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जरदारी की मुश्किलें भी कम नहीं हैं
बेनजीर भुट्‍टो की रुह को मिलेगा सुकून
संदीप तिवारी
बेनजीर भुट्‍टो को दफनाए जाने के कुछ दिनों बाद पार्टी के शोकसंतप्त कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के सह अध्यक्ष और प्रमुख रणनीतिकार आसिफ अली जरदारी ने कहा था कि हम पीपीपी को न केवल प्रधानमंत्री हाउस तक पहुँचाएँगे वरन् पीपीपी नेता बेनजीर भुट्‍टो की तस्वीरें राष्ट्रपति कार्यालय में भी लटकती दिखेंगी।

  जरदारी ने जिस होशियारी से जजों की बहाली के मुद्दे पर नवाज शरीफ को किनारे लगा दिया, उसकी तुलना में राष्ट्रपति पद के दावेदार असफंदर वली खान के नाम पर रोक लगाना तो बहुत छोटा काम था। जरदारी ने यह काम करके राष्ट्रपति पद हासिल कर लिया      
उस समय भी उनके कहने का मतलब बिल्कुल साफ था कि जब तक परवेज मुशर्रफ राष्ट्रपति हैं तब तक राष्ट्रपति कार्यालय और एवान ए सदर (राष्ट्रपति निवास) में बेनजीर की तस्वीर नहीं लग पाएगी लेकिन समय आने पर पीपीपी अपना राष्ट्रपति चुनवा लेगी और इस तरह बेनजीर की तस्वीरें प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ साथ राष्ट्रपति कार्यालय में भी‍ दिखेंगी। पिछले शनिवार को हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद बेनजीर भुट्‍टो की तस्वीरें राष्ट्रपति भवन में भी नजर आने लगी हैं।

पत्नी की मौत के करीब आठ माह बाद जरदारी राष्ट्रपति बने हैं, यह बात उन्होंने पहले ही सोच रखी थी। हालाँकि जरदारी पहले कह चुके थे कि वे राष्ट्रपति नहीं बनेंगे लेकिन उन्होंने पहले से तयशुदा योजना के तहत सोचा होगा कि प्रधानमंत्री के बाद अगर राष्ट्रपति भी पीपीपी का हो तो कितना अच्छा रहेगा।

उन्होंने यह भी सोच रखा होगा कि इससे बीबी (बेनजीर भुट्‍टो) की रूह को कितना सुकून मिलेगा कि वे खुद भी नहीं सोचती होंगी कि उनके शौहर इस देश मुल्क के सदर (राष्ट्रपति) बनेंगे लेकिन बीबी की मौत ने यह भी संभव कर दिखाया।

चूँकि पंजाबी प्रधानमंत्री के बाद राष्ट्रपति को किसी दूसरे सूबे से होना चाहिए था, इसलिए इस योजना के तहत जरदारी ने खुद ही राष्ट्रपति बनने की सोची क्योंकि वे बेनजीर की आत्मा को कष्ट पहुँचाना नहीं चाहते थे। हालाँकि पीएमएल-नवाज पार्टी के प्रमुख नवाज शरीफ ने अपना उम्मीदवार खड़ा भी कर दिया लेकिन जरदारी ने अपने पक्ष में पर्याप्त समर्थन जुटा लिया और उनके चुना जाना संभव हुआ।

मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के प्रमुख अल्ताफ हुसैन भी कह चुके थे कि जम्हूरियत के लिए बेनजीर भुट्‍टो के त्याग को देखते हुए मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि जरदारी को ही राष्ट्रपति बनना चाहिए।

नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस (एनडब्ल्यूएफपी) की अवामी नेशनल पार्टी के लीडर असफंदर वली खान (जो कि सीमांत गाँधी खान अब्दुल गफ्फार खान के बेटे हैं) का नाम राष्ट्रपति पद के लिए सोचा गया था, लेकिन जरदारी ने जिस होशियारी से जजों की बहाली के मुद्दे पर नवाज शरीफ को किनारे लगा दिया, उसकी तुलना में असफंदर वली खान के नाम पर रोक लगाना तो बहुत छोटा काम था। उन्होंने और भी छोटी-छोटी पार्टियों का समर्थन जुटाकर यह सुनिश्चित कर लिया कि वे ही अगले राष्ट्रपति बनने वाले हैं।

जरदारी ने पहले मुशर्रफ को किनारे लगाने का काम किया और फिर जजों की बहाली के मुद्‍दे पर नवाज शरीफ को मात दी और वे चाहेंगे कि जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपने हों तो जल्द चुनाव कराने की क्या जरूरत है? दोनों नेताओं के बीच मेल मिलाप का दौर खत्म हो गया और पाकिस्तान अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगा है, लेकिन सत्ता की राजनीति की इस उठापटक से देश की अर्थव्यवस्था पर खराब असर पड़ रहा है।

  मुशर्रफ ने विदेशी मुद्रा भंडार को 16 अरब डॉलर तक पहुँचा दिया था लेकिन अब यह 9 अरब डॉलर से नीचे पहुँच गया है। व्यापार घाटा करीब 20 अरब डॉलर तक पहुँच गया है और पाकिस्तान का वित्तीय घाटा जीडीपी के करीब 5 फीसदी तक पहुँच गया है      
मुशर्रफ ने विदेशी मुद्रा भंडार को 16 अरब डॉलर तक पहुँचा दिया था लेकिन अब यह 9 अरब डॉलर से नीचे पहुँच गया है। व्यापार घाटा करीब 20 अरब डॉलर तक पहुँच गया है और पाकिस्तान का वित्तीय घाटा जीडीपी के करीब 5 फीसदी तक पहुँच गया है। कुछेक महीने में रुपए की कीमत में 10 फीसदी से ज्यादा कमी आई है। बिजली की कमी से हालत खराब हैं और पाकिस्तान का कर्ज बढ़ता जा रहा है। देश में महँगाई पिछले एक साल में ही 25 फीसदी तक बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में भी लोगों को सरकार से कोई राहत मिलती नजर नहीं आती है।
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