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कौन है आपके डिजिटल एस्टेट का वारिस?

Author डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी|
#माय हैशटैग
 
सोशल मीडिया पर कई अकाउंट्स ऐसे हैं, जो जानी-मानी शख्सियतों के हैं। ये शख्सियतें अब जीवित नहीं हैं, लेकिन उनके सोशल मीडिया अकाउंट जीवित हैं। उन अकाउंट्स में अब भी पोस्ट लिखी जा रही हैं और फोटो शेयर किए जा रहे हैं। आश्चर्य होता है कि उनके अकाउंट जो लोग हैंडल कर रहे होंगे, वे कितने क्रूर और बेशर्म हैं। अगर आपके परिजन या क्लाइंट जीवित नहीं है, तो आपको चाहिए कि वे सोशल मीडिया अकाउंट इनएक्टिवेट कर दें या डिलीट ही कर दें। जो व्यक्ति दिवंगत हो चुका है, वह स्वर्ग से तो अपना सोशल मीडिया अकाउंट संचालित करने से रहा! 
जब किसी व्यक्ति का महाप्रयाण होता है, तब वह अपने पीछे धन-संपदा, बीमा पॉलिसी, वाहन, दस्तावेज आदि छोड़ जाता है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर उस व्यक्ति के अकाउंट्स हो सकते हैं, उसकी ई-मेल में ऐसे कई संदेश हो सकते हैं, जो वह सार्वजनिक नहीं करना चाहता हो। उसके फेसबुक और ट्विटर अकाउंट में भी ऐसे पोस्ट हो सकते हैं, जो वह कुछ खास लोगों के साथ ही शेयर करना चाहता हो। इन सारे अकाउंट्स का पासवर्ड हो सकता है कि उसने किसी को बताया ही न हो और यह भी संभव है कि उसके किसी नजदीकी व्यक्ति के पास वे सभी पासवर्ड हों और वह उसका संचालन करता हो। इन पासवर्ड में बैंक अकाउंट के पासवर्ड भी हो सकते हैं। 
ब्रेंट पोप नामक एक शख्स ने एक रास्ता सुझाया है। उसके अनुसार व्यक्ति की भौतिक संपदा के साथ ही डिजिटल संपदा भी महत्वपूर्ण है। वे इसे 'डिजिटल एस्टेट' नाम देते हैं। ब्रेंट पोप के अनुसार सोशल मीडिया पर हम अपनी तमाम बातें शेयर करते रहते हैं अच्छी और बुरी भी, लेकिन उस हालात के लिए तैयार नहीं होते, जो अवश्यंभावी है। जीवन क्षणिक है इसलिए हमें बुरे से बुरे वक्त के लिए तैयार रहना चाहिए। इसकी तैयारी हमें जीते-जी ही कर लेनी चाहिए। उन्होंने इसके लिए एक वेबसाइट बनाई है जिसका नाम है डूयोरऑनविल.कॉम। 
 
ब्रेंट पोप की वेबसाइट पर जाकर आप अपनी डिजिटल एस्टेट किसी एक व्यक्ति के हवाले कर सकते हैं। उस व्यक्ति का नाम एक्जीक्यूटर दिया गया है। उनकी वेबसाइट पर जाकर कोई भी व्यक्ति 15 से 20 मिनट में अपनी डिजिटल संपदा की वसीयत लिख सकता है। जो जानकारियां आपके सोशल मीडिया अकाउंट और ई-मेल में हों, उसके अलावा भी अगर आपने किसी हार्ड डिस्क में कुछ दस्तावेज सुरक्षित रखें हों, तो उसकी जानकारी भी यहां दी जा सकती है और एक्जीक्यूटर को एक निर्देश दिए जा सकते हैं। 
 
ब्रेंट पोप के अनुसार जिस व्यक्ति को आप एक्जीक्यूटर बना रहे हैं, उसे इस बात की जानकारी अवश्य दे देनी चाहिए कि अप्रिय घटनाक्रम होने पर उसे क्या करना है। इस वेबसाइट में जानकारियां इस तरह दी गई हैं कि आप उसे पीडीएफ फॉर्मेट में सेव कर सकते हैं। वसीयत की तरह ही यह दस्तावेज तैयार करते समय दो गवाह भी होने जरूरी हैं और आप जिसके नाम अपनी डिजिटल एस्टेट लिख रहे हैं, उसका बालिग होना भी जरूरी है। जरूरी नहीं है कि सारी डिजिटल एस्टेट किसी एक व्यक्ति के ही नाम पर की जाए। अलग-अलग डिजिटल एस्टेट अलग-अलग लोगों को भी दी जा सकती है।
 
