#अधूरीआजादी : "सारे जहां से अच्छा" लिखने वाले इक़बाल का दिल क्यों बदल गया?

अल्लामा इक़बाल ने सन् सत्ताइस में जब "जावेदनामा" लिखना शुरू किया था, तब तक भी हिंदुस्तान की साझा तहज़ीब उनके ज़ेहन पर छाई हुई थी, अलबत्ता वे उसके आख़िरी दिन ज़रूर थे!
बाद उसके, "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा" जैसा तराना रचने वाले अल्लामा का दिल मुसलमानों के लिए एक मुख़्तलिफ़ मुल्क की तख़लीक़ में बारे में सोचने लगा। ये इक़बाल ही थे, जिन्होंने जिन्ना को "मुस्ल‍िम लीग" का सरपरस्त बनने के लिए राज़ी किया था, और फिर उसके बाद जो हुआ, वो इतिहास के वरक़ों पर दर्ज है!

लेकिन मैं यहां इक़बाल की क़ौमी सियासत के बारे में बात नहीं कर रहा, मैं यहां उस आलातरीन शाइर के बारे में बात कर रहा हूं, जो हिंदुस्तान की ज़मीन में ऐसे धंसा हुआ था, जैसे कोई बरगद का दरख़्त, जिसकी ना केवल जड़ें धरती में गड़ी हों, बल्कि जिसके जटा-जूट भी उसी धरती को छूने के लिए बढ़ रहे हों। और हिंदुस्तान ही क्यों, दुनिया-जहान के फ़लस्फ़ों में जिसकी शाख़ें लहराती हों, ख़ासतौर पर जर्मनी और इटली के क्लासिकी महाकाव्यों में, यहां मैं उस इक़बाल की बात करना चाहता हूं।
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यही वो इक़बाल था, जिसने दान्ते की "डिवाइन कॉमेडी" की तर्ज पर सन् सत्ताइस में "जावेदनामा" लिखना शुरू किया और फिर अगले छह सालों तक वो फ़ारसी ज़बान में इस किताब को लिखता रहा।

दान्ते की "डिवाइन कॉमेडी" एक ऐसी चेतना की यात्रा है, जो मृत्यु के उपरान्त "इनफ़र्नो", "पर्गेतोरियो" और "पैरादिसो" से होकर गुज़रती है। जब इक़बाल ने "जावेदनामा" में अपना तसव्वुर एक ऐसी चेतना की तरह किया था, जो सात सितारों को लांघकर ख़ुदाई क़ायनात तक पहुंचती है, तो उसके ज़ेहन में यक़ीनन उस "शबे-मेराज़" की याद रही होगी, जब पैग़म्बर ने ख़ुदा का दीदार किया था।
दान्ते ने जब "डिवाइन कॉमेडी" लिखी तो उसके सामने इतालवी महाकवि वर्जिल की मूरत थी।

इक़बाल ने जब "जावेदनामा" लिक्खा तो उनकी नज़रों के सामने रौशन था रूमी का चेहरा!

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इस क़ायनाती यात्रा में इक़बाल ने ख़ुद को "ज़िन्दा रूद" कहकर पुकारा है। "ज़िन्दा रूद" यानी चेतना की एक जीवंत धारा। इस "रूद" लफ़्ज़ का इस्तेमाल इक़बाल ने एक और जगह पर किया है। अपने उस नायाब इंक़लाबी तराने में : "ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! / वह दिन है याद तुझको? / उतरा तिरे किनारे / जब कारवाँ हमारा!" यानी "हे गंगा के जल की धारा / तुझे वह दिन याद है / जब तेरे तट पर हमारी यात्राओं का / अंत हुआ था!"
क्या यहां पर इक़बाल आर्यों के गंगा के दोआब में आकर बसने की बात की ओर इशारा कर रहे हैं? मुझे नहीं मालूम!

साहिर को दिल्लगी का शायर नहीं माना जाता है, लेकिन बाद में उन्होंने इक़बाल के इसी तराने के एक मिसरे को बदलकर यूं कर दिया था : "ज़ेबें हैं अपनी ख़ाली / वरना क्यों देता गाली / वो संतरी हमारा / वो पासबाँ हमारा! / चीनो अरब हमारा / हिंदोस्तां हमारा / रहने को घर नही है / सारा जहाँ हमारा!" साहिर ने यह तराना सन् सत्तावन में लिक्खा था। यहां पर नेहरूवादी युग के प्रति मोहभंग की तल्ख़ चेतना की तुलना इक़बाल के उस रौशन ख़याल जज़्बे से करें, जो उन्होंने सन् उन्नीस सौ चार में इतनी बुलंदी से बयां किया था : "यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रूमा / सब मिट गए जहाँ से / अब तक मगर है बाक़ी / नाम-ओ-निशाँ हमारा!"
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बहरहाल, अल्लामा इक़बाल के बेटे जावेद इक़बाल ने जब चार खंडों में अपने पिता की बायोग्राफ़ी लिक्खी, तो उसका शीर्षक उन्होंने "ज़िन्दा रूद" ही रक्खा।

अल्लामा ने "जावेदनामा" लिक्खा, जावेद ने "ज़िन्दा रूद"। इस तरह वो एक सर्किल पूरा हुआ!

