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Written By BBC Hindi
Last Modified: गुरुवार, 26 मई 2022 (14:57 IST)

मोदी सरकार के चीनी निर्यात पर ताज़ा फ़ैसले के मायने क्या हैं?

मोदी सरकार के चीनी निर्यात पर ताज़ा फ़ैसले के मायने क्या हैं? - implications of Modi government sugar exports decision
सरोज सिंह, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली से सटे गाज़ियाबाद में बुधवार को एक किलो चीनी की कीमत 42 रुपये थी। भारत के ज़्यादातर शहरों में चीनी की कीमत बुधवार को 38 से 44 रुपये के बीच ही रही। पिछले कुछ महीने से इसमें बहुत तेज़ी देखने को नहीं मिली है। बावजूद इसके भारत सरकार ने चीनी के निर्यात को नियंत्रित करने का फ़ैसला लिया। इस वजह से लोग ये फैसला सुन कर थोड़ा चौंके।
 
अपने ताज़ा फैसले में केंद्र सरकार ने फिलहाल चीनी के निर्यात को प्रतिबंधित नहीं किया है। केवल फ्री से रेगुलेटेड की श्रेणी में डाला है। आसान भाषा में कहें तो अब 1 जून से 31 अक्टूबर तक चीनी निर्यात के लिए सरकार से इजाजत लेनी पड़ेगी।
 
सरकार ने चीनी पर ऐसा फैसला क्यों लिया?
फ़िलहाल भारत में चीनी के दाम नहीं बढ़े हैं और ना ही उत्पादन में कमी आई है। बावजूद इसके केंद्र सरकार ने ऐसा फैसला लिया है। इसके पीछे की वजह जानने के लिए सबसे पहले भारत में चीनी से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों को समझना होगा।
 
गन्ने का क्रशिंग सीज़न अक्टूबर से सितंबर तक का माना जाता है। अमूमन ये 5- 6 महीने का होता है। गन्ने की फसल तैयार होने में वैराइटी के हिसाब से 12 से 18 महीने का वक़्त लगता है।
 
चीनी की नई खेप बाज़ार में नंबवर से पहले सप्ताह में ही आ पाती है। इस वजह से केंद्र सरकार चाहती है कि हर साल 1 अक्टूबर को देश के भंडार में कम से कम 60 लाख टन चीनी हो, ताकि नवंबर तक बाज़ार का काम बिना नई चीनी के चल सके। इसे ओपनिंग स्टॉक कहते हैं।
 
जिस हिसाब से चीनी के निर्यात बढ़े हैं, सरकार को लगता है कि इस साल एक अक्टूबर को ओपनिंग स्टॉक 60 लाख टन से शायद कम बचे, भविष्य की इसी आशंका को ध्यान में रख कर केंद्र सरकार ने ये फैसला लिया है। ये जानकारी इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन के पूर्व महानिदेशक अविनाश वर्मा ने बीबीसी को दी है। अविनाश वर्मा इस साल 28 अप्रैल तक अपने पद पर थे।
 
ओपनिंग स्टॉक में कमी की आशंका क्यों ?
भारत में हर महीने चीनी की ख़पत लगभग 22-24 लाख टन की है। उस हिसाब से साल में कुल ख़पत 270-275 लाख टन चीनी की है। इस साल 350-355 लाख टन चीनी का उत्पादन का अनुमान है। पिछले साल का स्टॉक भी कुछ बचा हुआ है।
 
इस वजह से केंद्र सरकार ने 100 लाख टन चीनी निर्यात करने का लक्ष्य रखा, जो पिछले कुछ सालों का रिकॉर्ड निर्यात होगा।
 
जिसमें से 85 लाख टन के चीनी का निर्यात का सौदा भी हो चुका है। और अभी मई का महीना ही चल रहा है। यानी चीनी के सीज़न का 4 महीने बचे ही हैं।
 
ऐसे में बहुत संभावना है कि निर्यात नियंत्रित ना हो तो चीनी का निर्यात 100 लाख टन से ज़्यादा हो जाए, तो 1 अक्टूबर का ओपनिंग स्टॉक सरकारी अनुमान से कम हो। ऐसा अविनाश वर्मा बताते हैं।
 
इसके साथ स्टॉक कम होने की एक दूसरी वजह भी है। इस बार गन्ने का इस्तेमाल इथनॉल बनाने में ज़्यादा हुआ। जिससे चीनी के लिए कम गन्ना बचा। इथनॉल का इस्तेमाल तेल की ब्लेंडिंग में किया जाता है।
 
