कई दंपतियों के लिए आशा की किरण है आईवीएफ

19 जून डॉ. मुखोपाध्याय की पुण्यतिथि पर विशेष

नई दिल्ली (भाषा) | भाषा| पुनः संशोधित शुक्रवार, 19 जून 2009 (12:35 IST)
बंगाल के चिकित्सक ने परखनली शिशु जन्म का भारत में सूत्रपात कर संतानहीन दंपतियों के लिए आशा की किरण उत्पन्न की थी।

तीन अक्टूबर 1978 को डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने पहला टेस्ट ट्यूब बेबी परीक्षण किया। ब्रिटिश चिकित्सक पैट्रिक स्टेपटो और राबर्ट एडवर्ड्स ने विश्व का पहला परखनली शिशु परीक्षण किया था। उसके मात्र 67 दिनों बाद डॉ मुखोपाध्याय ने अपना परीक्षण किया। लेकिन वर्ष 1979 में मुखोपाध्याय को अपमान का घूँट पीना पड़ा जब उनके शोध को मान्यता नहीं मिली और साथियों ने उनका मजाक उड़ाया। यहाँ तक कि सरकार ने भी उनकी उपेक्षा की।
अपने परीक्षण को प्रदर्शित करने के लिए मुखोपाध्याय को जापान के क्योटो विश्वविद्यालय ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष अपना कार्य प्रस्तुत करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया था, लेकिन राज्य और केंद्र सरकार ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति भी नहीं दी। हालात से हताश डॉ. मुखोपाध्याय ने 19 जून 1981 में आत्महत्या कर ली।

डॉ. मुखोपाध्याय ने भारत में जिस आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) की नींव रखी आज वह भारत में काफी लोकप्रिय है। इसी परीक्षण ने कई माताओं को मातृत्व सुख दिया।
आईवीएफ के विशेषज्ञ और जाने माने चिकित्सक कुलदीप जैन ने बताया आज आईवीएफ तकनीक बहुत लोकप्रियता हासिल कर चुकी है। भारत में यह पूर्णतः मानक स्तर का है और सारे मिथक दरकिनार करते हुए लोगों में इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।

विश्व का सबसे पहला परखनली शिशु लुइस ब्राउन 1978 में ब्रिटेन में जन्मा था। भारत में पहली परखनली शिशु दुर्गा थी जो विश्व की दूसरी थी और उसने लुइस ब्राउन के जन्म के 67 दिनों बाद जन्म लिया था।
अक्टूबर 2005 में मुखोपाध्याय के कार्य को पहली बार उसका सम्मान दिलाया भारतीय चिकित्सा परिषद (आईसीएमआर) ने। सुभाष मुखोपाध्याय को आम लोगों के बीच सराहना तब मिली जब दादा साहब फालके पुरस्कार विजेता निर्माता निर्देशक तपन सिन्हा ने सिनेमाई श्रद्धांजलि के रूप में 1991 में उनकी याद में फिल्म 'एक डॉक्टर की मौत' बनाई।

कुलदीप जैन ने बताया कि भारत में सम्मान पाना कठिन नहीं है लेकिन तथ्य को समुचित तरीके से दस्तावेजीकरण और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुतिकरण होना चाहिए। और कई मामलों में इसमें अब भी कमी है।
उन्होंने बताया कि सुभाष मुखोपाध्याय का कार्य भारतीय इतिहास में निश्चित तौर पर एक मील का पत्थर था और उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। जैन ने बताया कि आईवीएफ एक तेजी से बदलती हुई तकनीक है जिसकी मदद से निःसंतान दंपतियों को संतान का सुख दिया जा सकता है। आज से लगभग 20 साल पहले ऐसे लोगों के लिए आशा की कोई किरण नहीं थी जो कई कारण से संतानोत्पति में सक्षम नहीं थे।
केजीआईवीएफ और लैप्रोस्कोपी सेंटर के निदेशक डॉ. जैन ने बताया कि संतानहीनता के इलाज में मेडिकल बीमा की जरूरत है और आईवीएफ के लिए ऐसी बीमा सुविधा भारत में नहीं है। बीमा क्षेत्र, सरकार और चिकित्सा जगत को इस क्षेत्र में काम करने की जरूरत है ताकि दंपतियों को इसका लाभ मिल सके।


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