साल 2016 : शराबबंदी पर नीतीश पूर्ण वाहवाही : अपनों से फजीहत

पटना| पुनः संशोधित शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016 (19:03 IST)
पटना। में 'पूर्ण शराबबंदी' और 'सात निश्चय' पर अमल शुरू करने के कारण वर्ष में नीतीश सरकार को जहां खूब वाहवाही मिली वहीं सत्तारूढ़ दल के कुछ विधायकों के 'कारनामों' के कारण उसकी किरकिरी भी हुई।
बिहार में गुजरते वर्ष 2016 का एजेंडा मुख्यमंत्री ने वर्ष 2015 के 26 नवंबर को ही 1 अप्रैल 2016 से शराबबंदी लागू करने की घोषणा कर तय कर दिया था। मद्य निषेध और उत्पाद विधेयक 2015 के तहत प्रथम चरण में पूरे राज्य में 1 अप्रैल से देशी शराब के उत्पादन, सेवन और बिक्री पर रोक लगा दी गई, साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में विदेशी शराब की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। 
 
सरकार ने शराबबंदी के समर्थन में प्रबल जन समर्थन और महिला समूहों की ओर से शहरी क्षेत्रों में भी विदेशी शराब की बिक्री पर रोक लगाने की मांग को देखते हुए 5 अप्रैल से संपूर्ण राज्य में विदेशी शराब को प्रतिबंधित करने का निर्णय ले लिया।
 
सरकार के इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। इसी बीच सरकार ने पूर्ण शराबबंदी को और कड़ाई से अमल में लाने के लिए नई उत्पाद नीति 2016 को विधानमंडल के मानसून सत्र में पेश किया जिसे ध्वनिमत से मंजूरी दे दी गई। इस नए कानून में घर से शराब की बोतल बरामद होने पर परिवार के सभी वयस्क सदस्यों को गिरफ्तार करने और गांव पर सामूहिक जुर्माना करने जैसे प्रावधान हैं।
 
इसी दौरान पटना उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर को बिहार में पूर्ण शराबबंदी से संबंधित सरकार की अधिसूचना को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। मुख्य न्यायाधीश इकबाल अहमद अंसारी और न्यायमूर्ति नवनीति प्रसाद ने राज्य में पूर्ण शराबबंदी कानून को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि राज्य सरकार ने शराबबंदी से संबंधित 5 अप्रैल 2016 को जो अधिसूचना जारी की थी वह संविधान के अनुकूल नहीं है इसलिए इसे लागू नहीं किया जा सकता है। उच्च न्यायालय ने 20 मई को इस मामले पर सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
 
उच्च न्यायालय का फैसला मद्य निषेध और उत्पाद विधेयक 2015 से संबंधित राज्य सरकार की 5 अप्रैल 2016 को जारी अधिसूचना से जुड़ा था इसलिए मानसून सत्र के दौरान विधानमंडल के दोनों सदनों से पारित नए बिहार मद्य निषेध और उत्पाद विधेयक 2016 जिस राज्यपाल ने भी मंजूरी दे दी थी उसे 2 अक्टूबर से लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई। 
 
उधर नीतीश कुमार ने शराबबंदी के बाद मिल रहे जनसमर्थन से उत्साहित होकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका को और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से जनता दल यूनाइटेड (जदयू) की कमान संभालने का फैसला ले लिया। 23 अप्रैल को जदयू की औपचारिक तौर पर कमान संभालने के बाद कुमार ने ऐलान भी कर दिया कि वे राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ महागठबंधन बनाने में उत्प्रेरक की भूमिका अदा करेंगे जिससे वर्ष 2019 में मोदी सरकार की विदाई सुनिश्चित होगी।
 
कुमार इसके बाद सबसे पहले 10 मई को पड़ोसी राज्य झारखंड गए और वहां धनबाद से शराबबंदी को लेकर राष्ट्रीय अभियान की शुरुआत की। इसके बाद कुमार ने उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, दिल्ली और कई अन्य राज्यों में जाकर इसके लिए मुहिम चलाई। 
 
मुख्यमंत्री एक ओर जहां शराबबंदी के जरिए नशे के खिलाफ बड़े वर्ग को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे थे वहीं दूसरी ओर नवंबर 2015 के विधानसभा चुनाव के समय किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में कदम उठाकर अपनी छवि को और निखार रहे थे। वर्ष 2016 की शुरुआत में ही विकसित बिहार के 7 निश्चय के क्रियान्वयन को प्राथमिकता देते हुए उसके मिशन मोड में क्रियान्वयन, पर्यवेक्षण और परामर्श के लिए 25 जनवरी को नीतीश सरकार ने बिहार विकास मिशन का गठन कर दिया। 
 
