''विशु'' में जंगली जानवरों का शिकार
झारखंड में
वन विभाग के प्रतिबंध के बावजूद आदिवासियों के पारंपरिक 'विशु शिकार' के दौरान सोमवार को आदिवासियों ने दलमा पहाड़ियों में घुसकर अनेक जंगली जानवरों का शिकार किया है।
आदिवासियों की यह परंपरा लगभग 100 साल पुरानी है जिसके तहत बैसाखी के दिन ही आदिवासी पुजारियों और मुखियाओं द्वारा पूजा के बाद 'विशु' के पारंपरिक शिकार का दिन तय होता है।
हर साल हजारों की संख्या में आदिवासी बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग शिकार की इस रस्म को अदा करते आए हैं। इस बार राज्य के वन विभाग ने विशु शिकार पर प्रतिबंध लगाते हुए पूरे दलमा क्षेत्र की नाकेबंदी कर दी थी।
अनेक जानवरों का शिकार : 'विशु' के मौके पर सरकारी रोक के बावजूद झारखंड के आदिवासी दलमा पहाड़ियों में घुसे और उन्होंने अनेक जंगली जानवरों का शिकार कर ये पारंपरिक रस्म अदा की।
माओवादी विद्रोहियों की दहशत, वन विभाग की नाकेबंदी और पारंपरिक आदिवासी शिकारियों के गुस्से के कारण झारखंड के पूर्वी सिंहभूमि जिले के दलमा के जंगलों में सोमवार का दिन काफी मुश्किलों भरा रहा।
रविवार की देर रात से ही हजारों की संख्या में आदिवासी शिकारी वन विभाग के आदेश को धता बताते हुए दलमा पहाड़ियों के जगंलों में घुस गए। 'वीर दिशुवा' (आदिवासी योद्घा) ने हाथों में पारंपरिक हथियार उठा रखे थे और ढोल-नगाड़े बजाए जा रहे थे।
शिकार के
बाद जब आदिवासी शिकारी सोमवार देर रात दलमा पहाड़ियों पर से उतरे तो उनके हाथों में लाल गिलहरी, जंगली सुअर, हिरण, खरगोश और जंगली बिल्ली जैसे जानवर थे। कुछ आदिवासी शिकारियों का दावा था कि इस बार उन्होंने दुर्लभ भालू का भी शिकार किया।
वन संरक्षकों का दावा : उधर घने जंगल में डेरा डाले झारखंड के मुख्य वन संरक्षक एके सिंह ने बीबीसी से कहा कि इस बार हमने 11 गश्ती दलों के साथ-साथ 7 दंडाधिकारियों को तैनात किया था। साथ ही दलमा आने के सभी रास्तों की नाकेबंदी भी की गई।
दूसरी ओर दलमा विशु संद्रा समिति के अध्यक्ष डेमरा सोय ने दावा किया कि उनकी जानकारी में 15 जंगली जानवरों का शिकार किया गया। कुछ अन्य आदिवासियों का दावा था कि शिकार किए गए जानवरों की संख्या ज्यादा है।
डेमरा कहते हैं कि हमारे पारंपरिक शिकार पर रोक लगाकर वन विभाग ने अच्छा नहीं किया। वनों को आदिवासियों से खतरा नहीं है। खतरा तो दलमा के इर्द-गिर्द पनप रहीं हजारों क्रशर मशीनों से है, जिनकी वजह से प्रदूषण फैल रहा है और जानवर जंगल से भागने को मजबूर हैं।
आदिवासी मान्यताओं के अनुसार अगर किसी वर्ष 'विशु शिकार' का आयोजन नहीं किया जाता है तो उस वर्ष इलाके में भुखमरी, अकाल, बीमारी या फिर प्राकृतिक आपदा का प्रकोप होता है।
मुख्य वन संरक्षक एके सिंह का कहना था कि उनका विभाग आदिवासी समाज में जागरूकता लाने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष शिकारियों की संख्या में काफी कमी आई है।
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आदिवासियों की यह परंपरा लगभग 100 साल पुरानी है जिसके तहत बैसाखी के दिन ही आदिवासी पुजारियों और मुखियाओं द्वारा पूजा के बाद 'विशु' के पारंपरिक शिकार का दिन तय होता है।
हर साल हजारों की संख्या में आदिवासी बच्चे, नौजवान और बुजुर्ग शिकार की इस रस्म को अदा करते आए हैं। इस बार राज्य के वन विभाग ने विशु शिकार पर प्रतिबंध लगाते हुए पूरे दलमा क्षेत्र की नाकेबंदी कर दी थी।
अनेक जानवरों का शिकार : 'विशु' के मौके पर सरकारी रोक के बावजूद झारखंड के आदिवासी दलमा पहाड़ियों में घुसे और उन्होंने अनेक जंगली जानवरों का शिकार कर ये पारंपरिक रस्म अदा की।
माओवादी विद्रोहियों की दहशत, वन विभाग की नाकेबंदी और पारंपरिक आदिवासी शिकारियों के गुस्से के कारण झारखंड के पूर्वी सिंहभूमि जिले के दलमा के जंगलों में सोमवार का दिन काफी मुश्किलों भरा रहा।
रविवार की देर रात से ही हजारों की संख्या में आदिवासी शिकारी वन विभाग के आदेश को धता बताते हुए दलमा पहाड़ियों के जगंलों में घुस गए। 'वीर दिशुवा' (आदिवासी योद्घा) ने हाथों में पारंपरिक हथियार उठा रखे थे और ढोल-नगाड़े बजाए जा रहे थे।
शिकार के
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वन संरक्षकों का दावा : उधर घने जंगल में डेरा डाले झारखंड के मुख्य वन संरक्षक एके सिंह ने बीबीसी से कहा कि इस बार हमने 11 गश्ती दलों के साथ-साथ 7 दंडाधिकारियों को तैनात किया था। साथ ही दलमा आने के सभी रास्तों की नाकेबंदी भी की गई।
दूसरी ओर दलमा विशु संद्रा समिति के अध्यक्ष डेमरा सोय ने दावा किया कि उनकी जानकारी में 15 जंगली जानवरों का शिकार किया गया। कुछ अन्य आदिवासियों का दावा था कि शिकार किए गए जानवरों की संख्या ज्यादा है।
डेमरा कहते हैं कि हमारे पारंपरिक शिकार पर रोक लगाकर वन विभाग ने अच्छा नहीं किया। वनों को आदिवासियों से खतरा नहीं है। खतरा तो दलमा के इर्द-गिर्द पनप रहीं हजारों क्रशर मशीनों से है, जिनकी वजह से प्रदूषण फैल रहा है और जानवर जंगल से भागने को मजबूर हैं।
आदिवासी मान्यताओं के अनुसार अगर किसी वर्ष 'विशु शिकार' का आयोजन नहीं किया जाता है तो उस वर्ष इलाके में भुखमरी, अकाल, बीमारी या फिर प्राकृतिक आपदा का प्रकोप होता है।
मुख्य वन संरक्षक एके सिंह का कहना था कि उनका विभाग आदिवासी समाज में जागरूकता लाने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि पिछले वर्षों की तुलना में इस वर्ष शिकारियों की संख्या में काफी कमी आई है।

