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Written By ND

चुनाव आत्मनिर्णय का अधिकार है!

विधानसभा चुनाव अधिकार राजनीति
- बीजी वर्गीज
मीर वाइज ने कहा है कि वे जनवरी में संभावित जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों का बहिष्कार करेंगे क्योंकि वे वहाँ की जनता को आत्मनिर्णय का अधिकार देने के पक्ष में हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने मुख्य धारा की पार्टियों को यह चेतावनी भी दी है वे जनता के कोप को सहने व कश्मीर से बाहर कर दिए जाने की कीमत पर ही चुनावों की 'गंदी राजनीति' में शामिल हों। यह उस बहादुर व्यक्ति का बयान है जो अपने पिता के हत्यारे के बारे में चुप रहना स्वीकार करता है। उमर फारुख कहते हैं कि वे जनता की तरफ से बोल रहे हैं।

कौन सी जनता की बात कर रहे हैं वे? लगता है उन्होंने अपना गणित गलत बैठा लिया है, क्योंकि चुनाव अपने आप में आत्मनिर्णय के अधिकार के समान है। और ये चुनाव ही हैं जिससे वे डरते हैं जैसे कि गिलानी और उनके पाकिस्तानी आका डरते हैं। यही हाल महबूबा मुफ्ती और उनके पिता का है।

पाकिस्तान के अधिकार वाले कश्मीर और पाकिस्तान के अलगाववादियों, जेहादियों और आत्मनिर्णय के अधिकार के पैराकारों की तरह ही हमारे यहाँ के ऐसे तत्व भी चुनावों से डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि निष्पक्ष चुनावों के बाद उनका यह मोहरा भी वैसे ही बेकार जाएगा जैसे पूर्व के मोहरे इतिहास की चीज बन चुके हैं। न तो भारतीय राज्य न ही राज्य की जनता उनके कारणों पर विश्वास कर लेगी जो कि दिन-प्रतिदिन अनाकर्षक और भ्रष्ट होता जा रहा है।

श्रीनगर और कश्मीर के दूसरे हिस्सों में गड़बड़ियों की वजह से भीड़ में कुछ अति उत्साही और उच्च किस्म के लोग भले ही शामिल हो जाते हों पर वही जनता के असली प्रतिनिधि हैं, यह संदेहात्मक है, क्योंकि यह सब गुस्से में या भावावेश में की हुई कार्रवाइयाँ हैं। जम्मू की स्थितियाँ अलग हैं। वहाँ संघ परिवार के लोग चुनाव जीतने का आधार मानकर घृणा और क्षेत्रीय विद्वेष फैलाने का काम कर रहे हैं।

विरोधी प्रवृत्ति के लोगों का कहना है कि तनावों के वर्तमान हालात में चुनाव करवाना सही नहीं है। पर यही लोग अपने पर्चों में यह माँग कर कि मुजफ्फराबाद के व्यावसायिक रास्ते को तुरंत ही खोल देना चाहिए ,धार्मिक कट्टरता फैलाने का काम कर रहे हैं। जैसे कि इसके लिए इस्लामाबाद पहले से तैयार बैठा है और भारत को बस 'खुल जा सिम सिम' कहना है। यह उनका भोलापन नहीं बल्कि मिथ्यावादिता है। चुनावों पर किसी भी प्रकार से रोक नहीं लगनी चाहिए और जो लोग इसमें शामिल नहीं होते उन्हें अपने भविष्य की फिक्र खुद करनी है।

और अगर चुनावों के दौरान हिंसा होती है तो इसके लिए जिम्मेदार तत्वों को ही जवाब देना होगा और इसका परिणाम भी भुगतना होगा। जो लोग इसके बावजूद आत्मनिर्णय और आजादी की बात करते हैं तथा सहयोग के लिए पाकिस्तान का मुँह देखते हैं उन्हें एक बार पाकिस्तान के अधिकार वाले कश्मीर, आदिवासी इलाकों, उत्तरी इलाकों तथा पाकिस्तान के खुद के हालात की ओर एक बार देख लेना चाहिए। लोग इस सच्चाई की ओर नजर दौड़ाते हैं या तो बात बदल देते हैं या फिर चुप हो जाते हैं।
इसका मतलब यह कतई नहीं है कि स्व-शासन, क्षेत्रीय भेदभाव, मानव अधिकारों और विकास के मुद्दे पर बात ही नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसमें वास्तविक समस्याओं को उठाया जाना चाहिए, समस्याओं के समाधान निकालने की कोशिश होनी चाहिए और अतीत के बजाय भविष्य की चिंता होनी चाहिए।

