जनआंदोलन के रूप में बदल गई नर्मदा सेवा यात्रा

Last Updated: शनिवार, 27 मई 2017 (20:04 IST)

पूजा मेहरोत्रा
अगर नदियों को बचाना है तो चलाना होगा, जैसा महात्मा गांधी ने देश की आजादी के लिए चलाया था। वैसा आंदोलन, जैसा 1974 में देश में बदलाव के लिए जयप्रकाश नारायण ने चलाया था। वैसे ऐसी मान्यता है कि जनआंदोलन सिर्फ सामाजिक संस्थाएं ही खड़ा कर सकती हैं या फिर विपक्षी पार्टियां। लेकिन नजर मध्यप्रदेश की तरफ मोड़ें तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जोशीले जन आंदोलनकारी साबित हुए हैं। > जिस तरह से उन्होंने नर्मदा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए 11 दिसंबर 2016 को शुरू की अपनी यात्रा को 146 दिनों बाद 15 मई 2017 को नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक में खत्म किया तो इस कार्यक्रम में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की।> प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम में शामिल होकर देश को यह संदेश दे दिया कि नदियों को बचाने के लिए ऐसे ही प्रयास कामयाब हो पाएंगे। गंगा और यमुना समेत देश की नदियां प्रदूषण की मार झेल रही हैं और उन्हें साफ करने की कोशिशें कामयाब नहीं हो पा रही हैं। देश की जीवनदायी नदियों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चिंता को इसी बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने नर्मदा को साफ करने की कार्य योजना का प्रारूप देश के सभी राज्यों को भेजने की शिवराज से अपील भी कर डाली। प्रधानमंत्री ने शिवराज की तरफ मुखातिब होकर कहा कि यह अभियान भी अन्य राज्यों के लिए भी मॉडल बने, इसकी कार्ययोजना और उसका प्रारूप सभी राज्यों को भेजा जाना चाहिए। ताकि वे जान सकें कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कैसे विकास किया जा सकता है।
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प्रधानमंत्री यहीं तक नहीं रुके। उन्होंने कहा कि पर्यावरण, नदियों और मानवता की रक्षा के लिए यह कदम अहम और सराहनीय है। इस यात्रा से विचलित विपक्षी पार्टी इसमें राजनीति गर्म करने में लगी है। यह बिडंबना नहीं तो और क्या है कि आज जब पर्यावरण की रक्षा के लिए पूरी दुनिया में चिंताएं जाहिर की जा रही हैं, मध्य प्रदेश की नर्मदा सेवा यात्रा को भी राजनीति के चश्मे से देखने की विपक्षी कोशिश जारी है।
नर्मदा सेवा यात्रा खत्म हो चुकी है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अब यह यात्रा खत्म हो गई। इस यात्रा पर नजर डालने से पहले इसकी अगली कड़ी के तौर पर लागू की जाने वाली योजनाओं पर नजर डालना जरूरी है। यात्रा के समापन के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में शिवराज सिंह चौहान ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उऩ्होंने कहा कि नर्मदा के दोनों तटों पर आगामी दो जुलाई को छह करोड़ पेड़ लगाए जाएंगे। इसके साथ ही उन्होंने पहले से लगे यूकेलिप्टस के पेड़ों को हटाने का भी ऐलान किया। यहां यह बता देना जरूरी है कि यूकेलिप्टस के पेड़ नर्मदा घाटी में जगह-जगह लगाए गए हैं। जिनमें से ज्यादातर को कांग्रेस के शासन काल में लगाया गया था। यूकेलिप्टस के पेड़ जमीन में पानी भेजने के बजाय वाष्पीकरण से जरिए उसे रोजाना वातावरण में भेज देता है। शिवराज ने कहा कि अब यूकेलिप्टस के एक पेड़ को तब हटाया जाएगा, जब पहले उसके बदले पांच पेड़ लगाए जा चुके होंगे। इन पेड़ों की रक्षा वृक्षरक्षक करेंगे। जिसके लिए उन्हें सरकार से समर्थन और सहयोग मिलेगा। इसके साथ ही पर्यावरण रक्षा के प्रति युवाओं और बच्चों में शुरू से ही जागरूकता लाने के लिए शिवराज ने पाठ्यक्रमों में पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने का भी ऐलान किया। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में नदियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए अलग से विभाग भी खोलने का ऐलान किया।

