भारत में बढ़ते ग्रैजुएट घटता कौशल

पुनः संशोधित शुक्रवार, 13 अप्रैल 2018 (12:00 IST)
में हर साल दुनिया के बाकी देशों के मुकाबले ज्यादा ग्रैजुएट तैयार होते हैं। लेकिन बावजूद इसके विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग व मैथेमेटिक्स यानी स्टेम (STEM) क्षेत्र में कुशल प्रतिभाओं की कमी का स्तर लगातार बढ़ रहा है।
वर्ष 2014 में यह औसत कमी छह फीसदी थी जो वर्ष 2018 में बढ़ कर 12 फीसदी तक पहुंच गई है। एक हालिया सर्वेक्षण में इसका खुलासा हुआ है। देश में 2016 में निकले 78 लाख नए ग्रैजुएटों में से 26 लाख स्टेम क्षेत्र के ही थे। लेकिन इसके बावजूद उनमें कुशलता की कमी के चलते कई नौकरियों के लायक योग्य उम्मीदवार नहीं मिल सके।

केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से 2011-12 में कराए गए एक अध्ययन में कहा गया था कि देश में उच्चशिक्षा संस्थानों में दाखिला लेने वाले छात्रों में 0.5 यानी आधे फीसदी से भी कम छात्र पीएचडी करते हैं। इससे शोध के क्षेत्र में उनकी घटती दिलचस्पी का पता चलता है। ऊपर से अब स्टेम क्षेत्र में कुशल प्रतिभाओं की लगातार घटती तादाद ने हालात और गंभीर बना दिया है। देश में शोध के क्षेत्र में ज्यादा अवसर नहीं होने की वजह से प्रतिभा पलायन भी हो रहा है।
सर्वेक्षण
मुहैया कराने वाले ऑनलाइन पोर्टल इंडीड (INDEED) की ओर से किए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा ग्रैजुएट तैयार करने के बावजूद भारत में स्टेम के क्षेत्र में कुशल प्रतिभाओं की कमी का आंकड़ा बढ़ रहा है। स्टेम प्रतिभाओं को रोजगार देने वालों में सूचना तकनीक, बैंकिंग व वित्तीय सेवा क्षेत्र सबसे अग्रणी हैं।
इन कंपनियों में स्टेम ग्रैजुएट सॉफ्टवेयर इंजीनियर, बिजनेस एनालिस्ट, वेब डेवलपर और सैप कंसल्टेंट जैसे पदों पर काम करते हैं। सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रतिभा होने के बावजूद के अभाव में कुछ नौकरियों के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिल पाते। रिपोर्ट में स्टेम छात्रों की पसंद के आधार पर रोजगार के लिहाज से देश की दस शीर्ष कंपनियों की एक सूची भी बनाई गई है।
शिक्षाविदों और उद्योग क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि कॉलेजों के पाठ्यक्रमों और उद्योग की उम्मीदों के बीच की खाई ही इस समस्या की सबसे प्रमुख वजह है। इंडीड के प्रबंध निदेशक शशि कुमार कहते हैं, "दुनिया भर में हर साल तैयार होने वाले ग्रैजुएटों में सबसे ज्यादा भारत में ही हैं। ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के विस्तार के चलते यह तादाद हर साल बढ़ती ही जा रही है।"

समस्या : शिक्षाविदों का कहना है कि दो दशक पहले तक आईआईटी समेत देश के शीर्ष तकनीकी संस्थानों में दाखिला लेने वाले छात्र शोध में दिलचस्पी रखते थे। लेकिन अब ऐसे संस्थान बेहतर वेतन-सुविधाओं वाली नौकरी पाने का जरिया बन गए हैं। कुछ साल पहले ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन की ओर से देश भर में थोक भाव में निजी इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना को मंजूरी देने की वजह से स्टेम क्षेत्र को भारी झटका लगा था।
काउंसिल ने तब यह सोचकर इंजीनियरिंग कालेजों को मान्यता दी थी कि भविष्य में इंजीनियरिंग शिक्षा की मांग काफी बढ़ेगी। लेकिन इससे इंजीनियरिंग की डिग्री के मूल्य में तो गिरावट आई ही, शिक्षा व प्रशिक्षण की गुणवत्ता का स्तर भी गिरा। इसी वजह से हाल के कुछ वर्षों के दौरान दर्जनों निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों पर ताले लग चुके हैं। इनमें से कुछ कॉलेजों को तो कई विभागों में एक छात्र भी नहीं मिल रहा था। नतीजतन पहले उन विभागों को बंद किया गया और फिर पूरे कॉलेज को।
चुनौतियां : शिक्षाविदों का कहना है कि भारत में स्टेम क्षेत्र को कई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा को तरजीह देने की वजह से की पढ़ाई और शोध को समुचित महत्व नहीं मिल पा रहा है।

फिजिक्स के पूर्व प्रोफेसर डॉ. मनोरंजन घोष दस्तीदार कहते हैं, "फिलहाल इंजीनियरिंग व मेडिकल डिग्री का मकसद मोटे वेतन वाली नौकरी हासिल करने तक ही सिमट गया है। ऐसे में कोई शोध की ओर नहीं जाना चाहता। इसके अलावा देश में शोध के क्षेत्र में जाने वालों को प्रोत्साहन की भी कोई ठोस नीति नहीं है।"
वह कहते हैं कि देश में आधारभूत ढांचे की कमी और शोध के क्षेत्र में भेदभाव के चलते कई प्रतिभाशाली छात्र विदेशों का रुख कर लेते हैं। शोध के क्षेत्र में करियर से संबंधित जरूरी सूचनाओं और जागरुकता का भी भारी अभाव है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ शीर्ष संस्थानों के अलावा कहीं भी शोध के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा मौजूद नहीं है। स्टेम के क्षेत्र में लैंगिक भेदभाव की वजह से ज्यादा महिलाएं शोध के लिए आगे नहीं आतीं। सूचना क्षेत्र के अलावा स्टेम क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी नगण्य है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं।
सरकार ने अब तक महिलाओं को इस क्षेत्र में आने की लिए प्रोत्साहित करने की दिशा में कुछ भी नहीं किया है। यूनेस्को के अनुमान के मुताबिक भारत में कुल शोधार्थियों में से महज 14 फीसदी ही महिलाएं हैं।

स्टेम के क्षेत्र में सक्रिय सरकारी व निजी संस्थानों को पहले अपनी कमियों की शिनाख्त कर उनको दूर करने की दिशा में ठोस कदम उठाना होगा। इसमें दो चीजों की भूमिका अहम है। पहला संस्थान में समुचित आधारभूत ढांचे और स्टेट ऑफ आर्ट प्रयोगशालाओं की स्थापना और दूसरा योग्य शिक्षकों की बहाली। इसके बिना स्टेम क्षेत्र की प्रतिभाओं में कौशल की कमी दूर करना संभव नहीं होगा।
रिपोर्ट प्रभाकर, कोलकाता


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