दीपावली : 'प्रेम-रश्मि से आलोकित करें हृदय को'

diwali
महेन्द्र भदौरिया 'रश्मि   
हम अनंतकाल से परंपरास्वरूप को मना रहे हैं। प्रतीकस्वरूप दीपमालाएं प्रज्वलित कर बाह्य जगत के तमस को मिटाने की चेष्टा भी करते हैं। दुर्भाग्यवश हमने अपने भीतर के तमस को मिटाने की ओर कभी चिंतन ही नहीं किया। क्या बाहरी ज्योति हमारे अंतर्मन के अंधकार को मिटाने में सक्षम है? क्या बाहरी प्रकाश हमारे हृदय-आंगन को आलोकित करने में समर्थ है? यदि हम आत्मा के गहनतम बिंदु से भी चिंतन करें, तो उक्त प्रश्नों का उत्तर सिर्फ 'नहीं' में होगा।  >
 
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यदि हम गंभीरतापूर्वक इन प्रश्नों का हल खोजें तो हमारा सिर्फ और सिर्फ प्रेम-दीपक की ओर ही ध्यान जाएगा जिसकी पावनी रश्मियां आत्मा के कक्ष को अपनी स्वर्णिम आभा से प्रकाशित कर सकती हैं। हम मूल रूप से आत्मा हैं तथा आत्मा परमात्मा का अविभाज्य अंश है। परमात्मा स्वयं प्रेमस्वरूप हैं तो आत्मा भी प्रेमस्वरूप होगी। प्रकृति का नियम है, जैसा अंशी होगा, वैसा ही अंश होगा। 
 
प्रेम परमात्मा का प्रसाद तथा आत्मा की अनंत प्यास। बाह्य जगत की कोई भी वस्तु हमारी आत्मा को आर्द नहीं कर सकती, जबकि प्रेम की एक बूंद ही आत्मा को नम करने के लिए पर्याप्त है। हमें चाहे दुनिया की दौलत मिल जाए, चाहे हम दुनिया के सर्वोच्च पद पर पहुंच जाएं, लेकिन ये सब हमारे 'भीतर की रिक्तता' को नहीं भर सकते। यदि ऐसा संभव होता तो सिकंदर, नेपोलियन, राक फेलर जैसे लोग अतृप्त, निराश एवं अवसाद में नहीं मरते। जीवन की सार्थकता ही प्रेमपूर्ण जीवन जीने में है। प्रेमरहित जीवन निरर्थक तथा एक दुर्घटना है। इस संदर्भ में एक छोटी-सी कहानी है। एक फकीर किसी बाजार से गुजर रहा था। उस बाजार में एक अंधा भिखारी भीख मांग रहा था। जब फकीर ने उसे कुछ देने के लिए जेब में हाथ डाला तो जेब खाली मिली। निराश फकीर ने उस भिखारी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, 'भाई, अभी मेरे पास पैसे नहीं है, लेकिन अगली बार यहां से गुजरा तो अवश्य कुछ दूंगा।' यह सुन वह भिखारी रोने लगा। जब फकीर ने रोने का कारण पूछे तो वह भिखारी बोला, 'आज तक लोगों से सिर्फ उपेक्षा एवं अपमान ही मिला, लेकिन आज पहली बार किसी ने मेरा हाथ अपने हाथ में मिलाया, मुझे पहली बार प्रेम मिला, अभी तक सिर्फ पैसा मिलता था। आपके प्रेम के कारण मेरा हृदय भर आया और अश्रु छलक पड़े।' 
 
प्रेम जीवन से भी बड़ा है, क्योंकि इस प्रेम को बचाने के लिए लोग अपना जीवन दांव पर लगा देते हैं। यदि हमारे जीवन की प्राथमिकता यदि प्रेम के अतिरिक्त कुछ और है, तो समझ लीजिए, हमारा जीवन गलत मार्ग की ओर जा रहा है। हमें फिर से अपने जीवन-पथ के बारे में सोचना होगा। प्रेम ही एकमात्र संपदा है जिसे मौत नहीं छीन सकती है। हमारे महल, सोना-चांदी, पद-प्रतिष्ठा सांसों की लड़ी टूटते ही समाप्त हो जाएंगे, लेकिन प्रेम जन्म-जन्मांतरों तक रहता है। किसी शायर ने कहा है, 'दुनिया में खूब कमाया, क्या हीरे, क्या मोती, याद रखना भाई मेरे कफन में जेब नहीं होती।' प्रेम मृत्यु से परे है, प्रेम मृत्यु के पार है।  प्रेम हृदय की वीणा पर बजा राग है, प्रेम किसी पर मिट जाने की आग है। प्रेम जीवन का सार है, प्रेम ही जीवन-आधार है। 
 
प्रेम शबरी के बेर हैं, तो विदुर का साग है। प्रेम गोपियों का माखन है, तो प्रेम वानरों का अनुराग है। इस चराचर जगत में चाहे पशु हो या वनस्पति सभी की गहनतम अभीप्सा प्रेम है। वैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया कि प्रेमपूर्ण व्यवहार से फसलों का उत्पादन बढ़ता है। प्रेमपूर्ण व्यवहार से थाईलैंड के बौद्ध विहार में बाघ अपनी हिंसा वृत्ति को भूलकर पालतू कुत्तों की तरह व्यवहार करते हैं। 
 
दीपावली का पर्व तभी सार्थक होगा, जब अपने हृदय को प्रेम-रश्मि से आलोकित करें। हृदय में छिपा छल, कपट, घृणा, वैमनस्य का अंधकार प्रेम के प्रकाश से ही विनष्ट हो सकता है। जब तक हम स्वयं प्रेमपूर्ण न होंगे, तब तक किसी अन्य में प्रेम का संचार नहीं कर सकते, क्योंकि एक बुझा हुआ दीपक किसी अन्य दीपक को प्रज्वलित नहीं कर सकता। प्रेम की ज्योति से ही हम घृणा के तम पर जय प्राप्त कर सकते हैं।   

 
त्योहारों का उद्देश्य मात्र परिपाटी का निर्वहन नहीं अपितु, जीवन मूल्यों का पुनर्स्मरण है। यदि उन मूल्यों को विस्मृत कर त्योहार मनाते हैं, तो यह त्योहार की आत्मा के साथ खिलवाड़ है। ऐसा त्योहार आत्माहीन एवं निरुद्देश्य है। दीपोत्सव का पर्व मनाने का एकमात्र तरीका है कि हम हमारी आत्मा को दीपक बनाकर उसमें प्रेम-रश्मि आलोकित कर स्वयं एवं अन्यों के जीवन को रोशन करें तो हमारा संपूर्ण जीवन ही दीपावली हो जाएगा। निःस्वार्थ भाव से प्रेम बांटें एवं अनंत गुना प्रेम पाएं। प्रकृति का यह नियम है, हमें वही मिलता है, जो हम औरों को देते हैं। 
 
दिवाली का दीया जलाने से पहले,
दिलों का दीया जलाना पड़ेगा। 
घरों का अंधेरा मिटाने से पहले,
दिलों का अंधेरा मिटाना पड़ेगा। 

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