नीतीश सरकार ने 'सात निश्चय' में शामिल 'सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण' देने का निश्चय 20 जनवरी को लागू कर दिया। इसी तरह 'हर घर, नल का जल' और 'शौचालय निर्माण, घर का सम्मान' निश्चय 27 सितंबर को लागू किया गया। 'आर्थिक हल, युवाओं को बल' निश्चय के तहत बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना, मुख्यमंत्री निश्चय स्वयं सहायता भत्ता योजना और कुशल युवा कार्यक्रम योजना की शुरुआत 2 अक्टूबर से हो गई। साथ ही 'बिहार स्टार्टअप नीति 2016' और सभी सरकारी विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में नि:शुल्क वाई-फाई सुविधा के लिए भी कार्य शुरू कर दिया गया है।
 
सरकार के एक अन्य निश्चय 'घर तक पक्की गली-नालियों' के निर्माण की योजना 28 अक्टूबर और 'हर घर बिजली लगातार' निश्चय की शुरुआत 15 नवंबर को कर दी गई। इसी तरह 'अवसर बढ़ें, आगे पढ़ें' निश्चय के तहत जिलों में जीएनएम स्कूल, पैरामेडिकल इंस्टीट्यूट, पॉलिटेक्निक, महिला औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान, अभियंत्रण महाविद्यालयों, चिकित्सा महाविद्यालयों में नर्सिंग कॉलेज और अनुमंडल में एएनएम स्कूल तथा सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की योजनाओं को स्वीकृति दे दी गई है।
 
'पूर्ण शराबबंदी' और 'सात निश्चय' पर अमल शुरू करने के कारण जहां मुख्यमंत्री कुमार खूब वाहवाही लूट रहे थे वहीं इसी दौरान सत्तारूढ़ महागठबंधन के घटक दलों के कुछ विधायकों के 'कारनामों' की वजह से सरकार की किरकिरी भी हो रही थी। इस वर्ष के आरंभ में ही जदयू विधायक सरफराज आलम को ट्रेन में महिला सहयात्री के साथ दुर्व्यवहार के मामले में गिरफ्तार किया गया। 17 जनवरी 2016 को गुवाहाटी राजधानी एक्सप्रेस में एक महिला सहयात्री ने आलम पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था। 
 
आरोप के बाद जदयू ने आलम को पार्टी से निलंबित कर दिया। आलम बिहार के किशनगंज के जोकीहाट से विधायक हैं और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद और पूर्व केंद्र‍ीय मंत्री मोहम्मद तस्लीमुद्दीन के पुत्र हैं, हालांकि बाद में निचली अदालत से जमानत मिलने के बाद 25 जनवरी को आलम जेल से बाहर आ गए।
 
इसी तरह सत्तारूढ़ महगठबंधन के प्रमुख घटक राजद के विधायक राजवल्लभ यादव पर नाबालिग लड़की से बलात्कार का आरोप लगा। लंबे समय तक फरार रहने के बाद राजद विधायक ने अंतत: पुलिस के बढ़ते दबाव और चल-अचल संपत्ति की कुर्की की प्रक्रिया के आरंभ होने पर अदालत में 10 मार्च को आत्मसमर्पण किया था। इस मामले में पुलिस यादव और 5 अन्य लोगों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 376 और पॉस्को एक्ट 2012 के तहत आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है।
 
सत्तारूढ़ जदयू की विधान पार्षद मनोरमा देवी के पुत्र रॉकी यादव पर व्यवसायी पुत्र आदित्य सचदेवा की हत्या का आरोप लगा। रोड रेज मामले में कारोबारी पुत्र की हत्या के आरोपी रॉकी यादव की खोज में जब पुलिस ने विधान पार्षद मनोरमा देवी के गया शहर स्थित आवास पर छापेमारी की तो मौके पर से विदेशी शराब की बोतलें बरामद की गई थीं। पुलिस ने इसके बाद नए मद्य निषेध और उत्पाद कानून के उल्लंघन के आरोप में विधान पार्षद के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी।
 
मामले में मनोरमा देवी ने 17 मई को स्थानीय अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया था और करीब 1 पखवाड़े से भी अधिक समय तक जेल में रहने के बाद पटना उच्च न्यायालय से 6 जून को उन्हें जमानत मिली है, हालांकि इसी दौरान जदयू ने उन्हें दल से निलंबित भी कर दिया। 
 
