नरगिस डॉक्टर बनना चाहती थीं

पुण्यतिथि 3 मई के अवसर पर...

हिन्दी फिल्मों की मशहूर अदाकारा ने लगभग 4 दशक तक अपने बहुआयामी अभिनय से दर्शकों को चमत्कृत किए रखा। लेकिन वे बचपन के दिनों में अभिनेत्री नहीं, डॉक्टर बनना चाहती थीं।
कलकत्ता शहर में 1 जून 1929 को जन्मीं कनीज फातिमा राशिद उर्फ 'नरगिस' के घर में मां जद्दनबाई के अभिनेत्री और फिल्म निर्माता होने के कारण फिल्मी माहौल था। इसके बावजूद बचपन में नरगिस की अभिनय में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उनकी तमन्ना डॉक्टर बनने की थी जबकि उनकी मां चाहती थीं कि वे अभिनेत्री बनें।

एक दिन उनकी मां ने उनसे स्क्रीन टेस्ट के लिए फिल्म निर्माता एवं निर्देशक महबूब खान के पास जाने को कहा। चूंकि नरगिस अभिनय क्षेत्र में जाने की इच्छुक नहीं थीं इसलिए उन्होंने सोचा कि यदि वे स्क्रीन टेस्ट में फेल हो जाती हैं तो उन्हें अभिनेत्री नहीं बनना पड़ेगा।
स्क्रीन टेस्ट के दौरान नरगिस ने अनमने ढंग से संवाद बोले और सोचा कि महबूब खान उन्हें स्क्रीन टेस्ट में फेल कर देंगे लेकिन उनका यह विचार गलत निकला। महबूब खान ने अपनी फिल्म 'तकदीर' (1943) के लिए बतौर नायिका उन्हें चुन लिया।

इसके बाद वर्ष 1945 में महबूब खान द्वारा ही निर्मित फिल्म 'हुंमायूं' में नरगिस को काम करने का मौका मिला। वर्ष 1949 नरगिस के सिने करियर में अहम पड़ाव साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 'बरसात' और 'अंदाज' जैसी सफल फिल्में प्रदर्शित हुईं। प्रेम त्रिकोण पर बनी फिल्म 'अंदाज' में उनके साथ दिलीप कुमार और जैसे नामी अभिनेता थे, इसके बावजूद नरगिस दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहीं।
वर्ष 1950 से 1954 तक का वक्त नरगिस के सिने करियर के लिए बुरा साबित हुआ। इस दौरान उनकी 'शीशा', 'बेवफा' , 'आशियाना' , 'अंबर' , 'अनहोनी' , 'शिकस्त' , 'पापी' , 'धुन' , 'अंगारे' जैसी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल हो गईं लेकिन वर्ष 1955 में उनकी राज कपूर के साथ 'श्री 420' फिल्म प्रदर्शित हुई जिसकी कामयाबी के बाद वे एक बार फिर से शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचीं।
नरगिस के सिने करियर में उनकी जोड़ी राज कपूर के साथ काफी पसंद की गई। राज कपूर और नरगिस ने सबसे पहले फिल्म वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'आग' में एकसाथ अभिनय किया था। इसके बाद नरगिस ने राज कपूर के साथ 'बरसात' , 'अंदाज' , 'जान-पहचान' , 'प्यार' , 'आवारा' , 'अनहोनी' , 'आशियाना' , 'आह' , 'धुन' , 'पापी' , 'श्री 420' , 'जागते रहो' , 'चोरी-चोरी' जैसी कई फिल्मों में भी काम किया।
वर्ष 1956 में प्रदर्शित फिल्म 'चोरी-चोरी' नरगिस और राज कपूर की जोड़ी वाली अंतिम फिल्म थी, हालांकि राज कपूर की फिल्म 'जागते रहो' में भी नरगिस ने अतिथि कलाकार की भूमिका निभाई। इस फिल्म के अंत में लता मंगेशकर की आवाज में नरगिस पर 'जागो मोहन प्यारे' गाना फिल्माया गया था।

वर्ष 1957 में महबूब खान की फिल्म 'मदर इंडिया' नरगिस के सिने करियर के साथ ही व्यक्तिगत जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस फिल्म में नरगिस ने सुनील दत्त की मां का किरदार निभाया था। 'मदर इंडिया' की शूटिंग के दौरान नरगिस को आग से सुनील दत्त ने बचाया था।

इस घटना के बाद नरगिस ने कहा था कि 'पुरानी नरगिस की मौत हो गई है और नई नरगिस का जन्म हुआ है।' नरगिस ने अपनी उम्र और हैसियत की परवाह किए बिना सुनील दत्त को अपना जीवनसाथी चुन लिया।

शादी के बाद नरगिस ने फिल्मों में काम करना कुछ कम कर दिया। करीब 10 वर्ष के बाद अपने भाई अनवर हुसैन और अख्तर हुसैन के कहने पर नरगिस ने 1967 में फिल्म 'रात और दिन' में काम किया। इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पहला मौका था, जब किसी अभिनेत्री को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया था।
नरगिस के सिने करियर में उनकी जोड़ी राज कपूर के साथ काफी पसंद गई। नरगिस ने अपने सिने करियर में लगभग 55 फिल्मों में काम किया। नरगिस को अपने सिने करियर में मान-सम्मान भी बहुत मिला। वे पहली अभिनेत्री थीं जिन्हें पद्मश्री पुरस्कार दिया गया। उन्हें राज्यसभा सदस्य भी बनाया गया।

अपने संजीदा अभिनय से सिनेप्रेमियों को भाव-विभोर करने वाली नरगिस 3 मई 1981 को सदा के लिए इस दुनिया से रुखसत हो गई।(वार्ता)

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