कुरआन नूर की हिदायत

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कुरआन इसलिए भेजा गया था कि हम उसे प़ढ़ें, समझें और उसके मुताबिक़ अमल करें

रमज़ानुल मुबारक की सबसे अज़ीम नेअमत कुरआन है। कुरआन एक ऐसा चराग़ है जिसका हक़ पर होना बजाए ख़ुद रोशन है

क़ुरआन हकीम 22 साल 5 माह और 14 दिन के अर्से में ज़रूरत के मुताबिक़ किस्तों में नाज़िल हुआ। कुरआन मजीद में 30 पारे, 114 सूरतें और 540 रुकूअ हैं। क़ुरआन मजीद की कुल आयत की तादाद 6666 (छः हजार छः सौ छियासठ) है। क़ुरआन मजीद के कुल हर्फ़ोंकी तादाद 3,23,760 (तीन लाख तेईस हजार सात सौ साठ) है। इसकी एक-एक आयत में हिकमत के ख़ज़ाने पोशीदा हैं।

कुरआन की पहली 'वही' (ईशवाणी) रमजान माह में हजरत मोहम्मद (स.अ.) पर गारे हिरा में नाजिल हुई। इस एतबार से रमजानुल मुबारक और कुरआन का आपस में निहायत गहरा ताअल्लुक है। रमज़ानुल मुबारक हमेशा से तालिमो-तरबीयत और आसमानी किताबों के नुज़ूल का महीना रहा है। मुस्नद अहमद में हजरत वास बिन अस्काअ से रिवायत है कि मोहम्मद स.अ. ने फरमाया के हज़रत इब्राहीम (अ.स.) के सहीफ़े रमजान की पहली तारीख़ को, तौरात 6 रमज़ान, इंजील 13 रमज़ान और क़ुरआन 24 रमज़ान को नाज़िल हुआ। हज़रत जाबिर (रजि.) की रिवायतमें यह भी है कि जबूर 12 रमज़ान को और इंजील 18 रमज़ान को नाज़िल हुई (इब्ने कसीर)।

रमज़ानुल मुबारक की दूसरी फज़ीलत यह है कि इस महीने में वह मुबारक रात भी है, जिसे लैलतुलक़द्र या शबे क़द्र भी कहते हैं। इस रात में अल्लाह तआला की बेशुमार रेहमतों और बरकतों का ज़ुहूरे आम होता है। क़ुरआन में अल्लाह तआला का इरशाद है कि 'हमने इस (क़ुरआन) को शबे क़द्र में नाज़िल किया है और तुम क्या जानो के शबे क़द्र क्या है। शबे क़द्र हज़ार महीनों से़ ज्यादा बेहतरहै। वह रात सरासर सलामती है तुलूए फज्र तक।' (सूरह कद्र)

रमज़ानुल मुबारक की तीसरी फज़ीलत यह है कि हिजरत के 18 महीने बाद 2 हिजरी में इस मुक़द्दस महीने के रोजे फ़र्ज हुए। इस सिलसिले में क़ुरआन में फरमाया गया है 'ऐ ईमान वालों तुम पर रोजे़ फर्ज किए गए, जिस तरह तुमसे पहले लोगों (उम्मतों) पऱ फर्ज किएथे ताकि तुममें तक़वा (परहेजगारी) पैदा हो (सूरह बक्र, आयत 183)।
  क़ुरआन हकीम 22 साल 5 माह और 14 दिन के अर्से में ज़रूरत के मुताबिक़ किस्तों में नाज़िल हुआ। कुरआन मजीद में 30 पारे, 114 सूरतें और 540 रुकूअ हैं। क़ुरआन मजीद की कुल आयत की तादाद 6666 (छः हजार छः सौ छियासठ) है।      


रमज़ानुल मुबारक की सबसे अज़ीम नेअमत कुरआन है। क़ुरआन एक ऐसा चराग़ है जिसका हक़ पर होना बजाए ख़ुद रोशन है और उसकी रोशनी में इंसान हर उस मसअले को समझ सकता है जिसे समझने के लिए उसके अपने इल्म के साधन काफी नहीं हैं।

यह चऱाग जिस शख़्स केपास हो वह फिक्रो अमल की बे-शुमार पुरपेच राहों के दरमियान हक़ की सीधी राह देख सकता है और उम्रभर सिराते - मुस्क़ीम (सीधा रास्ता) पर इस तरह चल सकता है कि हर क़दम पर उसे यह मालूम होता रहे कि गुमराहियों की तरफ़ ले जाने वाली पगडंडियाँ किधर कोजा रही हैं और हलाकत (मौत) के ग़ढ़े कहाँ-कहाँ से आ रहे हैं और सलामती की राह उनके दरमियान कौन सी है।

क़ुरआन मजीद किताबे हिदायत है और हिदायत का मतलब यह है कि अहम तरीन सवालात का जवाब इसमें मिलता है और यह हिदायत सिर्फ उन लोगों के लिए है जो उसके मुतलाशी भी हों। यह उन लोगों के लिए हिदायत नहीं हो सकती जिनके ज़मीर मुर्दा हो चुके हैं और जिनमेंख़ूब और ना-ख़ूब की तमीज़ दम तो़ड़ चुकी है। तो ज़ाहिर है कि ऐसे लोगों के लिए यह किताबे-हिदायत नहीं है बल्कि ऐसे लोग इस किताब से उल्टा गुमराह हो जाते हैं। कुरआन बेशक हिदायत की किताब है मगर उसके लिए जो फ़िल वाक़ए हिदायत के जानने के मामले में संजीदा हो जो उसकी परवाह और खटक रखता हो।