नर्मदा सेवा यात्रा ने मध्यप्रदेश में बड़ा काम किया है। शिवराज की कोशिश से जारी इस अभियान ने जनभागीदारी को बढ़ावा दिया है। नर्मदा को बचाने के लिए की खुद की सक्रिय भागीदारी की जितनी प्रशंसा प्रधानमंत्री ने की, उससे कहीं ज्यादा महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरिजी ने की। उन्होंने तो शिवराज को मध्यप्रदेश का भगीरथ बता डाला। शिवराज इसके एक हद तक हकदार भी हैं, जिन्होंने खुद 48 जगहों पर यात्रा में शामिल हुए।
कुल 146 दिन चली इस यात्रा में हजारों लोगों ने कुल 3334 किलोमीटर की दूरी तय की गई। जिस दौरान जो 1093 जन-संवाद हुए, उनमें 24 लाख 34 हजार लोगों की भागीदारी की। यह संख्या समापन समारोह पर जुटी दो लाख लोगों की भीड़ से अलग है। जन-संवाद कार्यक्रमों में नर्मदा जल-धारा को अविरल बनाने के लिये पौधारोपण, तटों की साफ-सफाई, जल-धारा में विसर्जन न करने, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ आदि की समझाइश दी गई। इस यात्रा का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि तकरीबन 200 लोग ऐसे रहे, जिन्होंने श्रद्धा, भक्ति और मिशन के तहत मनोयोग से हिस्सा लिया और अब नर्मदा की रक्षा के लिए अपना जीवन देने का ऐलान कर चुके हैं।

