उम्मीद की जाती थी कि गत सप्ताह बुधवार को उत्तरी जापान के पर्वतीय रिसॉर्ट सप्पोरो में संपन्न हुई समूह-8 की बैठक में जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतें, अफ्रीका का विकास, आतंकवाद और वित्तीय अस्थिरता जैसी ज्वलंत समस्याओं के सार्थक समाधान के प्रति समयबद्ध कार्यक्रम तैयार किए जाएँगे।
लेकिन हमेशा की तरह इस बार भी समूह-आठ का शिखर सम्मेलन सिवाय प्रतीकात्मक संकेतों से परिपूर्ण घोषणा-पत्र के साथ संपन्न हुआ। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और मैक्सिको के भी इस बैठक में भाग लेने के कारण 8+5=0 नाम दिया गया। सम्मेलन में सबसे अधिक तरजीह ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन को दी गई।
घोषणा-पत्र में कहा गया कि इन दोनों वैश्विक चुनौतियों से निपटने में प्रौद्योगिकी समेत महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए नवीकरणीय स्वच्छ निम्न कार्बन उत्सर्जन आधारित प्रौद्योगिकी और परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने तथा इस्तेमाल को प्रोत्साहन देंगे। हम लगातार निवेश को प्रोत्साहन देने तथा स्वच्छ ऊर्जा अनुसंधान के क्षेत्र में सहयोग के उपकरण के तौर पर प्रौद्योगिकी रोडमैप के महत्व पर गौर कर रहे हैं।
हम विकसित एवं विकासशील समेत विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के नेता अपनी साझा लेकिन अलग-अलग दायित्व तथा अपनी-अपनी क्षमताओं के अनुसार जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।'
जलवायु परिवर्तन पर विकसित राष्ट्रों ने नेतृत्व प्रदान करते हुए 2050 तक
हैरत की बात तो यह है कि हमें योरपीय देश उपदेश दे रहे हैं कि यदि भारत, चीन, ब्राजील गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित कर लें तो वे अपनी गैसों को वर्ष 2020 तक 20 प्रतिशत और 2030 तक 30 प्रतिशत कम कर देंगे
कार्बन उत्सर्जन में 50 प्रतिशत कमी करने का लक्ष्य निर्धारित किया, लेकिन इसे भी अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने बजाय विशिष्ट लक्ष्य के इसे केवल दृष्टिपत्र की संज्ञा दी। गौर से देखा जाए तो विकसित राष्ट्रों का मंतव्य 1990 के क्योटो प्रोटोकोल से भिन्न नहीं है, जिसमें कहा गया था कि 2020 तक विकसित राष्ट्र अपने कार्बन उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत की कमी करेंगे।
लेकिन अमेरिका और खुद क्योटो प्रोटोकाल के सबसे बड़े पैरोकार जापान ने गैस उत्सर्जन में कटौती करने का वायदा नहीं निभाया। हैरत की बात तो यह है कि हमें योरपीय देश उपदेश दे रहे हैं कि यदि भारत, चीन, ब्राजील गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित कर लें तो वे अपनी गैसों को वर्ष 2020 तक 20 प्रतिशत और 2030 तक 30 प्रतिशत कम कर देंगे।
भारत में अभी प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन मात्र 0.87 टन है। यह अमेरिका के प्रति व्यक्ति उपभोग का 4 प्रतिशत, जर्मनी का 8 प्रतिशत, इंग्लैंड का 9 प्रतिशत और जापान का 10 प्रतिशत ही है। विकसित देशों ने भारत और चीन को उपदेश देते हुए कहा है कि इन दोनों देशों को अपने गैस उत्सर्जन को अधिक कम करना चाहिए।
लेकिन भारत का तर्क है कि विकासशील होने के नाते अभी उसे औद्योगिक विकास की आवश्यकता है। इंग्लैंड में यह बंद कर दिया गया है और जर्मनी में बंद होने वाला है। भारत के पास कोयले का विशाल भंडार है। यह कई वर्षों तक हमारी ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करेगा। इसलिए इस विषय पर भारत कोई समझौता नहीं कर सकता। विकसित देश खाना बनाने के लिए उपलों और लकड़ी के उपयोग पर एतराज जता रहे हैं।
असल में 8+5 के सम्मेलन में विकसित राष्ट्रों की मंशा कुछ और ही थी। दुनिया के सबसे बड़े औद्योगिक देशों के समूह जी-8 की यह बैठक मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के बहाने बहुत बड़े पूँजी निवेश से तैयार की गई मशीनरी को बेचने के लिए बाजार ढूँढना था।
