संकटों का सामना कर रहा हैं पर्यावरण

पर्यावरण संरक्षण

भाषा|
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विश्वभर में जलवायु परिवर्तन के गंभीर दुष्प्रभावों को लेकर मचे हाहाकार के बीच अक्सर यह तथ्य उपेक्षित रह जाता है कि चौतरफा संकटों का सामना कर रहे पर्यावरण को एवं सशस्त्र संघर्ष भी नुकसान पहुंचा रहे हैं और शायद आने वाली नस्लों को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ सकती है।

पर्यावरण और मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले वरिष्ठ स्तंभकार सुभाष गाताडे ने बताया कि अफगानिस्तान से लेकर लीबिया तक में हिंसा और संघर्ष का दौर जारी है जिसका पर्यावरण पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।

उन्होंने कहा, ‘इराक में सद्दाम हुसैन और अमेरिका तथा उसके सहयोगियों के बीच जंग में जहां बड़ी संख्या में जान और माल की हानि हुई वहीं पानी, जलवायु तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों को बहुत नुकसान पहुंचा जिसका असर आज भी देखा जा रहा है।’ गाताडे ने कहा, ‘वर्तमान दौर में युद्ध के पर्यावरण और मानवता पर पड़ रहे विनाशकारी प्रभावों का सबसे बड़ा उदाहरण इराक है, जहां अमेरिकी सेना ने रेडियोधर्मी पदार्थ यूरेनियम से बने बमों का इस्तेमाल किया। इराक में युद्ध समाप्त होने के बावजूद भी इन बमों के दुष्प्रभाव देखे जा रहे हैं। इराक के फलूजा शहर में विकलांग बच्चे पैदा हो रहे हैं।’
पर्यावरण वंदना शिवा ने कहा ‘युद्ध से या सशस्त्र संघर्ष से पर्यावरण की प्रकृति ही खत्म हो जाती है। इसका मुख्य उदाहरण इराक और अफगानिस्तान हैं जहां सबकुछ तहस-नहस हो गया है। इराक की कुख्यात अबू गरैब जेल कभी ‘सीड बैंक’ हुआ करती थी। आज लोग भूल चुके हैं कि वहां कभी सीड बैंक था।’ उन्होंने कहा ‘युद्ध और सशस्त्र संघर्ष के दीर्घकालिक असर होते हैं। जहां बम गिरते हैं, उन जगहों की पारिस्थितिक बमों के रसायनों की वजह से बदल जाती है। ऐसी जगहों पर खेती संभव नहीं होती। ये रसायन हवा में घुल कर भी प्रतिकूल प्रभाव छोड़ते हैं। कुल मिलाकर कुदरत के साथ गंभीर छेड़छाड़ हो जाती है।’
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युद्ध, सशस्त्र संघर्षों में पर्यावरण के संरक्षण के लिए 'अंतरराष्ट्रीय दिवस’ पर दिए अपने संदेश में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ने कहा, ‘युद्ध और सशस्त्र संघर्ष ने सतत विकास के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। युद्ध की वजह से गरीबी बढ़ती है, अवसर कम होते हैं और मूलभूत मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। किसी भी संघर्ष प्रभावित देश ने एक भी सहस्राब्दी विकास लक्ष्य नहीं हासिल किया है।’
उन्होंने कहा, ‘हमें इस बात को मानना होगा कि स्थायी शांति और संघर्ष के बाद विकास पर्यावरण संरक्षण और के सुशासन पर निर्भर करता है। यदि लोगों के आजिविका के साधनों को नुकसान पहुंचाया गया या उसे नष्ट किया गया तो शांति नहीं हो सकती है।’
मून ने कहा, ‘वर्ष 1990 से कम से कम 18 ऐसे हिंसात्मक संघर्ष हुए हैं जिनकी उत्पत्ति प्राकृतिक संसाधनों जैसे लकड़ी, खनिज, तेल और गैस के शोषण से हुई। कुछ लोगों ने इस बात पर चिंता जताई है कि अफगानिस्तान में हाल ही में कई अरब डॉलर के खनिज भंडार की वजह से गृहयुद्ध भड़क सकता है।’ उन्होंने कहा, ‘पूर्वी कांगो में टिन, टंगस्टन और सोने के विशाल भंडार हैं जिसका इस्तेमाल करोड़ों लोगों के जीवन स्तर को उठाने में किया जा सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल हिंसात्मक गुटों और लंबे समय चली आ रही हिंसा के वित्त पोषण के लिए किया जा रहा है।’
मून ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आह्वान किया कि विश्व समुदाय आज के दिन शांति और युद्ध के दिनों में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा करें और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर होने वाले संघर्ष को रोके। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पांच नवंबर 2001 को घोषणा की थी कि हर साल के दिन को हर साल युद्ध, सशस्त्र संघर्षों में पर्यावरण के संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक करने हेतु मनाया जाएगा। (भाषा)

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