तमिलनाडु में कितना चलेगा केजरीवाल का दांव?

पुनः संशोधित शनिवार, 23 सितम्बर 2017 (11:11 IST)
- राधाकृष्णन (वरिष्ठ पत्रकार)
आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल और दक्षिण भारत के सुपरस्टार के मिलने की घटना के अलग अलग अर्थ लगाए जा रहे हैं। कमल हासन ने सियासी पारी शुरू करने के बारे में पहले ही संकेत दे दिया था।
गुरुवार को चेन्नई में जब उन्होंने केजरीवाल के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस किया तो राजनीतिक के जानकार भी हैरान रह गए। तमिलनाडु के लिहाज से इसका कोई ख़ास महत्व नहीं है क्योंकि न तो कमल हासन का वहां कोई जनाधार है और ना ही आम आदमी पार्टी का।

राज्य में सत्तारूढ़ एआईएडीएमके संकट से जूझ रही है और इस बीच भारतीय जनता पार्टी यहां अपना आधार बनाने की कोशिशें कर रही है। तमिलनाडु की राजनीति बहुत जटिल हो गई है। यहां एक ऐसी सरकार चल रही है जो अल्पमत में है। यहां के राज्यपाल क्या सोच रहे हैं, कोई नहीं जानता।
डीएमके है मजबूत
बीते 22 अगस्त को सत्तारूढ़ एआईएडीएम के 19 विधायकों ने राज्यपाल को एक पत्र लिखा और कहा कि उन्हें मुख्यमंत्री में भरोसा नहीं है। इसका साफ़ मतलब है कि यहां एक अल्पमत की सरकार चल रही है।

इस राजनीतिक हलचल के बीच अन्य खिलाड़ी अपनी जगह तलाश रहे हैं। हालांकि ये महज राजनीतिक हलचल है, राजनीतिक शून्य नहीं पैदा हुआ है। डीएमके अभी भी बहुत मज़बूत है। अगर आज चुनाव हों तो डीएमके चुनाव जीत जाएगी। ऐसी हालत में रजनीकांत, कमल हासन और यहां तक कि अरविंद केजरीवाल भी मौका तलाश रहे हैं।
तमिलनाडु के स्तर पर राजनीति बहुत अलग है। राजनीतिक अस्थिरता जारी है, किसान दिल्ली तक जाकर प्रदर्शन कर रहे हैं, कावेरी मुद्दे पर मैनेजमेंट बोर्ड को केंद्र ने अभी तक नहीं बनाया है और राज्य में नेशनल एलिजबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट (नीट) की परीक्षाएं नहीं हुई हैं। पलनीसामी की सरकार इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दे पा रही है। इस वजह से राज्य में केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ एक असंतोष का माहौल बन रहा है।
सुपरस्टारों का नहीं है जनाधार
कमल हासन ने पत्रकारों से भ्रष्टाचार से लड़ाई करने की बात कही लेकिन साम्प्रदायिकता पर नहीं बोला। ने शुक्रवार को ट्वीट कर स्वच्छ भारत मिशन का समर्थन किया है। इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन उन्होंने दादरी या पहलू ख़ान जैसे अन्य किसी मुद्दे पर कोई टिप्पणी अभी तक नहीं की है। तमिलनाडु में एक ऐसे नेता की ज़रूरत है जो इन मुद्दों को समझे।
जहां तक बीजेपी की बात है, जयललिता के देहांत के बाद उसने तमिलनाडु में आधार पाने के लिए एआईएडीएमके में सेंध लगाने की कोशिश की थी। पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान उप मुख्यमंत्री ओ पनीरसेल्वम को उसने खुला समर्थन किया। पनीरसेल्वम ने भी अपने कार्यकाल के दौरान आरएसएस को परेड करने की इजाज़त दी थी।

बीजेपी ने दूसरा दांव एआईएडीएमके के दोनों धड़ों के बीच समझौता करा कर खेला। इस सबसे उसे फ़ायदा हुआ है और वो निश्चित तौर पर तमिलनाडु में एआईडीएमके और डीएमके के बाद सांगठनिक रूप से तीसरी सबसे मजबूत पार्टी के रूप में उभरी है।
केंद्र के प्रति लोगों में ग़ुस्सा
लेकिन केंद्र की एनडीए सरकार के निर्णयों से यहां लोगों में भारी ग़ुस्सा भी है। लोगों को लगता है कि वो राज्य के मामले में दख़ल कर रही है। एआईएडीएमके के दोनों धड़ों के बीच चुनाव चिह्न का मामला चल रहा है और ऐसा लगता है कि कथित एकीकृत धड़े इसमें जीत जाएगी। ऐसे में लगता है कि आगामी आम चुनावों में बीजेपी एआईएडीएमके के साथ गठबंधन करे। ये उसका सबसे बड़ा दांव है।
कमल हासन और रजनीकांत ने राजनीति में दिलचस्पी भले दिखाई हो लेकिन उन्होंने अबतक कोई साफ़ साफ़ रणनीति नहीं बताई है। दूसरी बात ये है कि न तो रजनीकांत और ना ही कमल हासन ने तमिल फ़िल्म उद्योग में संघर्ष करने वालों के लिए कुछ किया है। फ़िल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले यहां के क़रीब डेढ़ लाख लोगों की सेलरी तक का मुद्दा सुलझा नहीं है। अब वो कहते हैं कि उन्हें तमिलनाडु की चिंता है। ये बहुत ही हास्यास्पद लगता है।
(बीबीसी संवाददाता हरिता कांडपाल से बातचीत पर आधारित।)
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