-अंकित श्रीवास्तव सुदर्शन फाकिर नहीं रहे। उन्होंने दिल को छू लेने वाली गजलें लिखीं, लेकिन हमेशा परदे के पीछे रहे। उनकी गजलों को गाकर जगजीत गायक बनें। गजलों की बेगम, बेगम अख्तर ने भी उनकी नज्मों को गाया। तो रफी और भूपिंदर ने भी गजलों की तासीर समझकर उन्हें आवाज दी। समाज और स्वभाव की केमिस्ट्री को समझने वाले इस शायर को हमारी श्रद्धांजलि। लेकिन इस बात का जरूर अफसोस हो रहा है कि सुदर्शन को बहुत कम लोग जानते हैं। शायद सुदर्शन ने भी कभी नहीं चाहा। कोई उम्मीद नहीं की पहचान मिलने की- आदमी आदमी को क्या देगा जो भी देगा वो खुदा देगा
जालंधर में 1935 में जन्मे सुदर्शन फाकिर असल में गजलों के अमीर थे। उनकी गजलों की रोशनी में कई गायकों के घर रोशन हुए। शुरुआती दिन जालंधर में बीते। आकाशवाणी में काम करने के बाद मुंबई का रुख किया और कई संगीत-निर्देशकों के लिए गाने लिखे। नज्मों और शेरों के अपने खुले अंदाज के कारण सराहे भी गए। बेगम अख्तर, मुहम्मद रफी, भूपिंदर, मिताली और जगजीत-चित्रा ने उनकी कई गजलों को आवाज दी।
सुदर्शन फाकिर की शेरो-शायरी के केंद्र में दो दिलों का प्यार है, टूटे दिलों के लिए समझाईश है, तो समाज में अमन-चैन लाने की तड़प भी है - आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंजर क्यूँ है जख्म हर सर पे, हर हाथ में पत्थर क्यूँ है। जब हकीकत है, के हर जर्रे में तू रहता है, फिर जमीन पर कहीं मस्जिद, कहीं मंदिर क्यूँ है।
73 साल के फाकिर के पास भरपूर प्यार था, जिसे उन्होंने खूब बाँटा। लेकिन बचपन की यादें ताउम्र उनके साथ जुड़ी रहीं।
ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो भले छिन लो मुझसे सारी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी।
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