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Written By संदीप तिवारी

क्या सीखें इसराइल से?

भारत
मुंबई पर आतंकवादी हमलों का एक प्रमुख पहलू यह भी रहा है कि पा‍किस्तानी-बांग्लादेशी आतंकवादियों (जिन्हें इस्लामी जेहादी भी कह सकते हैं) ने हिंदुस्तानियों, विदेशियों और इसराइलियों को खासतौर पर अपना निशाना बनाया है।

हिंदुस्तानी लोगों से उनका बैर समझ में आता है लेकिन विदेशियों और यहूदियों को मारना यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि वे इस्लामी आतंकवाद का पाठ पढ़कर आए थे। भारत को भी समय-समय पर आतंकवादी हमलों का शिकार होना पड़ा है। लेकिन मुंबई में जो पहली बार देखने में आया वह देश के किसी हिस्से में बड़े पैमाने पर आतंकवादी युद्ध का नजारा था।

किंतु इसराइल में यह संकट और समस्या दशकों से रही है। इसलिए इस नई आतंकवादी प्रवृत्ति के बारे में भारत, इसराइल से बहुत कुछ सीख सकता है। इस मामले में भारत को अंतरराष्ट्रीय मदद और सहानुभूति की जरूरत है।

सहानुभूति तो इसे बहुत से देशों से मिल सकती है लेकिन मदद कौन-कौन से देश करेंगे। क्या ये देश वास्तव में ऐसा कुछ करना चाहेंगे? क्या वे आतंकवादी युद्ध पर आई लागत को वहन करेंगे? क्या वे कोई जोखिम मोल लेना चाहेंगे? अगर ऐसा होता है तो सब कुछ बदल सकता है लेकिन ऐसा होना संभव नहीं लगता।

अगर आतंकवादी पाकिस्तान के प्रशिक्षण केन्द्रों या ठिकानों से आए तो भारत चाहेगा कि इस मामले पर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की जानी चाहिए। पाकिस्तान पर यह दबाव डाला जाना चाहिए कि वह अपने यहाँ आतंकवादी केन्द्रों, प्रशिक्षण शिविरों को बंद करे, आतंकवादियों को मदद देना बंद करे और पाकिस्तानी खुफिया जानकारी को आतंकवादियों तक न पहुँचने दे।

लेकिन क्या पश्चिमी देश ऐसा कोई उपाय करेंगे जिससे कि पाकिस्तान पर दबाव पड़े? क्या ये देश पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने की कार्रवाई करेंगे अथवा इस तरह के हमलों की भर्त्सना करेंगे? क्या पश्चिमी देश भारत विरोधी आतंकवादी अभियान के खिलाफ जिम्मेदारी निभाते हुए अपनी जाँचों के परिणामों को सारी दुनिया के सामने रखेंगे?

यह बिल्कुल भी संभव नहीं है क्योंकि अंतत: इस तरह के कामों में पैसा खर्च होगा और जोखिम भी जुड़ा होगा कि इस्लामी आतंकवादी उनके देशों में भी हमला कर सकते हैं? इतना ही नहीं उन्हें पाकिस्तान की मदद की जरूरत पड़ती है ताकि अन्य देशों के इस्लामी आतंकवादी हमलों से उनका बचाव हो सके? ये देश परमाणु हथियारों की तकनीक के फैलाव को रोकने और अफगानिस्तान में कुछ स्थायित्व बनाए रखने के लिए पाक सहयोग को हासिल करना जरूरी मानते हैं।

लेकिन इसराइल के साथ भी कुछ ऐसा ही है जैसाकि भारत सामना कर रहा है। सीरिया, लेबनान और ईरान दशकों से उसके खिलाफ आतंकवादी कार्रवाई करते रहे हैं। अमेरिका और कुछ यूरोपीय देश सीरियाई सरकार पर दबाव बनाते रहे कि वह दमिश्क में स्थापित आतंकवादी मुख्यालयों को बंद कर दे लेकिन सीरिया ने कभी तो स्पष्ट इनकार कर दिया। कभी झूठ बोल दिया कि उसने ऐसा कर दिया है जबकि वास्तव में ऐसा नहीं किया गया। सीरिया पर प्रतिबंध भी लगाए गए लेकिन येन केन प्रकरेण वह अपने को किसी भी प्रकार के दबाव से बचाने में कामयाब रहा।

वास्तविक अर्थों में आतंकवाद का विश्व स्तर पर मुकाबला करने जैसी बातों के बावजूद भारत भी इसराइल की तरह अपने ही बलबूते पर खुद को आतंकवाद का सामना करने को विवश पाता है।

भारत की तरह इसराइल को भी लेबनान में एक ऐसे देश से सामना करना पड़ता है जिसकी कोई सरकार ही नही है। लेबनान में कोई प्रभावी सरकार नहीं है, ठीक उसी तरह से पाकिस्तान में ऐसी कोई सरकार नहीं है जोकि भारत के साथ कोई सार्थक पहल कर सके।

