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काबुल में फौज भेजने का मौका  Search similar articles
- वेदप्रताप वैदिक

भारतीय दूतावास पर जैसा हमला काबुल में हुआ, वैसा हमारे किसी दूतावास पर दुनिया में कभी नहीं हुआ। ब्रिटेन में हमारे राजनयिक रवीन्द्र म्हात्रे का पहले अपहरण और फिर हत्या हुई, लेकिन हमारे दूतावास में घुसकर हमारे राजनयिकों की हत्या की हिमाकत पहली बार हुई है। भारतीय दूतावास का उल्लंघन भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है।

अंतरराष्ट्रीय कानून का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि किसी भी दूतावास का
  यदि भारत सरकार अपने दूतावास और अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ है तो उसे सोचना होगा कि वह अफगानिस्तान में अपना सहायता कार्यक्रम जारी रखे या न रखे। इस समय भारत लगभग एक अरब डॉलर के सहायता कार्यक्रम अफगानिस्तान में चला रहा है      
परिसर उसके देश की भूमि का हिस्सा माना जाता है। इसीलिए भारतीय दूतावास पर किया गया यह हमला भारत पर किए गए हमले से कम नहीं है। अफगानिस्तान में जितनी भी भारतीय गतिविधियाँ चल रही हैं, उनका दिल और दिमाग हमारा दूतावास है और अगर दिल और दिमाग ही सुरक्षित नहीं है तो शरीर को धराशायी होते कितनी देर लगेगी?


यदि भारत सरकार अपने दूतावास और अपने नागरिकों की रक्षा करने में असमर्थ है तो उसे सोचना होगा कि वह अफगानिस्तान में अपना सहायता कार्यक्रम जारी रखे या न रखे। इस समय भारत लगभग एक अरब डॉलर के सहायता कार्यक्रम अफगानिस्तान में चला रहा है, जिनमें कुछ गैर-सरकारी कंपनियाँ भी शामिल हैं।

अफगानिस्तान की सहायता करने वाले दुनिया के पाँच मालदार देशों के बाद अगर किसी का नंबर आता है तो वह भारत का ही आता है। भारत के मुकाबले रूस और चीन की मदद भी बहुत कम है। जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है, वह पाँच अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार अफगानिस्तान से कर रहा है और बेतहाशा मुनाफा उलीच रहा है लेकिन वह अपने इस पड़ोसी देश को उसके पाँवों पर खड़े करने में कोई खास मदद नहीं कर रहा है। तो क्या भारत भी अपना हाथ खींच ले?

यदि भारत अपना हाथ खींचना चाहे तो उसे कौन रोक सकता है? वह काबुल
  हम कैसी महाशक्ति हैं, जो सेवा-संधान के लिए तैयार हैं, लेकिन शक्ति-संधान से बिदकते हैं? क्या यह विचित्र नहीं कि हजारों मील दूर से आकर हमारे क्षेत्र पर अमेरिका हावी है और हम धेनु-मुद्रा धारण किए हुए हैं? हम सिंह-मुद्रा कब धारण करेंगे?      
का राजदूतावास किसी बाबू के हवाले करके सारे राजनयिकों को वापस बुला सकता है, जैसा कि तालिबान-शासन के दिनों में हमने किया था। कंधार, जलालाबाद, हेरात और मजारे-शरीफ के वाणिज्य-दूतावास भी बंद कर सकता है। अपने चार हजार भारतीयों और भारत-तिब्बत फोर्स के 500 जवानों को घर लौटा सकता है।


सड़कें, बाँध, स्कूल, अस्पताल, टेलीफोन एक्सचेंज आदि बनाने की सारी परियोजनाएँ बंद कर सकता है। जब अफगानिस्तान में भारतीय होंगे ही नहीं तो तालिबान किस पर हमला करेंगे? हमारे लगभग पचास साल पुराने दूतावास भवन और राजदूत के मकान पर तालिबान पहले हमला कर चुके हैं और किराए के इन मकानों पर अब वे हमला या कब्जा कर लें तो भी हमारा क्या बिगड़ने वाला है?

