अंडमान के दुर्लभ आदिवासियों पर मंडरा रहा है संकट

पुनः संशोधित मंगलवार, 27 नवंबर 2018 (12:08 IST)
कानून लचीला कर के 29 द्वीपों को में लाने की की कोशिश दुर्लभ मनुष्य प्रजातियों के लिए खतरा बन सकती हैं। ताजा मिसाल है एक अमेरिकी मिशनरी की पर हुई मौत। विशेषज्ञों ने भी सवाल उठाए हैं।

अंडमान निकोबार द्वीप समूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप से अमेरिकी मिशनरी की लाश को निकालने के लिए भारतीय पुलिस जद्दोजहद कर रही है। लेकिन नृविज्ञानियों, आदिवासी मामलों के जानकारों और पर्यावरण और पारिस्थितिकी के विशेषज्ञों ने ऐसी किसी भी कोशिश को कानूनी और नैतिक तौर पर गलत बताया है। उनका कहना है कि ये सेंटिनल आदिवासियों के जीने के अधिकार का भी उल्लंघन है।


16 नवंबर को मीडिया में अंडमान पुलिस और स्थानीय मछुआरों के हवाले से अमेरिका के एक युवा मिशनरी और दुस्साहसी घुमक्कड़ की सेंटिनल द्वीप पर मौत की खबर आई। बताया जाता है कि सेंटिनल आदिवासियों ने मार कर उनकी लाश द्वीप पर ही दफना दी। अंडमान पुलिस ने "अज्ञात आदिवासियों" के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। लाश हासिल करने के लिए द्वीप के हवाई और जलीय निरीक्षण की कोशिश की गई लेकिन पुलिस के मुताबिक ये देखा गया कि आदिवासी द्वीप के उस कोने पर अपने धनुष बाण के साथ तैनात हैं, जिस जगह संभवतः चाउ की लाश दफनाई गई हो सकती है।

2006 में भी ऐसा ही मामला सामने आया था जब सेंटिनल द्वीप के तट के पास पहुंच गए दो मछुआरों को आदिवासियों ने मार कर वहीं बांस के डंडों पर लटका दिया था। उस समय दबावों के बावजूद लाशें न उठाने का फैसला किया गया था क्योंकि उससे सेंटिनल आदिवासियों के द्वीप पर गैरकानूनी दखल सा हो जाता और विशेषज्ञों ने इस तरह की किसी कार्रवाई से हर हाल में दूर रहने को कहा था। कमोबेश वैसी ही स्थिति आज सामने है।

लेकिन हैरानी है कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने ही इस साल अगस्त में यही नियम लचीला कर दिया था, जिसके आधार पर संभावना है कि जॉन चाउ वहां जाने का दुस्साहस कर बैठा और मछुआरे भी उसे ले जाने को तैयार हो गए। अंडमान के 29 समूहों को इस साल पर्यटन के लिए खोल दिया था, जिनमें ये उत्तरी सेंटिनल द्वीप भी एक है। यानी ये द्वीप, निषिद्ध क्षेत्र परमिट (आरएपी) के दायरे से बाहर कर दिए गए।

अंडमान निकोबार के द्वीपों में से एक विलुप्ति की कगार पर आ गए सेंटिनल आदिवासियों का द्वीप है। इनकी संख्या अब करीब 100 के करीब बताई जाती है। माना जाता है कि सेंटीनल आदिवासी करीब 60 हजार वर्षों से घुमंतु शिकारियों की तरह वहां रहते आए हैं। 70 और 90 के दशकों में भी उनसे संपर्क की कोशिशें बेकार गई थीं। भारत सरकार ने सेंटिनलों को "विशेष तौर पर अतिसंवेदनशील आदिवासी समूह" (पर्टिकुलरली वलनरेबल ट्राइबल ग्रुप, पीवीटीजी) के रूप में चिंहित किया है।

ये भी समझ नहीं आता कि एक तरफ क्षेत्र से प्रतिबंध हटाया जा रहा है, दूसरी ओर सात मछुआरे कानूनी कार्रवाई के घेरे में हैं। इसे लेकर मानवाधिकार संगठन आक्रोशित हैं और उनके खिलाफ किसी भी कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं। निर्धारित कानूनों की अनदेखी कर और पुलिस प्रशासन की नाक के नीचे चाउ द्वीप तक पहुंचने में कामयाब हो गया, ये भी रहस्य ही लगता है।


कुछ मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जॉन चाउ क्योंकि ईसाइयत के प्रचार से भी जुड़ा था, लिहाजा उसे सेंटिनल आदिवासियों को धार्मिक दीक्षा और "ईसा का संदेश" उन तक पहुंचाने की सूझी। हालांकि आधिकारिक तौर पर अभी स्पष्ट नहीं है कि जॉन चाउ ने ये जोखिम धार्मिक जुनून में लिया या घुमक्कड़ी और रोमांच के जुनून में। लेकिन ये तो स्पष्ट है कि उनकी प्राणघातक "नादानी" ने सेंटिनल आदिवासियों को भी भारी जोखिम में डाल दिया है, जो बाहरी हस्तक्षेप, बीमारी या संक्रमण से अभी तक अपने स्तर पर खुद को बचाए हुए थे और अपने ढंग से जीवनयापन कर रहे थे। लाश को वहां से हटाने की पुलिस और प्रशासन की चिंता में एक पहलू ये भी जुड़ा है।

जाहिर है, घोर लापरवाही और कानूनों के पालन में गंभीरता के अभाव का भी पता चलता है। जॉन चाउ की गतिविधियों को लेकर जब इतनी सारी बातें पहले ही पब्लिक डोमेन में थी और उनकी हरकतों का अंदाजा भी किसी न किसी रूप में स्थानीय लोगों को था, फिर क्यों उन्हें लेकर इतनी असावधानी बरती गई? ये एक नाजुक मामला इसीलिए है कि गिनती के बचे हुए सेंटिनलों को अतिक्रमण से सुरक्षित रखने की जरूरत है। आदिवासी मामलों के जानकार, नृविज्ञानी, पर्यावरण और पारिस्थितिकी और स्वास्थ्य और चिकित्सा विशेषज्ञों से बातचीत की जरूरत है। उन्हीं की सलाह के बाद अगला कोई कदम उठाना चाहिए।

पुलिस अपने सुरक्षा उपाय मजबूत करे, कानून के पालन के लिए स्थानीय लोगों के बीच जागरूकता अभियान चलाए, उनका पालन सुनिश्चित करे और अंडमान के निर्धारित पर्यटन स्थलों के होटलों और लॉज मालिकों को ताकीद करे कि कोई भी ऐसा यात्री जो किसी तरह की ऐसी मंशा जाहिर करे, उसके बारे में पुलिस को सावधान किया जाए। हालांकि ये ऐसे कोई काम नहीं हैं, जो पहले से न किए जा रहे हों लेकिन इस मामले ने दिखाया है कि कैसे हर मोड़ पर सावधानियों और निर्देशों की अनदेखी हुई है। और भारत सरकार को भी अंडमान के इन अत्यंत संवेदनशील द्वीप समूहों को पर्यटन के लिए खोल देने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्या कथित विकास का पैराशूटी मॉडल मानव सभ्यता के इन दुर्लभतम प्रतिनिधियों से ज्यादा जरूरी और बड़ा है?

रिपोर्ट शिवप्रसाद जोशी




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