1. सामयिक
  2. »
  3. विचार-मंथन
  4. »
  5. विचार-मंथन
Written By ND

कश्मीर की आग में झुलसता जम्मू

अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन विवाद कश्मीर जम्मू
- बलराज पुरी

अमरनाथ श्राइन बोर्ड जमीन विवाद के मद्देनजर जम्मू में जो कुछ हुआ और बाद में सारे देश में इसकी जो प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं, उसके आलोक में यह विचार करना जरूरी है कि क्या यह सब सिर्फ एक धार्मिक मसला है? या उसके आगे भी कुछ है?

वास्तव में जमीन विवाद तो एक तुच्छ मामला है। यदि तीर्थयात्रियों को उनकी सुविधाएँ मिलती रहें तो फिर यह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता कि इनके पीछे सरकार की कितनी भूमिका है और श्राइन बोर्ड की कितनी। लेकिन इस मसले पर कश्मीर में जो उत्पात मचा, वह दरअसल उस हताशा और भ्रम का परिणाम अधिक है जो अलगाववादियों के बीच व्याप्त है।

इसके अलावा पृथकतावादी नई पाकिस्तानी सरकार के भारत के प्रति सकारात्मक रुख से भी काफी परेशानी का अनुभव कर रहे हैं। इससे यह साफ हो रहा है कि कश्मीर में पृथकतावाद को सिर्फ बाहर से हवा नहीं मिल रही है, बल्कि भारत में भी इसकी जड़ें फैली हुई हैं और इसलिए पृथकतावाद के देशी कारणों को समझना और दूर करना जरूरी है।

पहली बात, जम्मू में लंबे समय से जो असंतोष व्याप्त है, वह राजनीतिक अधिक है। इसे भड़काने के लिए सिर्फ एक चिंगारी की जरूरत रहती है। इस असंतोष को तभी दूर किया जा सकता है, जबकि जम्मू-कश्मीर के तीनों क्षेत्रों के हितों और अपेक्षाओं का ध्यान रखते हुए कोई संवैधानिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। कश्मीर में जहाँ पृथकतावादी और भारत विरोधी नारे बुलंद हैं तो जम्मू में इसकी प्रतिक्रिया में सांप्रदायिक उन्माद फैलता है और धारा 370 को हटाने जैसे नारे लगाकर एकता और अखंडता की वकालत की जाती है। अलग-अलग प्रतिक्रियाओं के इस कुचक्र में जम्मू में तनाव बढ़ता जा रहा है।

2002 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जम्मू क्षेत्र के निवासी गुलाम नबी आजाद को मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया था और तब उसे अच्छी जीत मिली तथा भाजपा मात्र एक सीट के साथ हाशिए पर चली गई थी। सरकार अस्तित्व में भी आ गई, लेकिन क्षेत्र की बुनियादी समस्याएँ वहीं की वहीं रहीं। जल्द ही जम्मू और कश्मीर दोनों क्षेत्रों से भेदभाव की शिकायतें सामने आने लगीं। इसी बीच कैबिनेट में भी क्षेत्रीयता को लेकर तनाव उभरते दिखा।

कई मुद्दों पर कैबिनेट क्षेत्रीयता की सीमा रेखा में बँटता दिखाई दिया। उदाहरण के लिए पीपुल डेमोक्रेटिक पार्टी नेता और वित्तमंत्री ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया कि सर्विस सिलेक्शन बोर्ड की भर्ती में और स्टेट विजिलेंस ऑर्गेनाइजेशंस द्वारा कश्मीरी मुसलमानों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। यही पीडीपी जो कि सरकार द्वारा श्राइन बोर्ड को जमीन आवंटित करने वाले निर्णय में सहयोगी थी, बाद में इसी निर्णय को वापस लेने के लिए हुए आंदोलन के साथ दिखाई दी।
दूसरी बात, देश के सबसे विविधतापूर्ण इस राज्य की व्यवस्था एक तरह से अत्यंत केंद्रीकृत है। नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच जुलाई 1952 में हुए क्षेत्रीय स्वायत्तता समझौते की बात करना तो दूर, राज्य में पंचायती राज जैसी विकेंद्रीकृत व्यवस्था आज तक लागू नहीं हुई है, जो कि देश के शेष भागों में आगे बढ़ती जा रही है। आज मुख्यमंत्री का बहुत-सा समय उन स्थानीय मुद्दों को हल करने में लग जाता है, जो वास्तव में पंचायत स्तर के होते हैं।

इसी तरह यहाँ कोई रीजनल बोर्ड, जिला बोर्ड या ब्लॉक स्तर का बोर्ड नहीं है, जो अपने स्तर पर जनसमस्याओं का निराकरण कर सके। हालाँकि कांग्रेस सरकार विकास को मुख्य मुद्दा बनाती रही है, लेकिन इससे जनता की तकलीफें दूर नहीं हुई हैं। आज भी वहाँ विभिन्न स्तरों पर धर्मनिरपेक्ष विधिसम्मत फोरम की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

असल में धर्मनिरपेक्ष परंपराएँ और पहचान ही जम्मू की ताकत रही हैं। जमीन विवाद को हिन्दू समस्या बनाकर नेता लोग जम्मू के हितों को नुकसान ही पहुँचा रहे हैं। आज केंद्रीय व्यवस्था में जम्मू क्षेत्र के हिन्दुओं के साथ ही मुसलमान भी राजनीतिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ गए हैं। जम्मू क्षेत्र के भदरवाह, राजौरी, बनिहाल और साम्बा इलाकों में सांप्रदायिक दंगे हो चुके हैं।

यदि यही हाल रहा तो राज्य के बँटवारे की बात उठ सकती है, जो कि न तो जम्मू के हित में होगी और न ही कश्मीर के। शायद इसी तथ्य को समझते हुए मुस्लिम कट्टरपंथी यह कहते हैं कि वे न तो यात्रा के खिलाफ हैं और न ही हिन्दुओं के। उनका विरोध तो सरकार से है।

चूँकि जम्मू भौगोलिक रूप से कश्मीर के लोगों को शेष भारत से जोड़ने का एक सेतु है इसलिए उन्हें कश्मीरी अलगाववादियों और सरकारी फैसलों पर विरोध जताते हुए भी सेतु वाली अपनी भूमिका को नहीं भूलना चाहिए। उन्हें संघर्ष के शांतिपूर्ण और अनुशासित मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जो हिंसक प्रदर्शनों से कहीं बेहतर है उन्हें मजबूत बनाने के लिए।
( लेखक कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ हैं।)
लेखक के बारे में
ND