इनका उत्सर्जन सबसे ज्यादा विकसित देश कर रहे हैं। अब विकासशील देशों की बारी आई तो वे परेशान भी हुए और उन्हें एक नया बाजार भी दिखा। स्वच्छ तकनीक के नाम पर इन देशों ने नए-नए उपकरण, नई-नई मशीनें तैयार की हैं, लेकिन ये बिकें कैसे, इसके लिए रास्ता ढूँढा जा रहा था।
बौद्धिक संपदा अधिकार मिलने पर खरीददार देश मशीनरी अपने यहाँ बना सकता है, लेकिन अमेरिका जैसे देश कह रहे हैं कि मशीनों का उत्पादन निजी कंपनियाँ करती हैं जबकि भारत का कहना है कि मशीनरी सीडीएम यानी क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (स्वस्थ विकास प्रक्रिया) की तरह आनी चाहिए। इस रास्ते से मशीनें परियोजना के रूप में आती हैं, जो मुफ्त या सस्ती होती हैं। यह व्यवस्था लचीली भी है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के प्रति औद्योगिक देशों ने मनमोहनसिंह के इस सुझाव की ओर विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसमें कहा गया कि तेल की बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए तेल उत्पादक देशों और उपभोक्ताओं का सतत जीवित संवाद होना चाहिए। सम्मलेन ने अल्पकालीन उपाय के रूप में तेल उत्पादन बढ़ाने और तेल परिष्करण क्षमता बढ़ाने का सुझाव देकर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर ली।
सम्मेलन ने विश्व बैंक की इस चिंता की ओर भी कोई ध्यान नही दिया जिसके | | विडंबना तो यह है कि अफ्रीका के देश जो सबसे कम गैस उत्सर्जन कर रहे हैं वे ही विकसित देशों के गैस उत्सर्जन के कारण हुए वैश्विक तापमान वृद्धि का अभिशाप सह रहे हैं |
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अनुसार जैव ईंधन के इस्तेमाल से दुनिया में खाद्य पदार्थों की कीमतों में 75 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। विश्व बैंक की गोपनीय रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि अमेरिका और योरप के कई देशों ने पर्यावरण के लिए घातक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने और आयातित तेल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए जैव ईंधन का इस्तेमाल शुरू किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2002 से फरवरी 2008 तक अनाज के दामों में 140 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी से खाद्यान्न के दामों में सिर्फ 15 प्रतिशत का ही इजाफा हुआ जबकि जैव ईंधन के इस्तेमाल से इन चीजों में महँगाई 75 प्रतिशत तक बढ़ी। रिपोर्ट में कहा गया है कि जैव ईंधन के उत्पादन ने खाद्यान्न के बाजार का मिजाज ही बदल दिया है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में चाहे कितनी ही मक्का उगाई जाए और कितना ही बायो ईंधन बनाया जाए फिर भी वहाँ 12 प्रतिशत ही बायो ईंधन मिल पाएगा। बायो डीजल भी एक ग्रीन हाउस गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन करता है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है। यदि खाद्यान्नों को जैव ईंधन बनाने की ओर मोड़ा जाए तो सन् 2025 तक दुनिया में 60 करोड़ लोग भूख से पीड़ित हो जाएँगे।
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ एक ओर जॉर्ज बुश ने विश्व में खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए भारत और चीन में अनाज के अतिभोग को जिम्मेदार ठहराया था, वहीं दूसरी ओर विश्व बैंक की रिपोर्ट ने अमेरिका को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट कहती है कि विश्व में खाद्यान्न के उपयोग और कीमतों में वृद्धि के लिए विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय में हुई बढ़ोतरी कतई जिम्मेदार नहीं है, बल्कि यह तो विकसित देशों में जैव ईंधन इस्तेमाल किए जाने का नतीजा है।
विडंबना तो यह है कि अफ्रीका के देश जो सबसे कम गैस उत्सर्जन कर रहे हैं वे ही विकसित देशों के गैस उत्सर्जन के कारण हुए वैश्विक तापमान वृद्धि का अभिशाप सह रहे हैं। इतिहासकार यह भी लिखेगा कि भूमंडलीकरण के कारण विकासशील देशों का लाभ मिलना तो दूर, नुकसान ही होता है। (लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं।) |