डिजिटल एस्टेट के बारे में एक्जीक्यूटर को जानकारी तो होती ही है, इसके साथ ही इसके पासवर्ड इस तरह दिए जाते हैं, जो सामान्य पासवर्ड की तरह नहीं होते और ऐसे होते हैं, जिन्हें हैक करना आसान नहीं होता। इसके पासवर्ड में एक इमरजेंसी पासवर्ड भी है, जो केवल एक्जीक्यूटर ही उपयोग में ला सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि एक्जीक्यूटर बिना मास्टर पासवर्ड जाने भी आपके या डिजिटल एस्टेट तक पहुंच रख सकता है, वह चाहे तो आपके बाद आपके अकाउंट्स में दर्ज संवेदनशील सामग्री डिलीट कर सकता है या कोई उसमें कोई और जानकारी जोड़ सकता है। इसके पासवर्ड की सिक्युरिटी-की भौतिक रूप में होती है और यह एक्जीक्यूटर को इस निर्देश के साथ भेजी जाती है कि इसका इस्तेमाल उसी कम्प्यूटर के यूएसबी पोर्ट में हो सकता है जिसका उपयोग डिजिटल एस्टेट की वसीयत लिखने वाले ने की है। सिक्युरिटी-की के अलावा इसमें कुछ बेकअप कोड्स भी तैयार होते हैं। इन कोड का इस्तेमाल भी एक्जीक्यूटर को करना होता है। 
 
गूगल ने अपने यूजर्स के दिवंगत होने पर अपने अलग तरह का ही सिस्टम ईजाद कर रखा है। इसका नाम इनएक्टिव अकाउंट मैनेजर दिया गया है। गूगल के अकाउंट में एक टाइम आउट पीरियड है, उसके बाद गूगल आपका अकाउंट डीएक्टिव कर देता है। गूगल की तरफ से इसकी सूचना भी आती है। अगर आप चाहे, तो उसे किसी के साथ शेयर भी कर सकते हैं। 
 
फेसबुक ने भी अपने यूजर्स के दिवंगत होने पर उनके अकाउंट को डीएक्टिवेट करने की व्यवस्था की है, लेकिन इसके लिए मृत्यु का कोई प्रमाण पत्र आदि नहीं मांगा जाता। फेसबुक पर आप लीगेसी कांटेक्ट के रूप में किसी प्रियजन को नॉमिनेट कर सकते हैं। इस कांटेक्ट को आप वार्षिक आधार पर नॉमिनेट कर सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति यह सब नहीं करता और फेसबुक का यूजर रहते हुए उसका देहावसान हो जाता है, तब वह अकाउंट जारी रहता है। 
 
इंस्टाग्राम पर यूजर के निधन की सूचना सबूत सहित भेजनी होती है। वहां व्यक्ति के दिवंगत होने के बाद भी अकाउंट जारी रहता है। ट्विटर और लिंक्डइन पर परिवार के किसी सदस्य द्वारा रिक्वेस्ट भेजे जाने पर ही अकाउंट डीएक्टीवेट किया जा सकता है। स्नेपचैट पर ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। 
 
कोई भी व्यक्ति अपनी मृत्यु के बारे में नहीं सोचना चाहता। इसी कारण कई लोग अपनी वसीयत भी नहीं लिखते हैं। मृत्यु के बाद दिवंगत व्यक्ति तो मुक्त हो जाता है, लेकिन उसके परिजनों को काफी काम बाकी रहता है। बैंकों के खाते, क्रेडिट कार्ड, एडवांस में खरीदी गई यात्राओं के लिए टिकट जैसी चीजें समय और पैसा मांगती हैं। हर व्यक्ति बैंक में धन जमा करके ही विदा नहीं होता, कई लोग कर्ज लेकर भी विदा होते हैं, लेकिन डिजिटल एस्टेट का निपटारा रुपए-पैसे से नहीं हो सकता।
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