सर बवक्त ए ज़िबह अपना उसके ज़ेर-ऐ-पाए है ये नसीब, अल्लाहो अकबर, लोटने की जाए है
रुख़सत ऐ रिन्दाँ ! जुनू ज़ंजीर-ए-दर खड़काए है मुजदः ख़ार-ए-दश्त फिर तलवा मेरा खुजलाए है
दम की दम सीने में आकर ज़ो'फ़ से ये गुफ़्तगू देखिए अब तक खुदा किस तरह से पोंहचाए है
बस करम सोज़ दुरूँ भुन जाएँगे दिल और जिगर रहम जोश ए गिरया छाती फिर अभी भर आए है
नज़्अ में भी ज़ोक को बड़ा ही है बस इन्तिज़ार जानिब ए दर देख ले है जब के होश आ जाए है
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