अब जानते है चीनी का निर्यात क्यों बढ़ा?
इसके लिए दुनिया के चीनी बाज़ार को समझना होगा। इंटरनेशनल शुगर ऑर्गेनाइजेशन के आकँड़ों के मुताबिक़ दुनिया में भारत में चीनी का उत्पादन सबसे ज़्यादा होता है और खपत भी।
 
दुनिया में चीनी निर्यात के टॉप पाँच देश (क्रमश:) - ब्राजील, थाईलैंड, भारत, ऑस्ट्रेलिया और मेक्सिको हैं। ब्राजील और थाईलैंड में मौसम की मार ( कम बारिश और ओला वृष्टि) की वजह से गन्ने का कम उत्पादन हुआ। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 100 लाख टन की कमी आई है।
 
इस कमी को भारत के चीनी निर्यातकों ने भूनाने की कोशिश की। इस वजह से इस साल चीनी का रिकॉर्ड निर्यात होने की संभावना है। उत्पादन में कमी आने की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में दाम भी बढ़े हैं।
 
कहीं इसका असर स्टॉक कम होने की वजह से भारत के बाज़ार में चीनी के दाम पर ना पड़ जाए - इस वजह से भारत सरकार ने एतिहातन ये क़दम उठाया है। ऐसा इस इंटस्ट्री से जुड़े जानकारों का मानना है।
 
महँगाई काबू करने में कितना कारगर होगा ये कदम?
बढ़ी हुई खु़दरा महँगाई दर इन दिनों केंद्र सरकार के लिए चिंता का सबब बनी हुई है, जो अब 7 फ़ीसदी के पार है। इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार एक के बाद एक नए फैसले ले रही है, ताकि बढ़ती महँगाई पर काबू पाया जा सके।
 
केंद्र सरकार ने 11 दिन पहले गेहूं निर्यात पर फैसला लिया क्योंकि आटे की कीमत घरेलू बाज़ार में बढ़ रही थी। पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने पेट्रोल- डीजल के एक्साइज़ ड्यूटी में बड़ी कटौती की।
 
इसी तरह से सरकार ने सालाना 20-20 लाख टन कच्चे सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के आयात पर सीमा शुल्क और कृषि अवसंरचना उपकर को मार्च, 2024 तक हटाने की घोषणा भी की है। और अब चीनी निर्यात नियंत्रित करने का फ़ैसला।
 
फौरी तौर पर इसका असर आपकी जेब पर पड़ता जानकारों को नहीं दिख रहा है। पूर्व केंद्रीय वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग कहते हैं, "केंद्र सरकार के इन फैसलों का असर 6-8 महीने से पहले होते नहीं दिख रहा है। उनका आकलन है कि आने वाले एक साल तक ख़ुदरा महँगाई दर 6 फ़ीसदी से कम नहीं होने वाली।
 
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, 'खुदरा महँगाई दर में खाने की चीज़ों का योगदान तकरीबन 45 फ़ीसदी होता है और पेट्रोल डीज़ल का 15 फ़ीसदी। दोनों मिला कर देखें तो इनका योगदान तकरीबन 60 फ़ीसदी हुआ।'
 
इस वजह से सरकार की रणनीति है कि खाने-पीने की चीज़ों के दाम को नियंत्रित किया जाए। इसी रणनीति के तहत सोयाबीन, सूरजमुखी तेल, गेहूं और चीनी के संदर्भ में सरकार ने नए फैसले लिए। इन्हीं कारणों से पेट्रोल और डीज़ल की कीमत में भी केंद्र सरकार ने राहत देने की कोशिश की।
 
वो आगे कहते हैं, "इन फैसलों का तुरंत असर आपकी जेब पर इसलिए भी नहीं दिखेगा क्योंकि वो वस्तु दर वस्तु बदलती है।
 
मसलन पेट्रोल-डीजल के मामले में कई बार तेल कंपनियां सरकार के दबाव में, चुनाव की वजह से तेल की बढ़ी हुई कीमतें जनता को पास-ऑन नहीं करती। अब सरकार ने अपने नए फैसले से जो राहत दी है, उसका इस्तेमाल वो ख़ुद के प्रॉफ़िट के लिए करते हैं या जनता को पास-ऑन करते हैं, ये तेल कंपनियों पर निर्भर करता है। उसी तरह से चीनी और गेहूं के दाम भी आशंका में ही बढ़ रहे थे।
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