नेशनल कांफ्रेंस ने समस्या के समाधान के लिए जल्द चुनावों की माँग कर बुद्धिमता और साहस का परिचय दिया है। कांग्रेस का रवैया बहुत ही ढुलमुल रहा है। वह इस मुद्दे को चुनाव आयोग पर छोड़कर देर से चुनाव के पक्ष में है। उन्हें लगता है कि चुनाव अगर देर से हुए तो जम्मू में उन्हें इसका फायदा मिलेगा जोकि सही नहीं है। उल्टे इसका मतलब यह निकल कर आएगा कि चूँकि कांग्रेस के पास कुछ कहने को नहीं है इसलिए वह चुनावों से भाग रही है।

राज्यपाल ने अलगाववादियों सहित सबको बातचीत का निमंत्रण देकर बुद्धिमता का परिचय दिया है। स्व-शासन और सीमा के दोनों तरफ सहयोग को लेकर अमृतसर फार्मूले के साथ ही प्रधानमंत्री की टास्क फोर्स रिपोर्ट भी तैयार है। ये दोनों ही तरफ के लोगों और पार्टियों को उत्साहित कर सकता है और इससे मनमोहन-जरदारी के बीच शांति वार्ता की राह तैयार हो सकती है। इस बीच भाजपा ने जम्मू-श्रीनगर-अमरनाथ सड़क मार्ग के राष्ट्रीयकरण की माँग करके अपने गैरजिम्मेदाराना रवैये के पुराने इतिहास को भी पीछे छोड़ दिया है।

यह हिन्दुत्व को चुनावी रणनीति बनाने की उनकी राजनीति को दर्शाता है और लगता है आडवाणी एक बार फिर समाज को बाँटने वाली अपनी यात्रा पर निकलने की तैयारी में हैं। कांग्रेस और दूसरी पार्टियाँ हज, कैलाश-मानसरोवर यात्रा और दूसरे तीर्थ यात्राओं को धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अनुदान देकर आस्था को व्यवसाय में तब्दील कर कोई भला नहीं कर रहीं हैं। आस्था को लेकर जिस प्रकार सरकार धार्मिक प्रबंधन में जुटी है उससे राज्य और धर्म के बीच का अंतर मिटता जा रहा है।

अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के आदिवासी इलाकों में आतंकवादियों के ऊपर हमले और आईएईए द्वारा अब्दुल कादिर खान की परमाणु बम की कालाबाजारी संबंधी नए खुलासों से उसकी स्थितियाँ और भी खराब हो गई हैं। ऐसे में भारत के हित में यही होगा कि वह पाकिस्तान में किसी लोकतांत्रिक सरकार को ही समर्थन दे। द्वि राष्ट्र के सिद्धांत और दूसरे विभाजन को फिर से उभारने के लिए कश्मीर को छोड़कर निकलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।

भारतीय संविधान की धारा 258 और 258 ए के तहत बृहतर स्व-शासन और क्षेत्रीय स्व-शासन जैसे द्विपक्षीय समझौतों से विश्वास का माहौल बनाया जा सकता है। उत्तर-पूर्वी राज्यों खासकर नगालैंड में इसका इस्तेमाल पूर्व में किया जा चुका है और उसका सकारात्मक प्रभाव भी देखने में आया है। स्व-शासन से ही उनके भीतर विश्वास पैदा होगा अतः छोटी-मोटी कानूनी बाध्यताओं को धता बताते हुए विश्वास बनाया जाना ज्यादा जरूरी है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं)
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