उपवास के आश्चर्यजनक फायदे माने वैज्ञानिकों ने, पढ़ें चौंका देने वाली शोधपरक जानकारी


सेहत के लिए बहुत खास है उपवास, बीमारियों से मुक्ति दिलाता है, पढ़ें एक दिलचस्प आलेख..

धार्मिक विषय मान कर उपवास की उपेक्षा करता रहा विज्ञान अब उसमें रोगमुक्ति और दीर्घायु-प्राप्ति की चमत्कारिक क्षमताएं देखने लगा है।

वैसे तो हर धर्म में किसी न किसी बहाने से व्रत या उपवास रखने का विधान है, पर हिंदू धर्म में तो वर्ष का लगभग हर दिन किसी न किसी तीज-त्यौहार की परंपरा निभाने, किसी देवी-देवता के प्रति श्रद्धा जताने या निजी मान-मनौती की प्राप्ति के लिए उपवास रखने के उपयुक्त माना जाता है, वैज्ञानिक ही नहीं, अपने आधुनिक जीवन-दर्शन पर गर्व करने वाले प्रायः हम सभी लोग, व्रतों-उपवासों को पुरातनपंथी या अंधविश्वासी प्रथाएं होने का फ़तवा दे बैठते हैं। मान लेते हैं कि जो कुछ पुराना है, धर्मसम्मत है, वह विज्ञान-सम्मत नहीं हो सकता।


सौभाग्य से विज्ञान-जगत में कुछ ऐसे वैज्ञानिक भी होते हैं, विशेषकर चिकित्सा विज्ञान में, जो आज के ज्ञान को ही अंतिम विज्ञान नहीं मान लेते, ऐसे ही वैज्ञानिकों की कृपा से योग-ध्यान अब कोई अज्ञान नहीं रहा। योग-ध्यान के समान ही उपवास भी एक ऐसा स्वास्थ्य- विज्ञान बनने जा रहा है, जिसका उपहास उड़ाना एक दिन अज्ञान कहलायेगा।

रूस के साइबेरिया में उपवास द्वारा उपचार

रूस के अंतहीन विस्तारों वाले साइबेरिया में 10 लाख की जनसंख्या वाला बुर्यातिया एक स्वायत्तशासी 'गणतंत्र' है। 1995 से वहां उपवास द्वारा बीमारियां ठीक करने का एक प्रसिद्ध अस्पताल विभिन्न बीमारियों के हज़ारों रोगियों का इलाज़ कर चुका है। अस्पताल गोर्याचिंस्क नाम के जिस सुरम्य शहर है में है, वह बुर्यातिया की राजधानी उलान-ऊदे से क़रीब 250 किलोमीटर दूर मीठे पानी की संसार की सबसे बड़ी झील बाइकाल के पूर्वी तट पर बसा है।

बाइकाल झील किसी समुद्र जैसे विस्तारों वाली 31, 722 वर्ग किलोमीटर लंबी-चौड़ी और 1,642 मीटर तक गहरी एक ऐसी विशाल झील है, जिसमें संचित पानी विश्व के क़रीब 23 प्रतिशत भूतलीय मीठे जल के बराबर है। उपवास द्वारा उपचार करने वाला गोर्याचिंस्क का अस्पताल बाइकाल झील से केवल 100 मीटर की दूरी पर बना है। रूस में दूर-दूर से आए ऐसे लोगों का, जो आधुनिक मंहगी चिकित्सापद्धति से निराश हो चुके हैं, वहां सरकारी ख़र्चे पर इलाज किया जाता है। उपवास, बौद्ध धर्मियों के बहुमत वाले बुर्यातिया की स्वास्थ्य नीति का अभिन्न अंग है। वहां के स्वास्थ्य मंत्री स्वयं भी उपवास-प्रेमी हैं।



गोर्याचिंस्क में जिस उपवासी उपचारविधि का प्रयोग किया जाता है, उसे भूतपूर्व सेवियत संघ वाले दिनों के कम्युनिस्ट शासनकाल में, चार दशकों के दौरान, हज़ारों लोगों पर आजमा कर विकसित किया गया था। तब तथाकथित 'शीतयुद्ध' का ज़माना था। सोवियत नेतृत्व वाले पूर्वी यूरोप के देशों और अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के बीच उस समय घृणा, अविश्वास और तनातनी-भरे प्रचार-युद्ध की एक दीवार-सी हुआ करती थी. एक-दूसरे पर लक्षित परमाणु अस्त्रों को तैनात करने की होड़ लगी हुई थी। इस कारण उपवास के द्वारा रोग-उपचार की रूसी विधि का रूस से बाहर किसी को पता नहीं चल पाया। न ही उससे संबंधित अध्ययनों का अन्य भाषाओं में कोई अनुवाद सामने आया।


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