एक बहादुर भारतीय जनरल, जिसे वीर चक्र भी नहीं मिला

Last Updated: मंगलवार, 27 सितम्बर 2016 (19:25 IST)
रेहान फ़ज़ल, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
 
सन् 1971 के दिसंबर की 16 तारीख। जैसे ही ढाका के रेसकोर्स मैदान में पाकिस्तानी जनरल एएके नियाज़ी ने आत्मसमर्पण किया भारतीय सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। तभी भीड़ से एक पत्थर आया और जनरल नियाज़ी को लगा। बड़ी मुश्किल से उन्हें कार में डाल केंटोनमेंट पहुंचाया गया।
इसके बाद ढाका प्रशासन के इंचार्ज बन चुके जनरल सगत सिंह, जनरल अरोड़ा को छोड़ने ढाका हवाई अड्डे गए। जैसे ही जनरल अरोड़ा का हैलीकॉप्टर ढलते हुए सूरज की रोशनी में गुम हुआ ने अचानक ढाका हवाई अड्डे पर अपने आप को बिल्कुल अकेले खड़ा पाया। उनके साथ सिर्फ उनके स्टाफ़ आफ़िसर्स और कुछ वायरलेस ऑपरेटर्स थे।
 
जनरल सगत सिंह के एडीसी रहे और बाद में लेफ़्टिनेंट जनरल बने जनरल रणधीर सिंह याद करते हैं, "जब हम ढाका पहुंचे तो सारा शहर सड़कों पर उतर आया था। सड़क के दोनों ओर हमारे सैनिक खड़े थे। लेकिन उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि उनको कैसे कंट्रोल करें।"
 
रणधीर सिंह के मुताबिक़, "लड़कियाँ उनके हथियारों पर फूल डाल रही थीं। उन्होंने अपने घर हमारे सैनिकों के लिए खोल दिए थे। जैसे ही आत्मसमर्पण शुरू हुआ ऑल इंडिया रेडियो के रिपोर्टर सुरजीत सेन ने सबसे बेहतरीन जगह पर कब्ज़ा कर लिया- वो अपना माइक्रोफ़ोन ले कर मेज़ के ठीक नीचे बैठ गए।"
 
वे बताते हैं कि जब दस्तख़त करने की बारी आई तो नियाज़ी ने कहा, उनके पास पेन नहीं है। सुरजीत सेन ने तुरंत अपना पेन निकाल कर उन्हें दिया।
 
जनरल सगत सिंह के सैनिक जीवन का सबसे बड़ा ब्रेक तब आया जब उन्हें 1961 में ब्रिगेडियर का प्रमोशन देकर आगरा स्थित 50 पैराशूट ब्रिगेड का कमांडर बनाया गया और वो भी तब जबकि वो पैराट्रूपर नहीं थे।
जनरल सगत सिंह की जीवनी लिखने वाले मेजर जनरल वीके सिंह बताते हैं, "उनको उस समय पैरा ब्रिगेड की कमान दी गई जब उनकी उम्र चालीस साल से ज़्यादा थी। पैरा ब्रिगेड की कमान तब तक सिर्फ़ पैराट्रूपर को ही दी जाती थी, किसी इंफ़ेंट्री अफ़सर को नहीं।"
 
"ब्रिगेडियर होते हुए भी उन्होंने पैरा का प्रोबेशन पूरा किया। जब आप इसे पूरा कर लेते हैं तभी आपको विंग्स मिलते हैं जिससे पैराट्रूपर पहचाना जाता है। सगत जानते थे कि जब तक उन्हें विंग नहीं मिलते उन्हें अपनी ब्रिगेड का सम्मान नहीं मिलेगा। उन्होंने जल्द से जल्द अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के लिए एक दिन में दो-दो जंप तक लिए।"
 
1961 के गोवा ऑपरेशन में जनरल सगत सिंह की 50 पैरा को एक सहयोगी भूमिका में चुना गया था, लेकिन उन्होंने उन्हें दी गई ज़िम्मेदारी से कहीं बढ़कर काम किया और गोवा को इतनी तेज़ी से आज़ाद कराया कि सभी दंग रह गए।
 
मेजर जनरल वीके सिंह बताते हैं, "18 दिसंबर को ऑपरेशन शुरू हुआ और 19 तारीख को ही उनकी बटालियन पंजिम के पास पहुंच गई। वहाँ सगत ने ही यह कहकर अपनी बटालियन को रोका कि रात हो गई है। पंजिम आबादी वाला इलाका है। रात में हमला करने से कैजुएलटीज़ हो सकती हैं।"
 
"सुबह उन्होंने नदी पार की। गोवा की सरकार ने पुल वगैरह तोड़ दिए थे। इन लोगों ने एक तरह से तैर कर नदी पार की। स्थानीय लोगों का उन्हें बहुत समर्थन मिला। 36 घंटे में उन्होंने पूरे पंजिम पर कब्ज़ा कर लिया।"
 
जून 1962 आते-आते 50 पैरा गोवा का अपना ऑपरेशन पूरा कर वापस आगरा आ गई। तभी आगरा के मशहूर क्लार्क्स शीराज़ होटल में एक दिलचस्प घटना घटी।
 
जनरल वीके सिंह बताते हैं, "जनरल सगत वहां सिविल ड्रेस में गए थे। वहाँ पर कुछ अमेरिकी टूरिस्ट भी थे। वो बहुत ग़ौर से जनरल सगत को देख रहे थे। उन्हें लगा कि वो क्यों उन्हें देख रहे हैं। कुछ देर बाद उनमें से एक शख़्स ने आ कर उनसे पूछा कि क्या आप ब्रिगेडियर सगत सिंह हैं?"
 
"उन्होंने कहा हाँ, लेकिन आप ये क्यों पूछ रहे हैं? टूरिस्ट ने कहा कि हम अभी-अभी पुर्तगाल से आ रहे हैं। वहाँ जगह-जगह आपके पोस्टर लगे हुए हैं। आपके चेहरे के नीचे लिखा है कि जो आपको पकड़ कर लाएगा उसे हम दस हज़ार डॉलर का इनाम देंगे।
 
"जनरल सगत ने कहा ठीक है आप कहें तो मैं आपके साथ चलूँ। अमेरिकी पर्यटक ने हंसते हुए कहा कि अभी हम पुर्तगाल वापस नहीं जा रहे हैं।"
 
इसके बाद जनरल सगत सिंह को 17 माउंटेन डिविजन का जीओसी बनाया गया। उनकी इसी पोस्टिंग के दौरान नाथुला में चीनी सैनिकों की भारतीय सैनिकों से ज़बरदस्त भिड़ंत हुई।
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