विचार कुंभ : परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास


अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ  
 
मध्यप्रदेश के उज्जैन में चले सिंहस्थ कुंभ के दौरान 12 से 14 मई तक निनौरा में 3 दिवसीय किया गया। इस दौरान धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा की गई। वक्ताओं ने कृषि, पर्यावरण, शिक्षा, संस्कृति, भाषा, चिकित्सा, स्वच्छता, महिला सशक्तीकरण आदि विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए देश और समाज के उत्थान पर बल दिया।
 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने को संबोधित करते हुए संत-महात्माओं से आग्रह किया कि वे धरती की समस्याओं पर प्रतिवर्ष 7 दिन का विचार कुंभ आयोजित करें। उन्होंने कहा कि आदिकाल से चले आ रहे कुंभ के समय और कालखंड को लेकर अलग-अलग मत हैं, लेकिन इतना निश्चित है कि यह मानव की सांस्कृतिक यात्रा की पुरातन व्यवस्था में से एक है। इस विशाल भारत को अपने में समेटने का प्रयास कुंभ मेले के माध्यम से ही होता है।
 
उन्होंने कहा कि समाज की चिंता करने वाले ऋषि-मुनि 12 वर्ष में एक बार प्रयाग में कुंभ में एकत्रित होते थे जिसमें वे विचार-विमर्श करते हुए विगत वर्ष की सामाजिक स्थिति का अध्ययन करते थे, उसका विश्लेषण करते थे। इसके साथ ही समाज के लिए आगामी 12 वर्षों की दिशा तय करके योजना बनाते थे।
 
उन्होंने कहा कि प्रयाग से अपने-अपने स्थान पर जाकर संत-महात्मा योजना पर कार्य करने लगते थे। इतना ही नहीं, 3 वर्ष में उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद में होने वाले कुंभ में जब वे एकत्रित होते थे, तब विमर्श करते थे कि प्रयाग में जो योजना बनाई गई थी, उस पर क्या कार्य हुआ और क्या नहीं हुआ। तत्पश्चात आगामी 3 वर्ष की योजना बनाई जाती थी। यह एक अद्भुत सामाजिक संरचना थी, परंतु समय के साथ इसके रूप में परिवर्तन आया। अब कुंभ केवल डुबकी लगाने, पाप धोने और पुण्य कमाने तक ही सीमित होकर रह गया है।
 
उन्होंने कहा कि विचार कुंभ के माध्यम से उज्जैन में एक नया प्रयास प्रारंभ हुआ है। यह प्रयास शताब्दियों पुरानी परंपरा का आधुनिक रूप है। इस आयोजन में वैश्विक चुनौतियों और मानव कल्याण के क्या प्रयास हो सकते हैं, इस पर विचार हुआ है। इस मंथन से जो 51 अमृत बिंदु निकले हैं, अब उन पर कार्य होना चाहिए।
 
उन्होंने उपस्थित साधु-संतों और अखाड़ों के प्रमुखों से आह्वान किया कि वे इन 51 अमृत बिंदुओं पर प्रतिवर्ष एक सप्ताह का विचार कुंभ अपने भक्तों के बीच करने पर विचार अवश्य करें ताकि विचारों को मूर्तरूप दिया जा सके। 
 
विचार कुंभ को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि विकास करते समय प्रत्येक देश की प्रकृति का विचार करना चाहिए। ऐसा ही परिवर्तन दुनिया की वैचारिकता में दिखाई दे रहा है। विविधता को स्वीकार किया जा रहा है और दुनिया कहने लगी है कि विविधता को अलंकार के रूप में देखना चाहिए, दोष के रूप में नहीं। अब तो यह भी कहा जाने लगा है कि विविधता को स्वीकार कर सम्मानित करना चाहिए, केवल सहिष्णुता नहीं, उससे भी आगे जाना है।
 
उन्होंने कहा कि अस्तित्व के लिए संघर्ष करने के बजाय अब समन्वय की ओर जाना पड़ेगा, धीरे-धीरे सभी लोग यह मानने लगे हैं। व्यवस्था समतायुक्त और शोषणमुक्त होनी चाहिए। जब तक सभी को सुख प्राप्त नहीं होता, तब तक शाश्वत सुख दिवास्वप्न है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जन्म लेने वाले लोगों की 2 माताएं हैं- एक जन्म देने वाली और दूसरी भारतमाता। जन्म देने वाली माता के कारण शरीर मिला, मातृभूमि के कारण संस्कार मिला, पोषण मिला।
 
 

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