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Written By संदीपसिंह सिसोदिया

टूटता भरोसा, सकते में देश

भारतीय नौसेना
आज सुबह भारतीय नौसेना के हेलिकॉप्टर को मुंबई के नरीमन प्वाइंट रहवासी इलाके में अपने ही देश में, अपनी ही धरती पर गोलियाँ बरसाते देख ऐसा लगा कि यह भारत नहीं, फिलिस्तीन की गाजा पट्टी हो। क्या आज इस पूरे देश में कोई सुरक्षित है?

आखिर कहाँ चूक हुई जो आज ऐसी स्थिति आ गई कि आतंकवादियों के हौसले इतने बुलन्द हो गए कि उन्होंने छिपकर धमाके करना छोड़ आमने-सामने की लड़ाई में सीधे-सीधे भारत सरकार को चुनौती दे डाली।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह सामने आया है कि इतना बड़ा आतंकी हमला हुआ और केंद्र सरकार को कोई खुफिया सूचना या संकेत नहीं मिल सका या अपनी सत्ता बचाने में लगा केंद्रीय शीर्ष नेतृत्व इन सूचनाओं को समझ नहीं पाया?

  भारतीय नौसेना के हेलिकॉप्टर को मुंबई के नरीमन प्वाइंट रहवासी इलाके में अपने ही देश में, अपनी ही धरती पर गोलियाँ बरसाते देख ऐसा लगा कि यह भारत नहीं, फिलिस्तीन की गाजा पट्टी हो। क्या आज इस पूरे देश में कोई सुरक्षित है?      
केंद्र तथा राज्यों में अलग-अलग दल की सरकारें होने की वजह से भी कई बार परेशानी आती है, जिसे दूर करने के लिए एक एकीकृत संघीय एजेंसी बनाने की माँग पिछले कुछ सालों से लगातार उठती रही है। लगातार बढ़ते क्षेत्रीयवाद और धार्मिक भेदभाव के कारण कई बार कड़े कानून लागू नहीं हो पाते, जिसका परिणाम है पकड़े जाने के बावजूद आतंकी या उनके सहयोगियों को सजा नहीं मिल पाती। अगर आतंकवाद को लेकर कड़े कानून नहीं लागू किए जाएँगे तो आतंकियों के हौसला तो बढ़ना ही हैं।

भारत के गृहमंत्री शिवराज पाटिल अपनी नाक के नीचे दिल्ली में हुए धमाकों के दौरान 6 घंटे के भीतर 3 अलग-अलग पोशाकों में मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान देते हैं। किसी जमाने में रेल दुर्घटना होने पर नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने वाले मंत्री से रत्तीभर भी प्रेरणा आज के 'नेता' क्यों नहीं लेते?

350 तक सुरक्षाकर्मियों की भारी-भरकम फौज से रक्षित (उप्र की मुख्यमंत्री मायावती) जैसे हमारे 'नेताओं' को आम आदमी की जान की कितनी चिंता है, यह उनके बयानों से साफ झलकती है। हर धमाके के बाद 'आदरणीय' गृहमंत्री या कोई और बड़ा नेता सीना ठोंककर बोलता है कि 'दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, हम कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेंगे' और परिणामस्वरूप पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे सुरक्षाबलों को अतिसुरक्षित समझे जाने वाले इलाकों में तैनात कर दिया जाता है। पर अभी तक एक भी आतंकी को क्या सरकार ऐसी सजा दिला पाई है? क्या कोई ऐसी मिसाल कायम की गई है कि जिससे थोड़ा भी डर इन आतंकियों में बैठा हो?