इसी तरह 7 सितंबर को पटना उच्च न्यायालय से जब राजद के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन की जमानत मंजूर हुई तो सरकार को फजीहत झेलनी पड़ी। कई आपराधिक मामलों में करीब 11 वर्ष तक जेल में रहने के बाद जमानत मंजूर होने पर जब 10 सितंबर को वे भागलपुर जेल से रिहा हुए तब उनके काफिले में पत्रकार राजदेव रंजन हत्याकांड का मुख्य आरोपी भी शामिल था। इसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर जारी होने के बाद सरकार को चौतरफे हमले झेलने पड़े। 13 मई की रात एक प्रमुख हिन्दी दैनिक के पत्रकार राजदेव की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में मुख्य आरोपी लड्डन मियां है, जो मो. शहाबुद्दीन का करीबी बताया जाता है।
 
मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर सीधा हमला करते हुए आरोप लगाया कि वे प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में प्रदेश की अपनी जिम्मेवारियों को निभाने में असफल हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि निखारने पर विशेष ध्यान देने के कारण राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से चरमरा गई है। उन पर राजद के दबाव में काम करने का भी आरोप लगाया गया।
 
भाजपा ने आरोप लगाया कि नीतीश सरकार राजद के दबाव में आकर विधायक राजवल्लभ यादव और पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन के खिलाफ अदालत में मुकदमे को मजबूती से नहीं लड़ रही है जिसके कारण वे जमानत पर रिहा हो गए। हालांकि 30 सितंबर को सीवान के चर्चित तेजाब हत्याकांड के चश्मदीद राजीव रोशन की हत्या के मामले में पटना उच्च न्यायालय से मंजूर जमानत को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया। इसके बाद उस दिन मो. शहाबुद्दीन ने सीवान की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया।
 
गुजर रहे वर्ष में सिर्फ सत्तारूढ़ दलों को ही अपने विधायकों के कारण फजीहत नहीं झेलनी पड़ी थी बल्कि मुख्य विपक्षी दल भाजपा को भी अपने विधायक के कारनामे के कारण शर्मसार होना पड़ा था। भाजपा विधान पार्षद टुन्नाजी पांडेय को 12 साल की 1 नाबालिग के साथ पूर्वांचल एक्सप्रेस में कथित तौर पर छेड़छाड़ करने के आरोप में 24 जुलाई को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
 
मुख्यमंत्री कुमार ने नोटबंदी के मुद्दे पर महागठबंधन के अन्य घटक दल राजद और कांग्रेस से अलग राय रखते हुए इस मामले में नरेन्द्र मोदी सरकार को खुला समर्थन दिया। राजद के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस संबंध में कुमार की आलोचना करते हुए कहा कि वे सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि महागठबंधन के नेता भी हैं और इस लिहाज से उन्हें अलग राय नहीं रखनी चाहिए थी।
 
महागठबंधन में नोटबंदी को लेकर अलग-अलग राय से फजीहत इतनी बढ़ गई कि कुमार को राजद विधायक दल की बैठक में जाकर यह बताना पड़ गया कि नोटबंदी से आम लोग परेशान हैं और उनकी पार्टी भी इसे लेकर राजद से अलग राय नहीं रखते। बाद में राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने कहा कि महागठबंधन में नोटबंदी के मामले में कोई मतभेद नहीं है और सभी एकजुट हैं। उन्होंने कहा कि कुमार ने 30 दिसंबर के बाद पार्टी की बैठक बुलाकर नोटबंदी के मुद्दे पर दिए जा रहे समर्थन पर पुनर्विचार करने की बात कही है।
 
राजद अध्यक्ष यादव इसी वर्ष जनवरी माह में नौवीं बार लगातार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। वे वर्ष 1997 से लगातार इस पद पर बने है, जब जनता दल में विभाजन के बाद राष्ट्रीय जनता दल का गठन हुआ था। बिहार में पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की करारी हार के बाद प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय को दुबारा मौका नहीं दिया गया और पार्टी के सांसद नित्यानंद राय को नवंबर में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया।
 
मुख्यमंत्री कुमार ने पिछले 10 वर्षों से अधिक समय से आयोजित किए जा रहे 'जनता दरबार में मुख्यमंत्री' कार्यक्रम को इस वर्ष मई में बंद कर दिया। लोक शिकायत निवारण अधिनियम लागू किए जाने के कारण अब इस कार्यक्रम को आयोजित करना आवश्यक नहीं समझा गया, क्योंकि नए अधिनियम के लागू होने से लोगों के शिकायतों को समयसीमा में दूर करने की व्यवस्था की गई है। मुख्यमंत्री ने अब लोगों से सुझाव प्राप्त करने के लिए 'लोकसंवाद' कार्यक्रम 5 दिसंबर से शुरू किया है। (वार्ता)

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