मैं अक्सर चाँद पर जाता हूँ
अज़ीज़ अंसारी के मुनतख़िब अशआर
मैं अक्सर चाँद पर जाता हूँ शाइर आदमी हूँ
पलट कर फिर यहीं आता हूँ आख़िर आदमी हूँ
शबनम के सामने जो खड़ी हो गई है धूप
लगता है मोतियों की लड़ी हो गई है धूप
तुम हो क्या ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद
तुम बदलते हो तो मौसम भी बदल जाते हैं
हमारे क़त्ल को मीठी ज़ुबान है काफ़ी
अजीब शख़्स है ख़ंजर तलाश करता है
जो जैसा है उसको वैसा बोले मेरी ग़ज़ल
आँख पे पट्टी बाँधके सबको तोले मेरी ग़ज़ल
झूट का लेके सहारा जो उभर जाऊँगा
मौत आने से नहीं शर्म से मर जाऊँगा
ऊँची पुख़ता दीवारें हैं क़ैदी कैसे भागेगा
जेलके अन्दर से रस्ता हो, ये भी तो हो सकता है
रात गए जब लफ़्ज़ों की बरसात हुई
एक मुरस्सा नज़्म हमारी ज़ात हुई
फूल जो दिल की रेहगुज़ार में है
जाने किस के वो इंतिज़ार में है
दुनिया भर की रंगीनी
तित्ली के इक पर में है
सर्द हवा में उसके बदन पर आँचल उडते देखा है
पानी वाला बादल जैसे सैर करे कोहसारों की
बू-ए-ख़ुलूस, ख़ू-ए-इताअत, नहीं रही
बच्चों में बात सुन्ने की आदत नहीं रही
यक़ीं ज़रा भी नहीं अपने ज़ोर-ए-बाज़ू पर
हथेलियों में मुक़द्दर तलाश करता है
पेड अपना है तो साया भी हो अपने सेह्न में
इसलिए हमसाए शाख़ें मुख़तसर करने लगे
अब मैं शायद नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गया
लोग साहिल पर नज़र आते नहीं
रहने वाले यहाँ लोग ही लोग हैं
दिल का ख़ाली मकाँ लोग ही लोग हैं
सिर्फ़ ज़र्रा हूँ अगर देखिए मेरी जानिब
सारी दुनिया में मगर रोशनी कर जाऊँगा
उसके करम की बात न पूछो, साथ वो सब के होले है
इक दरवाज़ा बन्द अगर हो, सौ दरवाज़े खोले है
सरों पे माँ की दुआओं का शामियाना है
हमारे पास तो अनमोल ये ख़ज़ाना है
बहुत दिनों से थमा हुआ है बीच समन्दर एक जहाज़
धीरे धीरे डूब रहा हो, ये भी तो हो सकता है
जैसा मौक़ा देखे वैसी होले मेरी ग़ज़ल
वो बातें जो मैं नहीं बोलूँ बोले मेरी ग़ज़ल
तमाम सेह्न-ए-चमन बिजलियों की ज़द में है
मगर हमें तो यहीं आशियाँ बनाना है
हुक्म हुआ है काँच का बरतन सर पर रख कर नांच 'अज़ीज़'
बरतन में तेज़ाब भरा हो, ये भी तो हो सकता है
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पलट कर फिर यहीं आता हूँ आख़िर आदमी हूँ
शबनम के सामने जो खड़ी हो गई है धूप
लगता है मोतियों की लड़ी हो गई है धूप
तुम हो क्या ये तुम्हें मालूम नहीं है शायद
तुम बदलते हो तो मौसम भी बदल जाते हैं
हमारे क़त्ल को मीठी ज़ुबान है काफ़ी
अजीब शख़्स है ख़ंजर तलाश करता है
जो जैसा है उसको वैसा बोले मेरी ग़ज़ल
आँख पे पट्टी बाँधके सबको तोले मेरी ग़ज़ल
झूट का लेके सहारा जो उभर जाऊँगा
मौत आने से नहीं शर्म से मर जाऊँगा
ऊँची पुख़ता दीवारें हैं क़ैदी कैसे भागेगा
जेलके अन्दर से रस्ता हो, ये भी तो हो सकता है
रात गए जब लफ़्ज़ों की बरसात हुई
एक मुरस्सा नज़्म हमारी ज़ात हुई
फूल जो दिल की रेहगुज़ार में है
जाने किस के वो इंतिज़ार में है
दुनिया भर की रंगीनी
तित्ली के इक पर में है
सर्द हवा में उसके बदन पर आँचल उडते देखा है
पानी वाला बादल जैसे सैर करे कोहसारों की
बू-ए-ख़ुलूस, ख़ू-ए-इताअत, नहीं रही
बच्चों में बात सुन्ने की आदत नहीं रही
यक़ीं ज़रा भी नहीं अपने ज़ोर-ए-बाज़ू पर
हथेलियों में मुक़द्दर तलाश करता है
पेड अपना है तो साया भी हो अपने सेह्न में
इसलिए हमसाए शाख़ें मुख़तसर करने लगे
अब मैं शायद नज़्र-ए-तूफ़ाँ हो गया
लोग साहिल पर नज़र आते नहीं
रहने वाले यहाँ लोग ही लोग हैं
दिल का ख़ाली मकाँ लोग ही लोग हैं
सिर्फ़ ज़र्रा हूँ अगर देखिए मेरी जानिब
सारी दुनिया में मगर रोशनी कर जाऊँगा
उसके करम की बात न पूछो, साथ वो सब के होले है
इक दरवाज़ा बन्द अगर हो, सौ दरवाज़े खोले है
सरों पे माँ की दुआओं का शामियाना है
हमारे पास तो अनमोल ये ख़ज़ाना है
बहुत दिनों से थमा हुआ है बीच समन्दर एक जहाज़
धीरे धीरे डूब रहा हो, ये भी तो हो सकता है
जैसा मौक़ा देखे वैसी होले मेरी ग़ज़ल
वो बातें जो मैं नहीं बोलूँ बोले मेरी ग़ज़ल
तमाम सेह्न-ए-चमन बिजलियों की ज़द में है
मगर हमें तो यहीं आशियाँ बनाना है
हुक्म हुआ है काँच का बरतन सर पर रख कर नांच 'अज़ीज़'
बरतन में तेज़ाब भरा हो, ये भी तो हो सकता है
