रक्षा के लिए मजबूत होता राजमार्ग

युद्धकाल में देश की सुरक्षा सर्वोच्च हो जाती है। तब सामान्य यातायात का भी इतना महत्व नहीं रहता। सड़कों पर लड़ाकू विमान उतारने का अभ्यास इसी के अनुरूप होता है। विश्व के अनेक देशों ने इसे पहले अपनाया। यह अच्छी बात है कि सरकार इस मसले पर सजग हुई है। भारतीय वायुसेना का शानदार रिकॉर्ड रहा है। उनके हैरतअंगेज करतब ने यह साबित कर दिया है कि इनके पास आसमान से भी ऊपर उड़ने का हौसला है। उत्तर प्रदेश में भारतीय वायुसेना ने लखनऊ एक्सप्रेसवे पर अपने 16 लड़ाकू विमानों को उतारा और जमीन को छुआ फिर असमान में गोते खाते दिखे। यह करीब 3 घंटे तक चला। यह वायुसेना द्वारा किया गया अब तक का सबसे बड़ा अभ्यास था।
भारत में पहली बार उत्तर प्रदेश में ही वायुसेना के विमान उतारने की परंपरा की शुरुआत हुई है। पहली बार यह मई 2015 में यमुना एक्सप्रेसवे पर उतारे गए। दोबारा 24 अक्टूबर 2017 को उतारे गए। इसलिए यहां का हाइवे खास प्रकार का माना जाता है। जो विमान उतारने की सुलभता को सही दायरे में प्रस्तुत कर रहा है। 21 मई 2015 को मिराज-2000 यमुना एक्सप्रेसवे पर उतरे थे। दूसरे देशों में इस तरह की गतिविधि होती रहती है। यहां तक कि पाकिस्तान ने 15 साल पहले ही सफलतापूर्वक रोड रनवे टेस्ट कर लिया था। 21 मई 2015 को भारत में सड़क रनवे का इस्तेमाल पहली बार किया गया है, जबकि कई ऐसे देश हैं, जहां इसका इस्तेमाल हो चुका है।

इसके अलावा पाकिस्तान ने 2000 में इस्लामाबाद-लाहौर मोटरवे पर एफ-7 पी फाइटर, सुपर मुशाक ट्रेनर और सी-130 फाइटर उतारे थे। 2010 में इसी मोटरवे के एक हिस्से को पाकिस्तान ने अपनी एयरफोर्स के लिए पूरी तरह रोड रनवे के रूप में विकसित कर लिया था। फिलहाल पाकिस्तान के पास ऐसे दो सड़क रनवे हैं जिसका इस्तेमाल वो युद्ध के दौरान आपात स्थिति में कर सकता है। पाकिस्तान का पहला सड़क रनवे एम-1 है जो कि पेशावर से इस्लामाबाद हाइवे पर बनाया गया है। दूसरा एम-2 इस्लामाबाद-लाहौर हाइवे पर बनाया गया है। पाकिस्तान ने 2010 में ही इस्लामाबाद-लाहौर मोटरवे के एक हिस्से को अपनी एयरफोर्स के लिए रोड रनवे के रूप में विकसित कर लिया था।

चीन, स्वीडन, जर्मनी, स्विट्जरलैंड, ताईवान, पोलैंड, फिनलैंड, चेकोस्लोवाकिया, साउथ कोरिया और सिंगापुर में वहां की एयरफोर्स के लिए पहले से रोड रनवे बने हैं। स्पेन के पास स्थित ब्रिटिश इलाका जिब्राल्टर एक प्रायद्वीप पर स्थित है। इसका इलाका सिर्फ 6.8 वर्ग किलोमीटर है। यहां का रनवे शहर की मुख्य सड़क को चीरते हुए गुजरता है। हफ्तेभर में सिर्फ 30 उड़ानें यहां से जाती हैं। एयरफोर्स के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। 2013 में भारतीय वायुसेना ने नया प्रयोग किया था। चीन सीमा से सटे दौलत बेग ओल्डी में एयरफोर्स ने सफलतापूर्वक परिवहन बेड़े के सबसे भारी-भरकतम हरक्युलिस 130-जे की लैंडिंग कराई थी। धूलभरे रनवे पर कुछ परेशानियों के बाद विमान की टीम ने कामयाब लैंडिंग करा ली।