इस हमले पर भी संसद में बहस होगी और एक प्रस्ताव बिना शोर-शराबे के पारित हो जाएगा, वो होगा नेताओं की वर्तमान सुरक्षा बढ़ाने का प्रस्ताव। इस प्रस्ताव का विरोध कोई राजनीतिक दल नहीं करेगा। आखिर मुंबई हमले में इस बार कुछ सांसद और वीवीआईपी भी फँसे हैं।

पर सवाल यह है कि आखिर कब तक सुरक्षा के रक्षात्मक उपाय सोचे जाएँगे। अब पानी सिर के ऊपर पहुँच चुका है। अब समय आ गया है कि देश के दुश्मनों को उनके घर में घुसकर मारा जाए। चाहे वे पाकिस्तान के हों या बांग्लादेश के। जब प्रधानमंत्री देश के नाम सन्देश में इस हमले में विदेशी सूत्र की बात स्वीकार कर चुके हैं और अब प्राप्त जानकारी के मुताबिक ऐसी कई खबरें आ रही हैं जिनमें इसके पीछे पाकिस्तान में बैठे आतंकी संगठनों का हाथ बताया जा रहा है। यह हमला तब हुआ है, जब पाकिस्तानी विदेशमंत्री भी भारत की यात्रा पर हैं, अभी तक विदेश मंत्रालय द्वारा एक बार भी इस बारे में उनसे कोई बात करने की खबर नहीं आई है।

इतिहास गवाह है कि भीरू नेतृत्व की आयु ज्यादा लम्बी नहीं होती। एक और बात अब साफ हो गई है कि गठबंधन सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी करती है, क्योंकि इनका पूरा ध्यान या तो अपनी कुर्सी बचाने में लगा रहता है या सहयोगी दलों को खुश करने की कोशिशों में। इस वजह से आंतरिक सुरक्षा पर महज यह ध्यान दिया जाता है कि किसी शहर में कोई हमला होने पर केंद्रीय गृह मंत्रालय अन्य राज्यों को हाई अलर्ट कर देता है, पर इसके बावजूद बेंगलुरु में धमाकों के ठीक अगले दिन अहमदाबाद में बड़े पैमाने पर बम धमाके होते हैं।

  आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को असुरक्षित देश माना जाने लगा है। लगभग सभी देशों ने अपने नागरिकों के लिए भारत को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से भारत की यात्रा टालने का आग्रह किया गया है।      
अब अंतरराष्ट्रीय समुदाय से दबने का और शांतिप्रिय राष्ट्र का तथाकथित तमगा सीने पर ढोने का समय नहीं है। आज हमारे देश की धरती हमारे ही देशवासियों के खून से रंगी जा रही है। अगर कोई सरकार देश की जनता को उसके देश में सुरक्षित जीने का अधिकार नहीं दे सकती तो उसके होने का कोई मतलब नहीं। एक के बाद एक लगभग हर महीने धमाके हो रहे हैं। आतंकियों ने अब तक नागरिकों को निशाना बनाने के लिए जनसंहारक हथियारों को छोड़ सभी तरीके आजमा लिए हैं और अगर भारत सरकार का यही लचर रुख कायम रहता है तो शायद यह बदकिस्मती भी हमें झेलनी पड़ सकती है।

आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को असुरक्षित देश माना जाने लगा है। लगभग सभी देशों ने अपने नागरिकों के लिए भारत को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं, जिसमें स्पष्ट रूप से भारत की यात्रा टालने का आग्रह किया गया है। वैसे भी यह हमला ताज पर किया गया है और अधिकतर विदेशी पर्यटकों के लिए ताज भारत का पर्याय है।

इस हमले ने न केवल देशवासियों के जान-माल, वरन भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी भारी नुकसान पहुँचाया है। जो देश विश्वव्यापी आर्थिक मंदी से नहीं हिला उसे चंद आतंकवादियों ने महज इसलिए हिला दिया, क्योंकि भारत के शीर्ष नेतृत्व ने सही समय पर आतंकियों से लड़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। यह हमला आतंकियों द्वारा केंद्र सरकार को सीधे-सीधे चुनौती है। अब वक्त है सत्ता का मोह छोड़कर वास्तविक कार्रवाई का, भले ही उसके लिए हमें सरहद पार ही क्यों न करना पड़े।
लेखक के बारे में
संदीपसिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो: IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC,  DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक  मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से.... और पढ़ें