गजल : परछाईं झूठ की

lekhan

1.

मृग-मरीचिका-सी चाह,
मन में पल रही।
परछाईं झूठ की यहां,
सच को छल रही।
2.

खाक हुई थी लंका,
अपनी ही सूझ-बूझ से।
मंथरा की सीख पर,
कैकेयी अब भी चल रही।

3.

दिवाली-सा हो गया है,
हर रात का वजूद।
होलिका की याद में,
ये दोपहर जल रही।

4.

झूठे लगते हैं सूत्र सभी,
पुरुषार्थ चतुष्टम के।
प्रज्ञावान ऋचा अपना,
मकसद बदल रही।

5.

मैंने भी नेकी कर कभी,
दरिया में डाली थी।
चर्चा समुद्र मंथन की,
आज तक चल रही।
6.

ठंडी हवा के झोंके से,
कुछ राहत जरूर होगी।
बदले हुए संदर्भ से,
'अमरेश' ये पुरवाई चल रही।


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