दुनिया में संभवत: नर्मदा यात्रा ही अकेली यात्रा है, जो इतने दिनों तक और इतने ज्यादा गांवों-शहरों से गुजरी। यह यात्रा 615 ग्राम पंचायतों, 1093 गाँवों और 51 विकास खंडों से गुजरी। मुख्य यात्रा में 1862 उप यात्राएँ जो शामिल हुईं, वे अलग हैं। लगभग 85 हजार लोगों ने नर्मदा सेवा की वेबसाइट पर पंजीयन करवाया और करीब 40 हजार पौधे सांकेतिक रूप से रोपे गए। यात्रा दल के सदस्यों के भोजन और अन्य व्यवस्थाओं में 2032 सामाजिक एवं स्वयंसेवी संस्थाओं ने सहयोग किया। यात्रा की वजह से आई जागरूकता का ही असर है कि तटीय ग्राम पंचायतों में 712 नर्मदा सेवा समितियों का गठन भी किया गया है। इसके साथ ही हजारों नर्मदा सेवक भी लोग बने हैं, जिन्हें समापन समारोह पर शिवराज ने उन्हें शपथ भी दिलाई।
चौहान के इस अभियान ने जिस तरह नर्मदा के प्रति मध्यप्रदेश के गांवों, कस्बों और शहरों को एकजुट कर दिया है, वह किसी आंदोलन से कम नहीं है। नर्मदा सेवा यात्रा के जरिए शिवराज ने मध्यप्रदेश के करीब 1144 गांवों और कस्बों को ना सिर्फ जोड़ दिया है, बल्कि इस अभियान से नर्मदा किनारे बसे छोटे-बड़े करीब 18 शहरों को जोड़ कर जन जन तक बात पहुंचा दी है कि नर्मदा को बचाना है और यह काम सिर्फ सरकार नहीं करेगी, इसकी रक्षा करना एमपी के हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है। नर्मदा सेवा यात्रा की शुरुआत अमरकंटक से हुई और इसका आखिरी पड़ाव भी अमरकंटक ही था। पूरी छह महीने की सेवा यात्रा ने लोगों को इतना जागरूक कर दिया है कि अब नदी किनारे पिकनिक मनाने जाने वाले युवा अपना कचरा साथ ले जाते हैं, साथ ही पहले से पड़ा कचरा भी समेटने लगे हैं।
जिस तरह नर्मदा यात्रा के पड़ावों में लोग जुट रहे हैं और इस अभियान में खुलकर साथ और समर्थन
कर रहे हैं, उसके संकेत साफ हैं। नर्मदा की चिंता अब मध्यप्रदेश का आम आदमी करने लगा है। उसे आभास हो गया है कि अगर नर्मदा को उसने साफ किया तो ना सिर्फ मध्यप्रदेश की हालत सुधरेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी पर्यावरण सचेत बनाया जा सकेगा। इसके साथ ही उसे साफ नर्मदा सौंपी जा सकेगी। अगर नर्मदा स्वच्छ होगी, उसका पानी पीने योग्य बना रहेगा, वृक्षारोपण अभियान से हरियाली बढ़ेगी तो ना सिर्फ यहां रहने वाले लोगों को साफ पानी मिलेगा, बल्कि यहां आने वाले सैलानियों की संख्या में भी इजाफा होगा। इन सबके बीच शिवराज सिहं चौहान ने मध्य प्रदेश को आदर्श प्रदेश बना लेने की मुहीम भी चला रखी है। इस अभियान के जरिए वह लोगों को स्वच्छता अभियान, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, साक्षरता दर बढ़ाना, शराब मुक्ति, वृक्षारोपण के प्रति भी जागरूक कर रहे हैं।
चौहान अपने हर जनसंवाद कार्यक्रम में लोगों को शपथ दिलाते रहे और यात्रा में शामिल लोग खुशी खुशी न केवल शपथ लेते रहे बल्कि शपथ पर अमल करते नजर आए।
भोपाल से 80 किलोमीटर दूर नसरुल्लागंज में पान की दुकान चला रहे राणा कहते हैं कि पहले हमलोग
घर में की गई पूजा की सारी सामग्री नर्मदा में विसर्जित करने जाते थे, लेकिन अब हमारे घर के बच्चों ने नर्मदा में कुछ भी विसर्जित करने से मना कर दिया है। चाय की दुकान चला रहे हरिशंकर ने बताया कि गांव का गांव हफ्ते में नदी के किनारों को साफ करने समूह में जा रहा है। अब यह कभी बंद नहीं होगा। हम पौधे भी लगाएंगे और पौधे न सूखें, उसकी जिम्मेदारी भी लेंगे। गांव-गांव में शौचालय तो बनाया गया है, हां घर में भी शौचालय बनाने का अभियान तेजी से देखा जा रहा है। और यह जो भी कुछ हो रहा है, वह हमारे भले के लिए है। हरिशंकर बताते हैं कि मुख्यमंत्री जी रात में नर्मदा के किनारे लगाए जा रहे कैंप में सो रहे हैं। नेताजी अगर नदी को साफ करने के लिए अपनी सुख-सुविधा छोड़ रहे हैं तो हम क्यों नहीं करेंगे।
नर्मदा सेवा यात्रा की यह कामयाबी ही मानी जाएगी कि प्रधानमंत्री को शिवराज सिंह और मध्य प्रदेश की जनता को महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान के लोगों की तरफ से धन्यवाद देना पड़ा। गौरतलब है कि नर्मदा सागर बांध से मध्य प्रदेश के अलावा इन तीनों राज्यों को भी पानी की आपूर्ति की जाती है। जो वहां के कई इलाकों में पेयजल के साथ ही खेती में काम आता है। प्रधानमंत्री की प्रशंसा से साफ है कि देश में दूसरी नदियों की सफाई के लिए जो अभियान चल रहे हैं, उनके लिए देर-सवेर नर्मदा सेवा यात्रा उदाहरण बन सकेगी। बिना किसी अतिरिक्त बजट प्रावधान के नर्मदा की सफाई के लिए अभियान बाकी नदी सफाई अभियानों के लिए प्रेरक हो सकता है।

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