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ग़ज़लें : जिगर मुरादाबादी
3.
काम आख़िर जज़बए बैइख्तियार आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत से तड़पा उनको प्यार आ ही गया

जब निगाहें उठ गईं अल्लाहरे मेराजे शौक़
देखता क्या हूँ वो जाने इंतिज़ार आ ही गया

हाय ये हुस्ने तसव्वुर का फ़रेबे रंगोबू
मैंने समझा जैसे वो जाने बहार आ ही गया

हाँ, सज़ा दे ऐ ख़ुदा ए इश्क़ ऐ तौफ़ीक़े ग़म
फिर ज़ुबाने बेअदब पर ज़िक्रे यार आ ही गया

इस तरहा ख़ुश हूँ किसी के वादा ए फ़रदा पे मैं
दर हक़ीक़त जैसे मुझको ऐतबार आ ही गया

हाय, काफ़िर दिल की ये काफ़िर जुनूँ अंगेज़ियाँ
तुमको प्यार आए न आए मुझको प्यार आ ही गया

जान ही दे दी जिगर ने आज पाए यार पर
उम्र भर की बेक़रारी को क़रार आ ही गया

4.
कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन

कामिल रेहबर क़ातिल रेहज़न
दिल सा दोस्त न दिल सा दुश्मन

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन

उमरें बीतीं सदियाँ गुज़रीं
है वही अब तक अक़्ल का बचपन

इश्क़ है प्यारे खेल नहीं है
इश्क़ है कारे शीशा ओ आहन

ख़ैर मिज़ाजे हुस्न की यारब
तेज़ बहुत है दिल की धड़कन

आज न जाने राज़ ये क्या है
हिज्र की रात और इतनी रोशन

आ, के न जाने तुझ बिन कल से
रूह है लाशा, जिस्म है मदफ़न

काँटों का भी हक़ है कुछ आख़िर
कौन छुड़ाए अपना दामन
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