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ख्वाजा मीर दर्द देहलवी
2.

हमने किस रात नाला सर न किय
पर उसे आह ने असर न किय

सबके हाँ तुम हुए करम फ़रम
इस तरफ़ को कभी गुज़र न किय

क्यूँ भवें तानते हो बन्दानवा
सीना किस वक़्त में सिपर न किय

कितने बन्दों को जान से खोय
कुछ ख़ुदा का भी तूने डर न किय

देखने को रहे तरसते हम
न किया रहम तूने पर न किय

आप से हम गुज़र गए कब क
क्या है ज़ाहिर में गो सफ़र न किय

कौन सा दिल है वो के जिस में आह
ख़ाना आबाद तूने घर न किय

तुझसे ज़ालिम के सामने आय
जान का मैंने कुछ ख़तर न किय

सबके जोहर नज़र में आए दर्
बेहुनर तूने कुछ हुनर न किया।
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