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मुनफरीद अशआर : अकबर इलाहाबादी  Search similar articles
1. खिलाफ़-ए-शरअ बभी शेख थूकता भी नहीं
मगर अंधेरे उजाले में चूकता भी नहीं

2. रक़ीबों ने रपट लिखवाई है जा जाके थाने में
कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस ज़माने में

3. मज़हब ने पुकारा ऎ अकबर अल्लाह नहीं तो कुछ भी नहीं
यारों ने कहा ये क़ौल ग़लत, तनख्वाह नहीं तो कुछ भी नहीं

4. हम एसी कुल किताबें क़ाबिल-ए-ज़ब्ती समझते हैं
कि जिनको पढ़ के लड़के बाप को ख़ब्ती समझते हैं

5. हैं अमल अच्छे मगर दरवाज़ा-ए-जन्नत है बन्द
कर चुके हैं पास लेकिन नोकरी मिलती नहीं

6. शेखजी घर से न निकले और मुझसे कह दिया
आप बी.ए.पास हैं और बन्दा बीबी पास है

7. जान शायद फ़रिशते छोड़ भी दें
डॉक्टर फ़ीस को न छोड़ेंगे

8. ब्चश्म-ए-ग़ौर देखो बुबुल-ओ-परवाने की हालत
वो इसपीचें दिया करती है और ये जान देता है

9. वाइज़ का दिल भी सोज़-ए-मोहब्बत से गर्म है
चुप रहने पे न जाओ, ये दुनिया की शर्म है

10. तहज़ीब-ए-मग़रबी में है बोसा तलक मुआफ़
इससे अगर बढ़े तो शरारत की बात है

11. बूट डासन ने बनाया, मैंने इक मज़मूँ लिखा
मुल्क में मज़मूँ न फैला, और जूता चल गया

12. पूछा कि शग़्ल क्या है, कहने लगे गुरूजी
बस राम राम जपना, चेलों का माल अपना

13. हुए इस क़दर मोहज़्ज़िब कभी घर का मुँह न देखा
कटी उम्र होटलों में, मरे हस्पताल जाकर
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