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ग़ा‍लिब की ग़ज़लें
3.
आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक

दाम हर मौज है हल्क़ा ए सद काम नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गोहर होने तक

आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून ए जिगर होने तक

हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम तुम को ख़बर होने तक

परतवे ख़ुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक

यक नज़र बेश नहीं फ़ुरसत ए हस्ती ग़ाफ़िल
गरमिए बज़्म है इक रक़्से शरर होने तक

ग़म ए हस्ती का असद किस से हो ज़ुज़ मर्ग इलाज
शमअ हर रंग में जलती है सहर होने तक
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