सिंहस्थ 2016 - क्या खोया क्या पाया


सिंहस्थ कुंभ महापर्व विशाल आध्यात्मिक आयोजन
 
> जिनकी उत्पत्ति स्वयंभू मानी है, सनातन हैं। ये अजन्मे हैं, इनकी मृत्यु नहीं होती। न आदि है न अंत, महाकाल का मंदिर आदि नगरी अवन्ती या आज उज्जैन में अवस्थित है। उज्जयिनी अपने नाम के अनुरूप वास्तविक अर्थों में विजयिनी है।> संस्कृत, पाली और प्राकृत साहित्य के उल्लेखों का ऐतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से अध्ययन करने पर प्रतीत होता है कि भारतीय संस्कृति में समाहित भारत के विभिन्न प्रदेशों की संस्कृतियों का यहां पर जन्म हुआ था।

सिंहस्थ कुंभ महापर्व एक विशाल आध्यात्मिक आयोजन है, जो मानवता के लिए जाना जाता है। इसके नाम की उत्पत्ति ‘अमरत्व का पात्र’ से हुई है। पौराणिक कथाओं में इसे ‘अमृत कुण्ड’ के रूप में जाना जाता है। कलश प्राप्त करने में संघर्ष में अमृत की कुछ बूंदें पृथ्वी पर हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में गिर गईं। ये बूंदें गंगा, यमुना, गोदावरी और शिप्रा नदियों में मिल गईं जिससे इन नदियों के जल में आध्यात्मिक और अतुलनीय शक्तियां उत्पन्न हो गईं।
 
माधवे धवले पक्षे सिंह जीवत्वेजे खौ।
तुलाराशि निशानाथे स्वातिभे पूर्णिमा तिथौ।
व्यतीपाते तु संप्राप्ते चन्द्रवासर-संचुते।
कुशस्थली-महाक्षेत्रे स्नाने मोक्षमवाच्युयात्।
 
अर्थात जब वैशाख मास हो, शुक्ल पक्ष हो और बृहस्पति सिंह राशि पर, सूर्य मेष राशि पर तथा चन्द्रमा तुला राशि पर हो, साथ ही स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि व्यतीपात योग और सोमवार का दिन हो तो उज्जैन में करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
 
कुंभ मेले की परंपरा कब से शुरू हुई, इसके विषय में बहुत सारे अभिमत हैं लेकिन आदिशंकराचार्य ने फिर से इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वैदिक संस्कृति में जहां व्यक्ति की साधना, आराधना और जीवन पद्धति को परिष्कृत करने पर जोर दिया गया है, वहीं पवित्र तीर्थस्थलों और उनमें घटित होने वाले पर्वों व महापर्वों के प्रति आदर, श्रद्धा और भक्ति का पावन भाव प्रतिष्ठित करना भी प्रमुख रहा है। विश्वप्रसिद्ध एक धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महापर्व है, जहां आकर व्यक्ति को आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की अनुभूति होती है।
 
अमृत के इस मेले यानी आस्था के इस महाकुंभ का बदलता स्वरूप है जिसने विचार मंथन की आवश्यकता को एक नई दिशा दी। धर्म तो सबका एक ही है- मानव धर्म। संप्रदाय हमारे यहां ही हजारों हैं। धर्म जहां ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य तथा अर्थ, काम, मोक्ष का आधार है, मुक्त करता है, वहीं संप्रदाय बांधता है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि इस देश के संविधान को धर्मनिरपेक्ष बनाकर धर्म को जीवन से बाहर कर दिया गया। यही कारण है कि आज वेद, पुराण, उपनिषद आदि सभी सांप्रदायिक कहलाने लग गए।
 
 

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