इनका उत्सर्जन सबसे ज्यादा विकसित देश कर रहे हैं। अब विकासशील देशों की बारी आई तो वे परेशान भी हुए और उन्हें एक नया बाजार भी दिखा। स्वच्छ तकनीक के नाम पर इन देशों ने नए-नए उपकरण, नई-नई मशीनें तैयार की हैं, लेकिन ये बिकें कैसे, इसके लिए रास्ता ढूँढा जा रहा था।
बौद्धिक संपदा अधिकार मिलने पर खरीददार देश मशीनरी अपने यहाँ बना सकता है, लेकिन अमेरिका जैसे देश कह रहे हैं कि मशीनों का उत्पादन निजी कंपनियाँ करती हैं जबकि भारत का कहना है कि मशीनरी सीडीएम यानी क्लीन डेवलपमेंट मैकेनिज्म (स्वस्थ विकास प्रक्रिया) की तरह आनी चाहिए। इस रास्ते से मशीनें परियोजना के रूप में आती हैं, जो मुफ्त या सस्ती होती हैं। यह व्यवस्था लचीली भी है।
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के प्रति औद्योगिक देशों ने मनमोहनसिंह के इस सुझाव की ओर विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई जिसमें कहा गया कि तेल की बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए तेल उत्पादक देशों और उपभोक्ताओं का सतत जीवित संवाद होना चाहिए। सम्मलेन ने अल्पकालीन उपाय के रूप में तेल उत्पादन बढ़ाने और तेल परिष्करण क्षमता बढ़ाने का सुझाव देकर अपने कर्तव्य से इतिश्री कर ली।
सम्मेलन ने विश्व बैंक की इस चिंता की ओर भी कोई ध्यान नही दिया जिसके
विडंबना तो यह है कि अफ्रीका के देश जो सबसे कम गैस उत्सर्जन कर रहे हैं वे ही विकसित देशों के गैस उत्सर्जन के कारण हुए वैश्विक तापमान वृद्धि का अभिशाप सह रहे हैं
अनुसार जैव ईंधन के इस्तेमाल से दुनिया में खाद्य पदार्थों की कीमतों में 75 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। विश्व बैंक की गोपनीय रिपोर्ट में उजागर किया गया है कि अमेरिका और योरप के कई देशों ने पर्यावरण के लिए घातक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने और आयातित तेल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए जैव ईंधन का इस्तेमाल शुरू किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2002 से फरवरी 2008 तक अनाज के दामों में 140 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। ऊर्जा और उर्वरक की कीमतों में बढ़ोतरी से खाद्यान्न के दामों में सिर्फ 15 प्रतिशत का ही इजाफा हुआ जबकि जैव ईंधन के इस्तेमाल से इन चीजों में महँगाई 75 प्रतिशत तक बढ़ी। रिपोर्ट में कहा गया है कि जैव ईंधन के उत्पादन ने खाद्यान्न के बाजार का मिजाज ही बदल दिया है।
उल्लेखनीय है कि अमेरिका में चाहे कितनी ही मक्का उगाई जाए और कितना ही बायो ईंधन बनाया जाए फिर भी वहाँ 12 प्रतिशत ही बायो ईंधन मिल पाएगा। बायो डीजल भी एक ग्रीन हाउस गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन करता है, जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है। यदि खाद्यान्नों को जैव ईंधन बनाने की ओर मोड़ा जाए तो सन् 2025 तक दुनिया में 60 करोड़ लोग भूख से पीड़ित हो जाएँगे।
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ एक ओर जॉर्ज बुश ने विश्व में खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए भारत और चीन में अनाज के अतिभोग को जिम्मेदार ठहराया था, वहीं दूसरी ओर विश्व बैंक की रिपोर्ट ने अमेरिका को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट कहती है कि विश्व में खाद्यान्न के उपयोग और कीमतों में वृद्धि के लिए विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति आय में हुई बढ़ोतरी कतई जिम्मेदार नहीं है, बल्कि यह तो विकसित देशों में जैव ईंधन इस्तेमाल किए जाने का नतीजा है।
विडंबना तो यह है कि अफ्रीका के देश जो सबसे कम गैस उत्सर्जन कर रहे हैं वे ही विकसित देशों के गैस उत्सर्जन के कारण हुए वैश्विक तापमान वृद्धि का अभिशाप सह रहे हैं। इतिहासकार यह भी लिखेगा कि भूमंडलीकरण के कारण विकासशील देशों का लाभ मिलना तो दूर, नुकसान ही होता है। (लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री हैं।)