वास्तव में पाकिस्तान एक ऐसा देश है जोकि अराजकता की स्थिति में है। इस देश के खुफिया तंत्र में ऐसे गुट मौजूद हैं जोकि आतंकवाद को बढ़ावा देने का काम करते हैं। पाकिस्तान का इस्लामी ढाँचा भी एक समस्या है। पाक में एक सदाशयी सरकार भी चाहकर पूरी ईमानदारी से अपने वायदों पर अमल नहीं कर सकती है।

इसी तरह इसराइल के सामने ईरान और सीरिया की सरकारें हैं जोकि अपने कट्‍टरपंथी विचारों को छोड़ना ही नहीं चाहती हैं। इन देशों में तो स्थिति यह है कि अगर कहीं इसराइली नागरिक मारे जाते हैं तो समूचे अरब जगत में खुशियाँ मनाई जाती हैं।

ऐसी स्थिति में इसराइल के सामने क्या विकल्प हैं? इसके सामने आतंकवादी शिविरों के खिलाफ क्रॉस बार्डर रेड्‍स करने के अलावा क्या उपाय है? आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों या आतंकवादी गुटों के खिलाफ कार्रवाई ही आत्मरक्षा का एक उपाय बचता है।

क्या भारत अपनी आत्मरक्षा में यह कदम उठा सकता है? क्या उस पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमलावर देश का लेबल नहीं लगा देगा? एक पड़ोसी देश द्वारा छिपे तौर पर हमले के बावजूद क्या भारत पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध का खतरा मोल ले सकता है? साथ ही यह भी नहीं भूलें कि पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं। जबकि इसराइल के सामने ईरान ऐसे हथियार लेकर जल्द खड़ा हो सकता है।

इसलिए हमें सोचना होगा कि कट्‍टरपंथी गुटों और देशों द्वारा रणनीति के तौर पर आतंकवाद का तर्क दिया जाए तो पीड़ि‍त देश क्या करे? इस पीड़‍ित देश को न केवल अपनी रक्षा करनी है वरन आत्मरक्षा के लिए कड़े फैसले भी लेने पड़ सकते हैं। अंत में झगड़े की जड़ का सवाल आता है।

इसराइल ने फिलीस्तीन राज्य का प्रस्ताव किया, जीती गई जमीन वापस की और भी कई रियायतें दीं ताकि क्षेत्र में शाँति बनी रह सके लेकिन इस पर फिर भी आरोप लगाया जाता है‍ कि इसराइल फिलीस्तीन को पर्याप्त छूट नहीं दे रहा है। आतंकवादी और उनके प्रायोजक इस तर्क को अपने पक्ष में इस्तेमाल करते हैं। वे बहुत अधिक या पूरी न किए जाने वाली माँगे रखते हैं और इसके बदले में इतना कम देना चाहते हैं ताकि संघर्ष को भी चलाते रहें और खुद को पीड़‍ित भी बताते रहें।

इसलिए अगर भारत कश्मीर पर अपना दावा छोड़ देता है तो यह समस्या हमेशा के लिए खत्म नहीं होगी वरन यह एक प्रवृत्ति बन जाएगी। इसलिए भारत को इसराइली अनुभव के आलोक में कुछ कड़े फैसले लेने होंगे। भारत को तय करना होगा कि कोरी लफ्फाजी की बजाय यह किस तरह ठोस अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समर्थन को अपने पक्ष में करे और लोगों की मौत और बर्बादी के बदले सहानुभूति के सैलाब में ना बहे? इसे तय करना होगा कि यह कैसे आतंकवादी गुटों को नष्ट करे, देश की सीमा से बाहर आतंकवादी केन्द्रों को बरबाद करे और आतंक को बढ़ावा देने वालों को कुचले?

इस मामले में इसराइल का अनुभव भारत के काम आ सकता है। सबसे पहला सबक है कि अपने आप पर निर्भर रहें। आत्मरक्षा के मामले पर गलत आलोचना का जमकर सामना करें, आतंकवाद रोधी कार्रवाई को बहुत गंभीरता से ले, अपने देश के सभी नागरिकों को एक सक्रिय चेतावनी व्यवस्था के रूप में विकसित करें और इसके अलावा यह तय करें कि आपको कब और कहाँ बदले में हमले करने हैं।

आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के इस समय में भी आतंकवाद से अपनी रक्षा करना बहुत कठिन काम है क्योंकि इस काम में आप की मदद करने वाले बहुत थोड़े ही होंगे। चूँकि कट्‍टरपंथी इस्लामी गुट और देश अपने प्रचार तंत्र में भी बहुत भरोसा रखते हैं भले ही उनके मददगार कम हों और दुश्मन चाहे जितने अधिक हों। इसी तरह आप अपने देश में 90 करोड़ हिंदुओं और अन्य भारतीयों को नाराज नहीं कर सकते।

देश में हिंदु और सिख हैं तो मुस्लिम भी हैं। और जरूरत है प्रत्येक को जोड़ने की क्योंकि एक और एक मिलकर ग्यारह हो सकते हैं। ठीक इसी तरह इस्लामी जेहाद का सामना कर रहे भारत और इसराइल एक दूसरे की मदद कर ग्यारह की ताकत बन सकते हैं जोकि अन्य किसी देश के मुकाबले दस गुनी अधिक होगी।
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संदीप तिवारी