यूँ ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ तेरे बग़ैर जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं ----जिगर
बे सहारे मैं जी गई कैसे तुमको क्या, खुद मुझे यक़ीन नहीं --एक खातून
मालूम थीं मुझे तेरी मजबूरियाँ मगर तेरे बग़ैर नींद न आई तमाम रात ----माइल नक़वी
हाथ रखकर मेरे सीने पे जिगर थाम लिया तुमने इस वक़्त तो गिरता हुआ घर थाम लिया---अमीर मीनाई
वीराँ है मैकदा खुम ओ साग़र उदास है तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के------फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मेरा खत उसने पढ़ा, पढ़ के नामाबर से कहा यही जवाब है इसका कि कुछ जवाब नहीं----अमीर मीनाई
अश्कों के निशाँ परचा ए सादा पे हैं क़ासिद अब कुछ न बयाँ कर ये इबारत ही बहुत है----एहसान अली
सब्र ए अय्यूब किया, गिरया ए याक़ूब किया हमने क्या क्या न तेरे वास्ते मेहबूब किया------शेख शर्फ़ुद्दीन मज़मूँ
क्या हुआ मर गया अगर फ़रहाद रूह पत्थर से सर पटकती है--------शाह मुबारक आबरू
हम भी कुछ खुश नहीं वफ़ा करके तुम ने अच्छा किया वफ़ा न की -------मोमिन
ये बज़्म-ए-मै है याँ कोताहदस्ती में है मेहरूमी जो बढ़कर खुद उठा ले हाथ में मीना उसी का है---शाद अज़ीम आबादी
बिना-ए-काबा पड़ती है जहाँ हम खिश्त ए खुम रख दें जहाँ साग़र पटक दें, चश्मा-ए-ज़म-ज़म निकलता है --- रियाज़
मैं समझता हूँ तेरी इशवागरी को साक़ी काम करती है नज़र, नाम है पैमाने का ------जलील
कौन भला रोता फिरता है, आधी आधी रातों को इस बादल के परदे में भी कोई दिलवाला होगा ------नामालूम
पता यूँ तो बताते हैं वो सब को लामकाँ अपना मगर मालूम, रहते हैं वो टूटे हुए दिल में -------अनीस दाऊद नगरी
जग में आकर इधर उधर देखा तू ही आया नज़र जिधर देखा ------मीर दर्द
जिसने बनाई बांसुरी गीत उसी के गाए जा साँस जहाँ तक आए जाए, एक ही धुन बजाए जा ---आरज़ू
अगर बख्शे ज़हे क़िस्मत, न बख्शे तो शिकायत क्या सर ए तसलीम खम है जो मिज़ाज ए यार में आए -----नामालूम
आशिक़ी से मिलेगा ए ज़ाहिद बन्दगी से खुदा नहीं मिलता ------दाग़
खुदा जाने ये दुनिया जल्वा गाहे नाज़ है किसकी हज़ारों उठ गए लेकिन वही रौनक़ है मजलिस की ---असीर
समझता हूँ कि दुनिया में हमेशा रंज सहना है मगर फिर क्या करूँ आसी, इसी दुनिया में रहना है ----आसी
दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ ---------अकबर इलाहाबादी
यही है ज़िन्दगी अपनी, यही है बन्दगी अपनी कि उनका नाम आया और गरदन झुक गई अपनी ---माहिरुल क़ादरी
पूछती है वो नरगिस ए मखमूर किसको दावा है, पारसाई का -----नामालूम
शब को मै खूब सी पी, सुबहा को तौबा करली रिन्द के रिन्द रहे, हाथ से जन्नत न गई ------जलाल
बात रिन्दी की मुझको आती है पारसाई की पारसा जाने ---------जोश मल्सियानी
वो है मुख्तार सज़ा दे कि जज़ा दे फ़ानी दो घड़ी होश में आने के गुनाहगार हैं हम -----फ़ाबदायूंनी नी
|