1. मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए जोश ए क़दह से बज़्म ए चिरागाँ किए हुए
करता हूँ जमअ फिर जिगरे लख्त लख्त को अरसा हुआ है दावत ए मिज़गाँ किए हुए
फिर वज़ ए एहतियात से रुकने लगा है दम बरसों हुए हैं चाक गरीबाँ किए हुए
फिर गर्म नाला हाय शररबार है नफ़स मुद्दत हुई है सैर ए चिरागाँ किए हुए
फिर पुरशिशे जराहते दिल को चला है इश्क़ सामाने सद हज़ार नमकदाँ किए हुए फिर भर रहा हूँ ख़ामा ए मिज़गाँ बख़ून ए दिल साज़े चमन तराज़िए दामाँ किए हुए
बाहम दिगर हुए हैं दिल ओ दीदा फिर रक़ीब नज़्ज़ारा ओ ख़्याल का सामाँ किए हुए
दिल फिर तवाफ़ ए कू ए मलामत को जाए है पिनदार का सनमकदा वीराँ किए हुए
|