वह भी परिणाम में निर्णायक तत्व बन गया। सबसे अंत में 6ठें चरण के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का वाराणसी में जनदर्शन के नाम से रोड शो तथा उसके बाद अंतिम चरण के पूर्व दो दिनों तक वाराणसी में रहना, रोड एवं सभाए करना ऐसी रणनीति थी जिसने उसके लिए कभी भी अनुकूल न रहे पूर्वांचल में आलोड़न पैदा कर दिया। 
 
अन्य राज्यों में उत्तराखंड में पिछले चुनाव में केवल .66 प्रतिशत से कांग्रेस आगे थी। उसे बहुमत भी नहीं मिला था। तो यह परिणाम कभी भी बदल सकता था। हालांकि हरीश रावत ने चुनाव रणनीति में पूरी परिपक्वता का परिचय दिया, लेकिन उनकी पार्टी में जो भारी विद्रोह हो चुका था उसकी भरपाई जरा कठिन थी। भाजपा को भारी बहुमत मिला है। हरीश रावत की दोनों स्थानों से पराजय यह बताता है कि उनके एवं उनकी सरकार के खिलाफ कितना जन आक्रोश था। पंजाब में लोकसभा चुनाव के समय ही मोदी लहर के बावजूद अकाली एवं भाजपा का प्रदर्शन संतोषजनक नहीं था। आम आदमी पार्टी ने 33 विधानसभा सीटों पर तथा कांग्रेस ने 37 विधानसभा सीटों पर बढ़त पाई थी। उस समय आम आदमी पार्टी चरम लोकप्रियता पर थी। विधानसभा चुनाव आने के पूर्व ही उसकी पार्टी में विभाजन हो गया। वह मालवा क्षेत्र में सिमटी रह गई। इसके विपरीत कांग्रेस संगठन की दृष्टि से उससे आगे थी। वह मांझा और दोआबा में भी मजबूत थी। अकाली भाजपा सरकार के विरुद्व गुस्से का लाभ उठाने की हालत में वह ज्यादा थी। नवजोत सिंह सिद्धू का अंतिम समय में कांग्रेस में आना और चुनाव लड़ना भी उसके पक्ष में गया। सिद्धू भाजपा में रहते हुए चाहते थे कि उनको पंजाब में राजनीति करने दिया जाए, पार्टी अकाली से रिश्ता तोड़े तथा अकेले दम पर आगे बढ़े। पार्टी को यह स्वीकार नहीं था। हालांकि उनकी बात मानी जाती तो भाजपा आज संभवतः बेहतर स्थिति में होती। जो भी हो पंजाब में कांग्रेस की विजय उसके लिए प्राणवायु के समान है। 2013 के बाद पहली बार कहीं वह अपनी बदौलत विजय पाने में सफल हुई है। हालांकि इसमें कैप्टन अमरिंदर सिंह की भूमिका बहुत बड़ी है जिनने लोगों से भावुक अपील की थी यह उनके जीवन का अंतिम चुनाव है।
 
अन्य दो राज्यों गोवा एवं मणिपुर में को लें तो वहां भी परिणाम अपेक्षा के विपरीत नहीं है। गोवा में  संघ के पुराने प्रचार सुहास वेलिंगकर ने गोवा रक्षा मंच बनाया, शिवसेना एवं महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के साथ गठबंधन बनाया और वह भाजपा को कुछ नुकसान पहुंचाने में सफल रही है। वह बहुमत तक नहीं पहुंच पाई। आम आदमी पार्टी ने प्रचार तो बहुत किया लेकिन गोवा में परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों भाजपा एवं कांग्रेस के बीच पैठ बनाना उसके लिए कठिन था। इन दोनों पार्टियों का वहां पुराना संगठन है। यहां तक कि भाजपा वहां कैथोलिक ईसाइयों तक को अपनी नीतियों से साथ रखने में लंबे समय से सफल रही है। इस बार मनोहर पर्रिकर के मुख्यमंत्री न होने का असर था। किंतु सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस को होनी चाहिए कि आखिर भाजपा के शासन के विरुद्ध असंतोष का भी लाभ वह नहीं उठा सकी तथा वेलिंगकर के विद्रोह का भी। मणिपुर की ओर लौटें तो वहां के मतदाताओं के एक बड़े वर्ग को विकल्प की तलाश थी। पहले उसे विकल्प नहीं मिल रहा था। इस बार एक ओर नगा पीपुल्स फंट ने नागाओं को विकल्प दिया तथा दूसरी और भाजपा ने उत्तर पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर विकल्प देने की कोशिश की। जितनी संख्या में कांग्रेस के लोगों ने पार्टी का परित्याग कर भाजपा का दामन थामा था उससे लग रहा था कि मुख्यमंत्री इकराम ओबीबी सिंह के नेतृत्व को लेकर असंतोष है। नए जिला बनाने के विरुद्ध जो बंद हुआ वह भी कांग्रेस के खिलाफ गया। उसे वह परिणाम नहीं मिला जो 2012 में था। भाजपा की प्रदेश में इतनी बड़ी पैठ सामान्य नहीं है।

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