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मौलिक अधिकार और बलात्कार

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- मौलश्री राठी
बलात्कार यानी बल के बूते पर किया हुआ कार्य। यह एक ऐसा अनुभव है, जो पीड़िता के जीवन की बुनियाद को हिलाकर रख देता है। दुःखद बात यह है कि यह एक ऐसा अपराध है, जहाँ कालिख बलात्कारी के बजाय उस नारी के माथे पर लग जाती है।

बहुत सी स्त्रियों के लिए इसका दुष्परिणाम लंबे समय तक रहता है, व्यक्तिगत संबंधों की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित करता है, व्यवहार और मूल्यों को बदल आतंक पैदा करता है। सुदर्शना द्विवेदी ने 'कलमुँही तू मर क्यों नहीं गई', (धर्मयुग) 1 दिसंबर, 1992 में लिखा था।
'चाँद-सूरज पर राहू ग्रहण लगाता है तो कुछ देर बाद वे मुक्त हो जाते हैं पर बलात्कार का राहू यदि किसी नारी के जीवन पर ग्रहण लगा दे तो ऐसी लंबी काली अंधकारी त्रासद चादर उसे घेरती है, जिससे ता उम्र वह निकल नहीं पाती।
उसकी ही नहीं उसमें पूरे परिवार की प्रतिष्ठा इस जघन्य दुष्कृत्य के परिमाणस्वरूप धूलधूसरित हो जाती है। इतनी कि उसके अपने भी क्षुब्ध होकर बोल उठते है, कलमुँही तू मर क्यों नही गई, मौत तो सिर्फ शरीर की होती है, बलात्कार तो अस्मिता को भी चूर-चूर कर देता है और आत्मसम्मान को भी।'

इन शब्दों की करुणा भी उस नारी के दुःख को नहीं समझ सकती। जो उस नारी ने खोया है, वह तो कभी लौटया नहीं जा सकता पर समाज का इतना तो कर्तव्य बनता है कि जो उसके दायरे की जिम्मेवारी है, उसे सफलता से कार्यान्वित करे।
आज बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इसका एक ही कारण है कि अभी तक कोई ऐसा कानून नहीं बन पाया जो इस सामाजिक बुराई पर पूर्ण आवेश से प्रहार कर पाए। मौजूदा कानून में चलनी की तरह दर्जनों छेद हैं, जिनसे अपराधी बच निकलते हैं और इसी से शह पाकर बलात्कारियों के हौसले बुलंद होने लगते हैं और निर्बाधित होकर चलने लगता है बलात्कार का सिलसिला।
बलात्कारियों की सजा क्या हो, इस विषय पर बरसों से चली आ रही बहस अब भी जारी है। इस विषय पर फिल्मी सितारे तथा सांसद, राज बब्बर, कहते हैं कि बलात्कार जैसे घृणात्मक कार्य के लिए तीव्रतम दंड देना चाहिए और इंसान की जिंदगी के हक को छीन लेने से तीव्र दंड और क्या होगा।

मृत्यु दंड भी इस घृणित कार्य के लिए कम है। इनका कहना बिलकुल सही है पर इंदिरा जयसिंह जो कि सुप्रीम कोर्ट की प्रसिद्ध वकील हैं, कहती हैं कि उन 41, 000 बलात्कार के मुकदमों का क्या जिनका आज तक कोई फैसला ही नहीं हुआ, कोई नहीं जानता कि उन पर कब निर्णय हो पाएँगे, अपराधी खुले आम घूम रहे हैं।
क्या यह सही है? इंदिरा कहती हैं कि ज्यादा जरूरी ये नहीं कि उन्हें कठोरतम सजा सुनाई जाए, बल्कि यह है कि अपराधी को दी गई सजा कठोरता से कार्यान्वित की जाए। इनके अनुसार बलात्कारियों को मौत की सजा और कुछ नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक सजा ही होती है।

महिलाओं के विरुद्ध बलात्कारी ही केवल एक अपराध नहीं है, बल्कि घरेलू हिंसा, यौन प्रताड़ना, कार्यस्थल पर छेड़छाड़ तथा पत्नियों की हत्याएँ भी इसी श्रेणी में आती हैं। बलात्कारी तथा महिलाओं को यौन प्रताड़ना देने वाले की मानसिकता एक समान होती है। दोनों ही महिलाओं को भोग की वस्तु मानकर व्यवहार करते हैं।
इस विचारधारा को हमें बदलना होगा। समाज में महिलाओं को उनका वाजिब हक मिलना चाहिए। ऐसे कई प्रकरण हैं, जिनमें एक अदालत ने अपराधी को मौत की सजा सुनाई है तो दूसरी ने आजीवन सजा में उसे बदल दिया है।

ऐसा नहीं है कि कानून कुछ नहीं कर रहा है, पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय (दिनांक 28 जनवरी 2000) में कहा कि बलात्कार स्त्री के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इस निर्णय से कानून और न्याय का नया बिम्ब सामने आया है।
यह निर्णय लैंगिक न्याय की दिशा में एक प्रगतिशील कदम ही नहीं, बल्कि मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है। मानवाधिकार सिर्फ 'मुठभेड़' में मारे गए आंतकवादियों के लिए ही नहीं, यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों के पक्ष में भी परिभाषित होना जरूरी है।

कानून अपना काम जरूर कर रहा है, लेकिन समाज को, मुझे, आपको, सबको अपनी विचारधाराएँ, धारणाएँ बदलनी होंगी, उस पीड़िता की तकलीफ के प्रति संवेदनशील बनना होगा, ताकि फिर कोई सुदर्शना द्विवेदी को ये लिखने की जरूरत न पड़े कि 'कलमुँही तू मर क्यों नहीं गई'।

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