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अयोध्या की भी सुनिए....

Author स्मृति आदित्य|


अयोध्या नहीं श्री अयोध्या जी कहिए। यही कहना है हर अयोध्यावासी का..... एक नगरी जिस पर सदियों पहले हमारे आराध्य देव प्रभु श्रीराम ने जन्मावतार लिया। एक नगरी जहां आदर्श और मर्यादा के प्रतिमान गढ़े गए। एक नगरी जहां सुंदर और स्वस्थ राजनीति के मानक रचे गए। यह नगरी हर हिंदू धर्म के अनुयायी को मोहित करती है। फैजाबाद के आते ही इस नगरी के प्रति गहरी आस्था उपजती है।

क्या यही वह जंगल हैं जहां कभी श्री राम अपने भाई के साथ धनुष-बाण से खेला करते होंगे, कहीं यही तो वह यज्ञशाला नहीं जहां बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने पवित्र मंत्रोच्चार के साथ समिधा डाली। अगर आप थोड़े भी धार्मिक हैं तो अंतरात्मा से आपको इस नगरी का हर कोना छू कर जाता है। यहां की हवा, यहां के पेड़, यहां के नन्हे नटखट वानर, यहां की गिलहरियां.... यहां के भव्य प्रासाद, और फिर सरयू तो हैं ही आपके तन-मन को भिगोने के लिए। चाहे मंदिरों का इतिहास कुछ कहे, श्रीराम के युग से लेकर बाबर के आक्रमण तक और गुंबद के ढहाए जाने से लेकर श्री योगी के आने तक .... लेकिन सरयू जी एकमात्र शाश्वत सत्य है कि इन्हीं शीतल लहरों ने प्रभु श्रीराम का अभिस्पर्श किया होगा।

श्रीराम ही क्यों उस युग के हर बड़े संत, महात्मा, राजा, आचार्य,पंडि‍त और मनिषियों की अंजूरी में सरयू का जल थिरका होगा। इस नदी के आचमन से लकर स्नान तक दिव्य तरंगें मन में हिलोरें लेती है और कई-कई घंटे आप बाहर नहीं निकलना चाहते हैं। कनक मंदिर, राजा दशरथ महल, कैकैयी महल, हनुमान गढ़ी, करूणानिधान भवन, श्रीराम जन्मभूमि जैसे हर पवित्र स्थान पर आस्था का चरम आपको भावुक कर देता है लेकिन....... 
 
यह लेकिन बहुत बड़ा है, बहुत अहम है, बहुत बहुत महत्वपूर्ण है.... जी हां अयोध्या नगरी में प्रवेश करते ही गंदगी के जिस साम्राज्य से आपका सामना होता है वह विचलित कर देने वाला है। पतली-संकरी गलियों में खुली गंदी नालियां, बजबजाते कूड़े के ढेर, हर तरफ प्लास्टिक का आलम और कहीं से भी निकलकर आती गुटखे की पिचकारियां मन को दुखी कर देती है। मंदिरों में मनगढ़ंत किस्से सुनाते अधकचरे ज्ञानी पुजारी जब भोले-भाले दर्शनार्थियों से पैसा मांगते हैं तो एक बारगी मन यह सोचने के लिए विवश हो जाता है कि प्रभु राम ने ऐसा तो कभी नहीं चाहा होगा अपनी प्रिय नगरी के बारे में....

जिस नगरी के नाम पर बरसों से राजनीति हो रही है। सत्ता के खेल खेले जा रहे हैं, तख्तापलट हो रहे हैं, देशव्यापी हिंसा हो चुकी है, जय-जय श्रीराम के नारों से गुंजते हुए कई बड़े-छोटे संगठन तैयार हो गए हैं। करोड़ों की कार्यशाला चल रही है, और तो और उम्मीद यही है कि कई सालों तक यह सब जारी रहने वाला है। उस नगरी में आखिर क्यों सरकार के स्वच्छता अभियान का आधा 'स्' भी नहीं पंहुचा? मोदी जी के केंद्र में आने से लेकर से लेकर योगी जी के प्रदेश में आने तक हर किसी के मन में 'मंदिर निर्माण' का सवाल कहीं ना कहीं रहा है। कार्यशाला की तैयारी से लेकर चंदा वसूलने की तत्परता तक देखकर लगता है कि मंदिर का तयशुदा मॉडल मात्र दो दिन में बनकर खड़ा हो सकता है। सिर्फ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है लेकिन प्रभु राम जी की मर्जी क्या है और हमारी आस्था क्या कहती है? क्या श्रीराम चाहेंगे कि अस्वच्छता के माहौल में उनका मंदिर बनकर तैयार हो, क्या हम चाहेंगे कि हमारे आराध्य गंदगी के बीच स्थापित हो? क्या मंदिर निर्माण से बड़ा काम अयोध्या नगरी की स्वच्छता को लेकर नहीं होना चाहिए? 
 
