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ग़ज़लें : ग़ा‍लिब
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1.
मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए
जोश ए क़दह से बज़्म ए चिरागाँ किए हुए

करता हूँ जमअ फिर जिगरे लख्त लख्त को
अरसा हुआ है दावत ए मिज़गाँ किए हुए

फिर वज़ ए एहतियात से रुकने लगा है दम
बरसों हुए हैं चाक गरीबाँ किए हुए

फिर गर्म नाला हाय शररबार है नफ़स
मुद्दत हुई है सैर ए चिरागाँ किए हुए

फिर पुरशिशे जराहते दिल को चला है इश्क़
सामाने सद हज़ार नमकदाँ किए हुए

फिर भर रहा हूँ ख़ामा ए मिज़गाँ बख़ून ए दिल
साज़े चमन तराज़िए दामाँ किए हुए

बाहम दिगर हुए हैं दिल ओ दीदा फिर रक़ीब
नज़्ज़ारा ओ ख़्याल का सामाँ किए हुए

दिल फिर तवाफ़ ए कू ए मलामत को जाए है
पिनदार का सनमकदा वीराँ किए हुए
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