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इंजीनियरिंग स्कूल की स्थापना

इंजीनियरिंग स्कूल की स्थापना - Establishment of engineering school
इंग्लैंड में हुई औद्योगिक प्रगति से महाराजा तुकोजीराव (द्वितीय) बहुत प्रभावित हुए थे। उन्हीं के प्रयासों से इंदौर में कपड़ा मिल व टकसाल की मशीनें इंदौर पहुंची थीं। वे नगर में केवल औद्योगिक इकाइयां स्थापित करना चाहते थे, अपितु इंदौर में तकनीकी शिक्षा का विस्तार भी चाहते थे। इसी उद्देश्य से नगर में 1879-80 में एक इंजीनियरिंग स्कूल खोला गया।
 
इस विद्यालय का शुभारंभ श्री कारे के नेतृत्व में हुआ। उन्हीं को इसका प्रथम अधिकारी भी नियुक्त किया गया। पहले ही वर्ष में इस स्कूल में 13 विद्यार्थी दाखिल हुए। उन्हें लेव्हलिंग, चेन व्यवस्था तथा सर्वे कार्य आदि का प्रशिक्षण दिया गया। उनमें से कुछ विद्यार्थियों ने अच्छी प्रगति की थी।
 
दो वर्ष बाद 1881-82 में इस विद्यालय का अधीक्षक पद श्री बलवंतराव गोविंद जाम्भेकर को सौंपा गया। उनके नेतृत्व में इस संस्था ने बहुमुखी प्र‍गति की। राज्य की ओर से भी संस्था के कार्यों में गहरी रुचि ली गई। इस स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों को छात्रवृत्ति के रूप में 50 रु. राज्य द्वारा दिए जाते थे।
 
महाराजा ने स्वयं इस संस्था की प्रगति में व्यक्तिगत रूप से रुचि ली। इस विद्यालय में अध्ययनरत छात्रों के ज्ञान की परीक्षा लेने 13 मार्च 1882 को महाराजा इस विद्यालय में पहुंचे। छात्रों से महाराजा ने ज्यामिति, सर्वे, भवन निर्माण आदि विषयों से संबंधित प्रश्न पूछे। छात्रों द्वारा दिए गए संतोषप्रद उत्तरों पर महाराजा ने अपनी हार्दिक प्रसन्नता जाहिर की। इसी दल में उत्तीर्ण एक छात्र ने महू के पी.डब्ल्यू.डी. में 30 रु. प्रतिमाह पर नौकरी प्राप्त की थी (उस दौर में इंदौर में सोने का भाव 18 रु. तोला था, इस प्रतिमान से यह वेतन आज के 10,000 रुपए के बराबर होता है।)
 
1883-84 में कलकत्ता में एक अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था, जिसमें विश्व की वैज्ञानिक प्रगति को दर्शाया गया था। इस प्रदर्शनी के अवलोकन हेतु इंदौर से एक विशेष दल भेजा गया। वहां से यह दल इंदौर के इंजीनियरिंग स्कूल के उपयोग हेतु भूगर्भशास्त्र संबंधी कुछ नमूने खरीदकर लाया। इस खरीदी के लिए राजकुमार शिवाजीराव ने विशेष अनुमति प्रदान की थी। 1891 में जब होलकर महाविद्यालय की स्‍थापना हुई तो इस इंजीनियरिंग विद्यालय को भी उसके साथ जोड़ दिया गया।
 
इस‍ विद्यालय में सैद्धांतिक तथा व्यावहारिक दोनों प्रकार का त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम लागू किया गया, जिसमें छात्रों को ड्राइंग, सर्वे, मेटल कार्विग, पेंटिंग आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। 1902 ई. तक यह संस्था सुचारु रूप से चलती रही, लेकिन वांछित संख्या में छात्र इस ओर आकर्षित नहीं हो पा रहे थे। उन दिनों ऐसे कार्यों को, जिनमें बहुत शारीरिक श्रम लगता था, अच्छा नहीं मानते थे। लोग इस स्कूल में अपने बच्चों को भेजने में रुचि नहीं रखते थे। अंतत: कुछ अन्य असुविधाओं के कारण इस इंजीनियरिंग स्कूल को 1902 में बंद कर देना पड़ा।
 
यद्यपि राज्य की ओर से प्रारंभ किया गया इंजीनियरिंग स्कूल बंद कर दिया गया था किंतु नगर के बुद्धिजीवी इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे कि भविष्य में प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा आवश्यक होगी। नगर में निजी क्षेत्र में शोभाराम गंभीरमल इंडस्ट्रीयल स्कूल कायम किया गया। इस‍ विद्यालय में औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाता था। 1934 में इंदौर के बिस्को पार्क में इस स्कूल ने अपनी एक प्रदर्शनी लगाई थी, जिसके माध्यम से विद्यार्थियों को आकर्षित किया जाना था। यद्यपि इस प्रदर्शनी को देखने गवर्नर जनरल के एजेंट, होलकर राज्य के प्रधानमंत्री तथा मां साहिबा चन्द्रावतीबाई होलकर जैसे लोग पधारे थे और उन्होंने स्कूल में दिए जा रहे औद्योगिक व तकनीकी ज्ञान की सराहना भी की थी, किंतु फिर भी सामान्य लोगों ने इसमें अधिक रुचि नहीं दर्शाई। इंदौर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र 'दी सेंट्रल इंडिया टाइम्स' ने इस विषय में लिखा था- 'यद्यपि शारीरिक श्रम के कारण लोगों की रुचि इस स्कूल की गतिविधियों के प्रति कम रही है, लेकिन आने वाले समय में यह स्कूल एक वरदान सिद्ध होगा। सुनिश्चित रूप से औद्योगिक शिक्षा को व्यापक रूप से मान्यता मिलेगी और तब जनता इस प्रकार की संस्थाओं को अपना पूरा-पूरा समर्थन देगी।'
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