हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में एक बार फिर हिन्दी की गूंज

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-तेंजेंन्द शर्मा
कथा यू.के. का तेरहवाँ अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान हाउस ऑफ लार्ड्स में एक गरिमामय समारोह में आयोजित हुआ, जिसमें भारत की युवा लेखिका महुआ माजी को उनके पहले उपन्यास 'मैं बोरिशाइल्ला' के लिए प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान ब्रिटेन के आंतरिक सुरक्षा मंत्री टोनी मैकनल्टी ने प्रदान किया। इस अवसर पर लॉर्ड तरसेम किंग, भारतीय उच्चायोग में मंत्री (समन्वय) रजत बागची, नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका कपिल मोहता, पाकिस्तान की लेखिका नीलम अहमद बशीर सहित कई भाषाओं के लेखक और पत्रकार उपस्थित थे। इसी अवसर पर ब्रिटेन में बसे हिन्दी लेखकों को दिया जाने वाला आठवाँ पद्मानंद साहित्य सम्मान डॉ. गौतम सचदेव को उनके कहानी संग्रह 'साढ़े सात दर्जन पिंजरे' के लिए दिया गया।

मुख्य अतिथि टोनी मैक्नलटी ने हिन्दी में भाषण शुरू करते हुए जीवन के हर क्षेत्र में शब्द की सत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आतंकवाद से लड़ रही हमारी इस दुनिया में एक दूसरे को समझने के लिए सार्थक शब्द ही हमारा साथ देंगे। आज हमें संवाद की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। साहित्य, चाहे किसी भी भाषा में लिखा जाए, वह हमें सहिष्णुता, प्रेम और एक-दूसरे के प्रति समझदारी सिखाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि कथा यू.के. का यह आयोजन इस दिशा में एक सार्थक पहल है और यह ब्रिटेन में विभिन्न जातीय समुदायों के बीच संवाद बनाने की कोशिश है।

भारतीय मूल के ब्रिटिश लॉर्ड तरसेम किंग ने विभिन्न भाषाओं के साथ अपने अनुभव बाँटते हुए कहा कि हम यहाँ ब्रिटेन में अरसे तक प्राइमरी स्कूलों में हिन्दी की पढ़ाई के लिए कोशिश करते रहे हैं जबकि यहाँ की सरकार माध्यमिक स्तर पर हिन्दी पढ़ाने की बात कहती रही। ये बात अलग है कि आज इस देश की भारतीय पीढ़ी हिन्दी पढ़ने के लिए तैयार नहीं है। हमें अपने स्तर पर इस दिशा में प्रयास करने होंगे। भाषा ही तो जोड़ने का काम करती है। इससे दानों देशों को भी आपस में और निकट लाने में मदद मिलेगी।

लंदन| WD|
इस अवसर पर अपनी बात कहते हुए नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता ने कहा कि हम सब के लिए ये अत्यंत हर्ष की बात है कि जहाँ एक ओर संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी को प्रवेश दिलाने की बात हो रही है, हमारी परिचित संस्था कथा यू.के. ने एक वर्ष पहले ही ब्रिटेन के हाउस ऑफ लार्ड्स में हिन्दी का परचम लहरा दिया था। कथा यू. के इसके लिए बधाई की हकदार है। उन्होंने महुआ माजी को मैं बोरिशाइल्ला जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास के लिए बधाई देते हुए कहा कि हाल ही के इतिहास पर कोई बड़ी रचना लिख पाना इतना आसान नहीं होता लेकिन इन्होंने चार वर्ष के कठिन परिश्रम के साथ असंभव को संभव कर दिखाया है।


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