फिर दूसरा सवाल यह है कि जिस जगह राम लला बैठे हैं, कड़ी सुरक्षा के माहौल में चारों तरफ से कैद, परिंदा भी पर न मार सके क्या यह मुनासिब नहीं कि उन्हें थोड़ी सांस लेने की गुंजाइश रखी जाए..... राम जन्मभूमि स्थल में जाकर लगता है कि आपने कोई अपराध तो नहीं कर दिया यहां आकर? सघन सुरक्षा इंतजाम के नाम पर आमजन के साथ जो व्यवहार होता है वह कमोबेश ऐसा ही होता है जैसे विदेशी एयरपोर्ट पर किसी भारतीय के साथ हो तो हंगामा मच जाता है।

सबसे पहले राम न्यास ट्रस्ट आपसे लॉकर में वह सब रखवा लेता है जिसके अंदर जाने से कोई परेशानी नहीं हो सकती है फिर भी आप धैर्य रखते हैं कि चलिए अब यहां सब कुछ रखकर आप स्वतंत्र रूप से अंदर जा सकेंगे लेकिन नहीं जिस तरह से आपको खाली हाथ होने के बावजूद जांचा और परखा जाता है (वह भी 5 जगहों पर) तो मन खिन्न हो जाता है। क्या वारदात करने वाला/वाली इस तरह लाइन में लगकर आएगा?

क्या साफसुथरी धर्मप्रिय जनता को इस तरह प्रताडित करने की हद तक जांचने से ज्यादा जरूरी यह नहीं है कि वहां बिखरे कूड़े के ढेर और प्लास्टिक को साफ किया जाए? सवाल तो यह भी उठता है कि अगर इतनी सघन चैकिंग हो रही है तो अंदर प्लास्टिक और गुटखे के पाऊच इतनी संख्या में कैसे दिखाई दे रहे हैं? वह कौन ले जाता है? तपती गर्मी में बुजुर्ग महिलाओं को अंदर पानी न ले जाने का नियम भी सही हो सकता है लेकिन विकल्प के तौर पर पानी की एक मात्र नल का होना किस दृष्टि से उचित ठहराया जाए?

राम लला को थोड़ा स्वतंत्र करना इसलिए भी जरूरी है कि वही प्रबलतम आस्था का केन्द्र है लेकिन उनकी हल्की सी झलक भर ही देख पाते हैं और आपको आगे बढ़ा दिया जाता है। 
 
सबसे अजीब तो यह कि जिस भीतर के चैकिंग सेंटर पर आपके सामान रखवा लिए जाते हैं वह वापिस मिलने की संभावना न्यूनतम है क्योंकि जब आप बाहर आते हैं तो वह सेंटर बहुत पीछे छुट चुका होता है और अगर आपमें फिर से तीन चैकिंग सेंटर पर अपनी जांच करवाने का धैर्य हो तो बेशक आप फिर से लाइन में लगें लेकिन आने का रास्ता फिर उतना ही लंबा है जितना आपने दर्शन के दौरान तय किया था, अंतत: आप उस सामान को भूल 
जाने में ही अपनी खैरियत समझते हैं।  
 
मजेदार तथ्य यह भी है कि जिस अनहोनी की संभावना से सुरक्षा के इंतजाम कड़े किए गए हैं, दूसरे रास्ते से लौटते समय उनकी धज्जियां उड़ते हुए भी आप ही देखते हैं। हर दुकान पर बाबरी गुंबद ढहाए जाने के वीडियो दिखाए जा रहे हैं। कैसे कार सेवकों ने भगवा ध्वज लहरा कर जय श्रीराम का उदघोष किया से लेकर नेताओं के भड़काऊ भाषण तक...हर जगह भावुक जनता को बहा ले जाने के इंतजाम हैं पर उन पर कहीं कोई रोक-टोक नहीं...
 
इस सबके बावजूद आप अपने मन को फिर-फिर समेटते हैं प्राचीनतम मंदिरों के शिखरों को देखकर, मनभावन प्रतिमाओं को देखकर, झांझ मंजीरे के सुमधुर कीर्तन को सुनकर और मासूम वानरों की टोली से मिलकर.... लेकिन एक काश मन में अटक जाता है और कल्पना में बसी अयोध्या नगरी आंखों के समक्ष थिरक उठती है।  
 
काश कि अयोध्या में प्रवेश करते ही एक सुंदर सा सुसज्जित द्वार हो, जिस पर लिखा हो श्रीराम नगरी अयोध्या में आपका स्वागत है। चारों तरफ हरियाले जंगलों के बीच गोबर से लीपी कुटिया हो, सरयू तीरे सुरम्य घाट हो, मंदिरों में स्वच्छता का उजाला हो, कचरों का सही निपटान स्थल हो। नालियां बंद हो, गुटखे पर प्रतिबंध हो, प्लास्टिक निषेध हो....और इस सबके बीच मन की भी आस्था बनी रहे.... इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी अपने मन की सुनने से पहले अयोध्या की भी सुनिए....
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