बाली उमर में पहला प्यार

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प्रीत‍ि सोनी 
एक नाम सुनते ही अचानक से दूसरी दुनिया में खो सी गई थी रिया। कॉलेज की जिंदगी का आखि‍री साल था, और गर्मी की सुबह पेपर देने जाते वक्त पुराने दिनों की याद उसे हमेशा की तरह आ ही गई थी। जब वह किशोरावस्था की चौखट पर जाकर खड़ी ही थी, उसे अपने रंग रूप पर थोड़ा-थोड़ा गुमान होने लगा था। उसकी उम्र से कुछ साल बड़े युवा लड़कों की निहारती आंखें, उसे इतना तो बता ही चुकी थी कि वह खूबसूरत है। जब भी वह कहीं जाती, लोग भीड़ में भी उसे निहारते....कभी- कभी वह मन ही मन इतराती, तो कभी गंदी निगाहों से खुद को बचाती। लेकिन उसका मन कहीं जाकर अटका हो, ऐसा तो अब तक नहीं हुआ था।
 
नजरें टिकी न थी किसी पे, पर नजरें कमाल थी 
सब ताकते थे उसको, वो बेमिसाल थी  >
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एक रात चाची के घर बैठ कर टीवी देख रही थी, उसी वक्त दरवाजे पर कोई आया था। दरवाजा खुला हुआ था। रिया ने झांक कर देखा, तो बाहर कोई रिश्तेदार दरवाजे पर खड़ा था। चाची ने उन्हें अंदर बुलाया। रिया को इससे कोई मतलब नहीं था, कि घर में कौन आया है। उसे बस अपने टीवी देखने से मतलब था, जो वह बड़ी तल्लीनता से देख रही थी। इतनी देर में रिश्तेदार भी उसी कमरे में आकर बैठ गए जहां रिया तकिये से टिककर टीवी देख रही थी। लेकिन रिश्तेदार के साथ जो अजनबी चेहरा कमरे में दाखि‍ल हुआ, तो रिया का ध्यान अचानक ही उस चेहरे पर चला गया। सांवला सा चेहरा था। रिया चुपचाप उठकर किचन में चली गई। नाश्ता बनाने में चाची की मदद करने के लिए। 
 
देखकर भी अनदेखा करना, जानते हैं मगर 
ध्यान कैसे हटाएं ये जान न पाया कोई 
 
चाची, पकौड़े का घोल तैयार कर पकौड़े तल रही थी, इतने में रिया के भैया भी आ गए, और उस नवेले चेहरे की पूछताछ शुरू हो गई। निशांत नाम था उसका। और वह रिया के घर के पीछे सफेद वाले घर में रहता था। लेकिन रिया के भैया के मुताबिक वह सफेद घर तो किसी पुलिस वाले का था। भैया ने फिर पूछा- कि आपके घर में कोई पुलिस वि‍भाग में है क्या ... जवाब आया.. हां मेरे फूफाजी हैं। भैया तो संतुष्ट हो गए लेकिन एक कन्फ्यूजन जरूर हो गया।   
वो कुछ और कहते रहे, हम कुछ और समझ बैठे 
इसी गलतफैमी में, दिल किसी और को दे बैठे 
 
बातों का सिलसिला चल ही रहा था इतने में रिया गरम-गरम पकौड़े लेकर कमरे में आई। रिया ने जिद कर-कर के बड़े प्यार से उन लोगों के पकौड़े खिलाए। नाश्ता चल ही रह था, कि रिया उठकर कमरे से बहर जाने लगी। रास्ते में कुर्सियां रखी हुई थी, जिन्हें हटाते हुए निशांत ने रिया के लिए रास्ता बनाया। बस फिर क्या था, बाली उमर पर लड़कों की इन्हीं शराफत का अक्सर का जादू चल जाता है, सो चल ही गया ....।  
 
वो मनचलों पर न मचला जो दिल था मेरा 
तेरी शराफत पे सब जीत कर भी हार बैठे हम 
 

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