लैंडिंग के दौरान कुछ देर के लिए तो पूरा विमान धूल में गुम हो गया था। उस समय तो ऐसा लगा था कि कहीं कोई बड़ी परेशानी सामने न आ जाए, लेकिन टीम की सूझबूझ से परिवहन बेड़े की शान हरक्युलिस विमान एक इतिहास लिखने में कामयाब रहा। इसके लिए सड़क का वह हिस्सा बिलकुल सीधा और समतल हो। सड़क के नीचे की जमीन धंसने जैसी न हो। उस पर कोई ढलान भी न हो। उसकी मोटाई सड़क के बाकी हिस्सों से ज्यादा हो। सड़क के दोनों ओर बिजली के खंभे, हाईमास्ट या मोबाइल फोन टॉवर नहीं होने चाहिए। सड़क के दोनों ओर इतनी जगह और व्यवस्था होनी चाहिए जिससे वहां फाइटर प्लेन को गाइड करने के लिए पोर्टेबल लाइटिंग सिस्टम लगाए जा सकें।

कुछ लोगों का कहना है कि अमे‍रिका में इंटरस्टेट हाइवे को इस तरह बनाया गया है कि वो जंग के दौरान ज़रूरत पड़ने पर हवाई पट्टी का काम कर सकें। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि कोई नहीं करता। जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान से सटे बार्डर क्षेत्र गुजरात, राजस्थान और पंजाब में एयरफोर्स और नेशनल हाइवे साथ मिलकर इन हाइवे को तैयार किया जा रहा है जिसमें यह विमान आपातकाल की हालत में भी उतर सकें।


रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो इन्हें सड़कों पर इसलिए उतारा जाता है कि जब दुश्मन हमला करता है तो उसका पहला निशाना हमारे वायुसेना के स्टेशन होता है। दुश्मन चाहता है कि वो हमारी हवाई पट्टियों और एयरक्राफ्ट्स को मिसाइल से उड़ा दे, जिससे कि हमारे फाइटर उड़ान न भर पाएं और हमारा एयर अटैक कमजोर हो जाए। हवाई पट्टी खराब होने के बाद हमारे ट्रांसपोर्ट प्लेन भी न उड़ पाएं और हम अपनी थलसेना को किसी भी तरह की मदद न हो सके। अगर कोई हमला होता है तो हम अपने प्लेन को सुरक्षित करने के लिए उन्हें एक्सप्रेसवे पर बने रनवे पर पहुंचा सकते हैं। उसके बाद उसी रोड रनवे से दुश्मन पर हवाई हमला करने के लिए लड़ाकू विमान को ईंधन और हथियार दिए जाते हैं। वहीं ट्रांसपोर्ट प्लेन रसद, हथियार और सैनिकों को लेकर रोड रनवे से ही उड़ान भरता है।

पट्टी या सड़क रनवे हाइवे का एक रूप है जिसे सेना के विमान को उतारने की अनुमति देने और सैन्य हवाई ठिकानों के रूप में सेवा के लिए बनाया जाता है। यह सैन्य विमानों को उड़ाने की अनुमति देने और युद्ध में दुश्मनों के सबसे कमजोर लक्ष्य को भेदने के लिए वायुसेना के कैंप की मदद के लिए बनाया जाता है। दूसरा-वायुसेना की परिचालन क्षमता को भी परखना कि क्या वायुसेना के विमान और पायलट हवाईपट्टी के अलावा किसी हाइवे पर भी कार्य कर सकते हैं।

1965 के युद्ध में पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों ने ताबड़तोड़ बमबारी कर भारत के कई एयरबेस को तहस-नहस कर दिया था। ऐसे में भारतीय वायुसेना को अपने ऑपरेशन करने में काफी दिक्कत आई थी। इसीलिए मॉर्डन वॉरफेयर में एयरबेस के साथ-साथ लड़ाकू विमानों को जमीन पर उतारने के लिए खास तरह के एक्सप्रेसवे और हाइवों को ही उतारने की ग्राउंड की तरह इस्तेमाल किया जाता है इसीलिए भारतीय वायुसेना इस तरह के प्रयोग कर रही है। सड़कों की गुणवत्ता भी इसी से जुड़ा मसला है। नई सड़कें भी अक्सर कुछ समय में असलियत बयान करने लगती हैं। आपातकाल में उनका मजबूत रहना भी जरूरी होता है।

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