नई जमीं की तलाश

जीवन के रंगमंच से.... > भोर होते ही आंखों में बसा स्वप्न हर रोज की तरह विदा हो गया, सोचतीं हूं कितना अजीब है यह स्वप्न रात भर आंखों में बसा रहता है, कभी हंसाता है, कभी रुलाता है, कभी अपनों से जोड़ देता है,कभी परायों से,कभी चिंता में डाल देता है ,कभी चिंतन में,कभी बैचेन कर जाता है,कभी मुस्कराहट बिखेर जाता है। >
 
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कभी मैं उसके संग रहता चाहती हूं और सोचती हूं नींद से कोई न जगाए,इसी स्वप्न के साथ जीने दो,कभी इतना डरा जाता है कि घबराकर मेरी आंखें खुल जाती हैं, और मुसीबत तब आती है जब यह निगोड़ा आधी रात में डराता है, फिर लाख कोशिशें करो कमबख्त नींद भी इससे डर कर भाग जाती है।

हर नारी की तरह मेरा भी स्वप्नों से गहरा नाता है,वह मीठे-मीठे प्यारे प्यारे मधुर स्वप्न जो अभी कच्ची अवस्था में जागते आंखों में बसते थे,अपने आने वाले सुनहरे,संतरंगी भावी जीवन के लिए। उम्र बढ़ने के साथ हकीकत के गहरे रंग के साये में स्वप्नों के कोमल रंग फीके पड़ जाते हैं जागते हुए, हमारा संघर्ष क्या कभी ख़त्म भी होगा?


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