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"जावेदनामा" में जहां एक तरफ़ ज़र्वान, सरोश, अह्रिमन, ज़रतुश्त, अबू जहल के अफ़साने हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उसमें गौतम बुद्ध, भर्तृहरि, आम्रपाली और विश्वामित्र की भी कहानियां हैं। और विश्वामित्र को इक़बाल ने "जहान दोस्त" के नाम से पुकारा है। जैसा कि आप देख सकते हैं, फ़ारसी में उनके नाम का तर्जुमा करके!
"जावेदनामा" में जो चैप्टर मुझे प्रिय है, वो वह "विश्वामित्र" वाला ही चैप्टर है!

ये "विश्वामित्र" ही थे ना, जिनके नाम के साथ मेनका, कामधेनु, वशिष्ठ, श्रीराम और त्र‍िशंकु की किंवदंतियां जुड़ी हैं। और इन्हीं विश्वामित्र के नाम पर "ऋग्वेद" के दस मंडलों में से एक पूरा मंडल है, 62 सूक्तों का तृतीय मंडल, जिसमें "गायत्री मंत्र" भी सम्मिलित!

"जावेदनामा" के "चंद्रमा का मंडल" प्रकरण में वह अध्याय है, जिसका तर्जुमा मोहम्मद शीस ख़ान ने इस शीर्षक से किया है : "चंद्रमा की एक गुफा में एकांतवादी हिंदुस्तानी ऋषि, जिसे लोग "जहान दोस्त" कहते हैं। और उस हिंदू ऋषि की नौ बातें।"
"जावेदनामा" के अंत:स्तल में बसी "विश्वामित्र" की ये नौ सूक्त‍ियां काव्य के भीतर दर्शन का एक ज़िन्दा-जावेद नज़्ज़ारा पेश करती हैं!

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मसलन, इस अध्याय के पहले ही बन्ध में आने वाली यह पंक्त‍ि देखिए :
"ईश्वर को देखने के लिए यह संसार बाधा नहीं है। जल में बनने वाला प्रतिबिम्ब हमें उसमें छलांग लगाने से कैसे रोक सकता है!"

अब आप इस एक जादुई कथन पर ही मुद्दतों तलक सोच सकते हैं!
और इसके बाद तीसरे बन्ध में यह :

"अज़ ख़ुदा दर इल्मे मर्ग अफ़्ज़ूंतरेम" यानी "मनुष्य ईश्वर से केवल एक ही चीज़ में आगे है और वह है मृत्यु के बोध में। ईश्वर इस बोध से सर्वथा वंचित है!"

और इसके बाद सातवें बन्ध में यह ख़याल :

"वो आंख अंधी है जो भूल-ग़लती को देखती है, क्योंकि रात को तो कहीं भी सूरज दिखाई नहीं देता।"

मुझे नहीं मालूम, "विश्वामित्र" ने मूल में इन बातों को किस तरह से कहा था। अल्लामा ने "विश्वामित्र" के श्लोकों का तर्जुमा किया, या उनका भावार्थ गढ़ा, या एक नई ही तख़लीक़ उन्होंने "विश्वामित्र" को "जहान दोस्त" के नाम से पुकारकर रची, ये भी नहीं मालूम। अलबत्ता यह ज़रूर है कि वो पूरी तरह से सांयोगिक या "रैंडम" नहीं हो सकती, कोई ना कोई तो ख़याल का सिलसिला उसमें ज़रूर रहा होगा!
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इक़बाल का "जावेदनामा" जब अंग्रेज़ी में अनूदित होकर आया था, तो भारतीयता के प्रति आकृष्ट जर्मन उपन्यासकार हरमन हेस ने कहा था कि यह महाकाव्य "विश्वात्मा" के पांच अधिराज्यों हिंदुत्व, बौद्ध धर्म, ज़रतुश्त धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम की समेकित अभिव्यक्त‍ि है। बाद में इस किताब की तुलना फ़िरदौसी के "शाहनामा", सादी की "गुलिस्तां", हाफ़िज़ के "दीवान" और ख़ुद रूमी की "मसनवी" से की गई।
लेकिन 1932 में यह किताब ख़त्म करते-करते एक दूसरे ही अल्लामा इक़बाल हमारे सामने थे, जो 29 दिसंबर 1930 को "ऑल इंडिया लीग" के इलाहाबाद अधिवेशन में मुसलमानों के लिए एक पृथक पाकिस्तान की मांग बुलंद कर चुके थे।

"जावेदनामा" में दुनिया-जहान के फ़लस्फ़ों की जो एक लड़ी दिखाई देती है, उससे भी पहले "सारे जहां से अच्छा" में हिंदोस्तां की धरती पर इक़बाल का जो नाज़ दिखाई देता है, सहसा उस पर इस्लामिक अलगाववाद हावी हो गया था।
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1927 से 1930 के बीच इक़बाल के भीतर क्या बदलाव आया, शायद जानने वाले इसको बेहतर बता पाएं। और शायद, पाकिस्तान के इस राष्ट्रकवि के "जावेदनामा" और हिंदुस्तान की आज़ादी से पहले उसके द्वारा रचे गए उस बुलंद इक़बाली तराने का ज़िक्र ही उन अलगाववादी मंसूबों को कुछ सोचने के लिए मजबूर कर दे, जो आज हिंदुस्तान की जड़ों में मट्ठा डालने पर आमादा हैं।

हमारे पास चंद "शायद" और "काश" के सिवाय ज़्यादा कुछ यों भी होता नहीं है।


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