क़ुरआन मजीद की कई आयत म़ें कुरआन को नूर (रोशनी) कहा गया है, जिससे मुराद हिदायत का नूर है यानी जाहिलिय्यत (निरक्षरता) के अँधेरे में रोशनी की किरन। लेकिन यह हमारी कितनी ब़ड़ी बदक़िस्मती है कि कुरआन की बे-हदो हिसाब नेअमतों से मेहरूम (वंचित) हैं। कुरआन इसलिए भेजा गया था के हम उसे प़ढ़ें, समझें और उसके मुताबिक़ अमल करें। वह हमें इज़्ज़त और ताक़त बख़्शने आया था। वह हमें ज़मीन पर ख़ुदा का असली ख़लीफ़ा बनाने आया था और तारीख़ गवाह है कि जब मुसलमानों ने उसकी हिदायत के मुताबिक अमलकिया तो इसने उनको दुनिया का इमाम और पेशवा बनाकर भी दिखा दिया।

मगर अब इसका मसरफ़ इसके सिवा कुछ और नहीं रहा के घर में इसको रखकर जिन्ना-भूत भगाएँ, इसकी आयतों को लिखकर गले में बाँधें और घोलकर पिएँ बेसोचे-समझे प़ढ़ लिया करें। अब हम इससे अपनी ज़िंदगी के मुआमलात में हिदायत नहीं माँगते हैं। हम नहीं पूछते कि हमारे अक़ाइद (श्रद्धा) क्या होने चाहिए? हमारे आमाल कैसे होने चाहिए? हमारे अख़लाक़ कैसे होने चाहिए? हम ज़िंदगी क्योंकर बसर करें? हमारे लिए हक़ क्या है और बातिल (झूठ) क्या? हमें इताअत (आदेश पालन) किसकी करनी चाहिए और ना फ़रमानी किसकी? ये बातें अब मुसलमान ने क़ुरआन से पूछना छो़ड़ दी हैं।

क़ुरआन तो़ खैर का सर चश्मा है। जितनी और जैसी खैर तुम इससे माँगोगे यह तुम्हें देगा। तुम इससे महज़ जिन्ना-भूत भगाना और खाँसी-बुख़ार का इलाज और मुकदमे की कामयाबी और नौकरी का हुसूल और ऐसी ही छोटी-छोटी ज़लील और बे-हक़ीकत चीजें माँगते हो तो यही तुम्हें मिलेगी। अगर दुनिया की बादशाही और रूए ज़मीन की हुकूमत माँगोगे तो वह भी मिलेगी और अगर अल्लाह के क़रीब पहुँचना चाहोगे तो यह तुम्हें वहाँ भी पहुँचा देगा। यह तुम्हारे अपने ज़र्फ़ की बात है कि समंदर से पानी की दो बूँदें माँगते हो वरना समंदर तो दरिया बख़्शने के लिए भी तैयार है।

क़ुरआन तारीख़ इंसानी में वह इकलौती किताब है जिसने इंसान को दावत दी है कि वह ग़ौरो फ़िक्र से काम लेकर समझने की कोशिश करे। अपने इर्द-गिर्द फैली हुई कायनात (संसार) पर नजर डाले और मुशाहेदा(मुआयना) करे। वह कहता है कि किसी की अँधी तक़लीद (नक़ल) न करो।

एक मक़ाम पर वाजेह तालीम देते हुए कहता है, 'क्या ये लोग़ कुरआन पर ग़ौरो-फ़िक्र नहीं करते या इनके दिलों पर ताले लगे हुए हैं।' (सूरह मोहम्मद, आयत 24) दूसरी जगह यह कहा गया है कि 'यह किताब उतारी ही इसलिए गई है के अक़्लो दानिश और ग़ौरो फ़िक्र करके इससे फ़ायदा उठाएँ।' सूरह नहल की आयत 89 में फ़रमाया गया है, 'हमने यह किताब तुम पर नाज़िल कर दी है, जो हर चीज की साफ़-साफ़ वज़ाहत करने वाली है।' सूरह क़मर की आयत 31 में़ फरमाया गया, 'हमने़ कुरआन को समझने के लिए आसान कर दिया तोकोई है जो समझे।'

आइए, हम इस मुबारक माह में अहद करें के़ कुरआनी इल्म को अपने अमल में उतारकर दुनिया के सारे लोगों तक इस पैग़ाम को पहुँचाएँ। हमारा अमल और किरदार देखकर लोग दूर से पहचान लें और कह उठें के यह क़ुरआन वाला मुसलमान है। इसका बुराई और दहशतगर्दीसे कोई ताअल्लुक़ नहीं। यह क़ाबिले ऐतेबार इंसान है। अगर हमने इस फ़र्ज़ की अदायगी में कोताही की तो दुनिया में जो नुक़सान और अज़ाब भुगतना होगा वह अपनी जगह लेकिन आख़िरत (परलोक) जिसका इस दुनयवी जिंदगी के बाद आना तय है वहाँ का अज़ाब इस क़दर सख़्त और बदतरीन होगा जिससे छुटकारा पाने की कोई सूरत न होगी।

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- नोमान अली मासूम
(लेखक तफहीमुलकुरआन जेरेसाया पुस्तक के रचयिता हैं।)

 

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