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हिन्दी की फिल्मों, गानों, टी.वी. कार्यक्रमों ने हिन्दी को कितना लोकप्रिय बनाया है- इसका आकलन करना कठिन है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान में हिन्दी पढ़ने के लिए आने वाले 67 देशों के विदेशी छात्रों ने इसकी पुष्टि की कि हिन्दी फिल्मों को देखकर तथा हिन्दी फिल्मी गानों को सुनकर उन्हें हिन्दी सीखने में मदद मिली।

लेखक ने स्वयं जिन देशों की यात्रा की तथा जितने विदेशी नागरिकों से बातचीत की उनसे भी जो अनुभव हुआ उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि हिन्दी की फिल्मों तथा फिल्मी गानों ने हिन्दी के प्रसार में अप्रतिम योगदान दिया है। सन्‌ 1995 के बाद से टी.वी. के चैनलों से प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता भी बढ़ी है।

इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि जिन सेटेलाइट चैनलों ने भारत में अपने कार्यक्रमों का आरम्भ केवल अंग्रेजी भाषा से किया था; उन्हें अपनी भाषा नीति में परिवर्तन करना पड़ा है। अब स्टार प्लस, जी.टी.वी., जी न्यूज, स्टार न्यूज, डिस्कवरी, नेशनल ज्योग्राफिक आदि टी.वी.चैनल अपने कार्यक्रम हिन्दी में दे रहे हैं। दक्षिण पूर्व एशिया तथा खाड़ी के देशों के कितने दर्शक इन कार्यक्रमों को देखते हैं- यह अनुसन्धान का अच्छा विषय है।

सन्‌ 1984 से सन्‌ 1988 के बीच लेखक ने यूरोप के 18 देशों की यात्राएँ कीं। यूरोप के देशों में कोलोन, बीबीसी, ब्रिटिश रेडियो, सनराइज, सबरंग के हिन्दी सेवा कार्यक्रमों को हिन्दी प्रेमी बड़े चाव से सुनते हैं। यूरोप के देशों में ऐसी गायिकाएँ हैं जो हिन्दी फिल्मों के गाने गाती हैं तथा स्टेज शो करती हैं ।

विदेश प्रवास की उक्त अवधि में जो फिल्मी गाने विभिन्न यूरोपीय देशों में सर्वाधिक लोकप्रिय थे उनके नाम इस प्रकार हैं- आवारा हूँ, मेरा जूता है जापानी, सर पर टोपी लाल, हाथ में रेशम का रूमाल, हो तेरा क्या कहना। जब से बलम घर आए जियरा मचल मचल जाए। आई लव यू, मुड़-मुड़ के न देख, मुड़-मुड़ के। ईचक दाना बीचक दाना दाने ऊपर दाना छज्जे ऊपर लड़की नाचे लड़का है दीवाना। मेघा छाए आधी रात निदिंया हो गई बैरन मौसम है आशिकाना है दिल कहीं से उनको ढूँढ लाना, दम मारो दम, मिट जाए गम, सुहाना सफर है, तेरे बिना जिन्दगी से कोई शिकवा तो नहीं, बोल रे पपीहरा, चन्दो ओ! चन्दा, यादों की बारात निकली है या दिल के द्वारे, जिन्दगी एक सफर है सुहाना यहाँ कल क्या हो किसने जाना। न कोई उमंग है न कोई तरंग है मेरी जिन्दगी है क्या ? एक कटी पतंग है। बहारों! मेरा जीवन भी संवारों, आ जा रे परदेसी, मैं तो खड़ी इस पार ।

सन्‌ 1995 के बाद टेलिविजन के प्रसार के कारण अब विश्व के प्रत्येक भूभाग में हिन्दी फिल्मों तथा हिन्दी फिल्मी गानों की लोकप्रियता सर्वविदित है।
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