हिन्दी कविता : वृक्ष..


धरा का भूषण है
यह प्रतिपल नूतन आभूषण है
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जन-जन का यह जीवनदाता
देश का है यह भाग्य-विधाता

कबहुं वृक्ष नहि निज फल चखता
परमारथ का संगीत सुनाता

पानी को यह संचित कर
सृष्टि को नवजीवन देता

प्राणीमात्र का जीवनदाता
पशु-पक्षी का शरणदाता

यह है अद्भुत त्यागी-बलिदानी
अचरज करते ऋषि-मुनि ज्ञानी

इसके त्याग की कहानी
गाते-सुनाते जन-मन वाणी
यह अनुपम धरोहर है राष्ट्र की
इसे सहेजो प्राण त्यागकर

यदि तुम इसे सहेज पाओगे

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