यह मरहम ही है, इलाज नहीं...

Author जयदीप कर्णिक| पुनः संशोधित गुरुवार, 29 सितम्बर 2016 (20:11 IST)
'मारो-मारो और बदला लो' के जंगी नारों के बीच आज हुई सैन्य कार्रवाई ने निश्चित ही आहत राष्ट्रीय स्वाभिमान पर कुछ मरहम लगाया है। भावनाओं का ग़ुबार, राजनीतिक छींटाकशी, पुराने वादे, सोशल मीडिया का उन्माद, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, शब्द-बाणों का पुराना खेल और छवि की मज़बूरी - ये सब मिलकर कुछ ऐसा वातावरण रचते हैं कि उसे भेदने के लिए ऐसी लक्ष्यभेदी कार्रवाई, उसके बाद होने वाला जयघोष अतिआवश्यक से हो जाते हैं। ये बहुत ज़रूरी होने के बाद भी मरहम ही है, इलाज नहीं। ये भावनाएँ अपने स्तर पर ठीक हैं कि क्या हम वाकई एक राष्ट्र के रूप में इतने कमजोर हैं कि कोई हमारे सैनिकों को यों ही मार कर चला जाए और हम हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहें? 
एक साधारण व्यक्ति भी अपने ऊपर होने वाले किसी भी हमले का प्रतिकार करता है। इतना पुरुषार्थ या महिलार्थ भी कह लें, तो हर व्यक्ति में होता है... फिर एक राष्ट्र के रूप में हम ऐसे असहाय से क्यों हो जाते हैं? कुछ मजबूरियाँ होती हैं.... ऐसा सुनते हैं और कुछ लोग शायद जानते-समझते भी हैं.... पर ऐसी कौन-सी वो मजबूरियाँ होती हैं जो विपक्ष में शेर की तरह दहाड़ने और सत्ता में संयमित रहकर बोलने और सही कार्रवाई करने पर मजबूर कर देती हैं?
 
आम जनता को इससे कोई मतलब नहीं उसे तो अपने भावोन्माद को निकालने के लिए एक रास्ता चाहिए.... वैसा ही जैसा प्रेशर कूकर को फटने से बचाने के लिए बजरिए सीटी होता है... तो आज एक सीटी तो बज गई, कलेजे में कुछ ठंडक पड़ी.... पर भारत-पाकिस्तान, कश्मीर, चीन, सीमा विवाद, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मसले ना केवल एक नया मोड़ लेंगे पर अधिक गंभीर होंगे .... हमें अधिक सतर्क रहना होगा, बहुत संभलकर चलना होगा, ना केवल सामरिक, राजनीतिक और रणनीतिक स्तर पर, वरन ज़्यादा ज़रूरी है एक राष्ट्र के रूप में। अपने समूचे नागरिक बोध के साथ.... 
 
हम इसराइल की तरह कड़ी कार्रवाई क्यों नहीं करते? ये सवाल उठाना तो आसान है पर हमको ये देखना होगा कि वो किस तरह तैयार रहते हैं... केवल, सेना, कमांडो और गुप्तचर ही नहीं, नागरिक भी। सब सजग और तैयार। जानकारियाँ जुटाने में, भेदियों को पकड़ने में वहाँ के नागरिकों की मदद को भी जान-समझ लीजिए ....और हमारे यहाँ पठानकोट और उड़ी जो हुए हैं वो बिना भेदिए के संभव नहीं हैं.... हाँ, हम फेसबुकियों का सवाल हो सकता है कि इसमें कुछ चंद ही शामिल हैं, हमारी क्या ग़लती.... ठीक सवाल है.... पर वो चंद लोग अगर यों हमें नुकसान पहुँचा रहे हैं तो उन्हें बेनकाब करने के लिए भी इसी समुदाय को आगे आना पड़ेगा... हाँ, हम राष्ट्र के रूप में कायर नहीं हैं, हम अपना सकारात्मक योगदान देना चाहते हैं, अपने आस-पास भेस बदले बैठे भेदियों को हम पहचान पाएँगे .... ये भी साबित करना होगा.....
 
एक देश के दो टुकड़े हो जाना ... ये हमें विरासत में मिला... कश्मीर में नीतिगत ग़लतियों का भयंकर ख़ामियाजा हम भुगत रहे हैं.... चीन गिद्ध दृष्टि जमाए बैठा है... सब ठीक है... पर अब यहाँ से आगे बढ़ना होगा... समझाने से नहीं माने तो बम-बारूद की भाषा का इस्तेमाल भी करना होगा.... जो सेना ने किया भी...सेना करती भी आई है.... सेना किसी राजनीतिक दल के झंडे को नहीं देखती वो तो सिर्फ और सिर्फ तिरंगे को देखती है... वो ही सबसे ऊपर है... पर सेना के मनोबल को बनाए रखने के लिए प्रबल राजनीतिक इच्छाशक्ति की भी आवश्यकता होती है.... इसी इच्छाशक्ति ने 1971 में बांग्लादेश बनाया था और 65 में तिरंगे का मान बढ़ाया था... सेना का बंदूक से जीता मनोबल समझौते की टेबल पर दम ना तोड़े, ये सबसे ज़रूरी है...
 
आज तो हम अपने उन जाँबाज़ सैनिकों को सलाम करें जिन्होंने ना केवल अपने साथी सैनिकों और देश के सपूतों की मौत का बदला लिया है बल्कि एक राष्ट्र के आहत स्वाभिमान पर बहुत सुकूनभरा मरहम लगाया है.... हमें वन्दे मातरम और जयहिन्द का नारा ख़ूब बुलन्द करने का मौका दिया है......... #जयहिन्द #वन्देमातरम #भारतीयसेना #लक्ष्यभेदी #भारतकाजवाब

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