हमारा पिंड छूटेगा। हमारे अरबों रुपए बचेंगे और हमारे राजनयिकों, इंजीनियरों, मजदूरों, जवानों की जान भी नहीं जाएगी। बिलकुल इसी तरह के तर्क पिछले सालभर से कनाडा की संसद में भी दिए जा रहे हैं। कनाडा के जो थोड़े-से जवान अंतरराष्ट्रीय फौज में काम कर रहे हैं, उनकी वापसी के लिए कनाडा बेताब है।

लेकिन भारत कनाडा नहीं है और भारत के लिए अफगानिस्तान सात समुंदर
  अफगानिस्तान में भारत की संपन्नता और सुरक्षा की कुंजी छिपी है, क्या भारत यह भूल जाए? क्षेत्रीय महाशक्ति की भूमिका निभाने का दम भरने वाला भारत क्या ऐसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपना सकता है? बिलकुल नहीं अपना सकता है      
पार नहीं बसा हुआ है। सचाई तो यह है कि भारत अफगानिस्तान का जुड़ा हुआ पड़ोसी है। यदि 'आजाद कश्मीर' पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा नहीं होता तो भारत और अफगानिस्तान की साझी सीमा 100 किमी से भी ज्यादा होती। यूँ भी सैकड़ों वर्षों से भारत और अफगानिस्तान एक-दूसरे के पड़ोसी रहे हैं।


अभी एक हजार साल पहले तक भारत और अफगानिस्तान में कोई फर्क नहीं था। भारत अफगानिस्तान था और अफगानिस्तान भारत था। सिर्फ 60 साल पहले दोनों राष्ट्रों के बीच पाकिस्तान आ खड़ा हुआ। पाकिस्तान ने भारत और अफगानिस्तान, दोनों को नष्ट करने की कोशिशें कीं। हमले किए, तोड़फोड़ की, आतंकवाद फैलाया, बाहरी शक्तियों को बुलवाया।

उसने अफगानिस्तान की अराजकता का लाभ उठाकर उसे भारत-विनाश का अड्डा बना दिया। वह विश्व-आतंकवाद का प्रसूतिगृह बन गया। पाकिस्तान की विध्वंसात्मक विदेश नीति ने भारत के स्वाभाविक रास्ते भी रोक दिए। मध्य एशिया के गैस-तेल तथा अन्य खनिजों की अपार संपदा के लाभ से भारत वंचित हो गया। अफगानिस्तान में भारत की संपन्नता और सुरक्षा की कुंजी छिपी है, क्या भारत यह भूल जाए? क्षेत्रीय महाशक्ति की भूमिका निभाने का दम भरने वाला भारत क्या ऐसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया अपना सकता है? बिलकुल नहीं अपना सकता है।

इसके विपरीत आज भारत को कठोरतम निर्णय के लिए तैयार होना चाहिए। यह काफी नहीं है कि दिलाराम-जरंज सड़क बनाने वाले मजदूरों और दूतावासों की रक्षा के लिए हमने 500 जवान तैनात कर दिए। चार हजार भारतीयों के लिए चार हजार जवान भेजना भी काफी नहीं है। यह आत्मरक्षात्मक दब्बूपन हमें छोड़ना होगा।

जरूरी यह है कि अफगानिस्तान में भारत लगभग एक लाख जवान तुरंत भेजे। अफगान-सरकार के निमंत्रण पर भेजे गए ये जवान नाटो के 60 हजार जवानों के मुकाबले कहीं अधिक प्रभावशाली सिद्ध होंगे। जो काम नाटो के जवान सात साल में नहीं कर सके, उसे भारतीय जवान सात महीनों में कर दिखाएँगे। अफगानिस्तान में हमें सिर्फ हमारे कार्मिकों की रक्षा ही नहीं करनी है, बल्कि आतंकवाद की जड़ भी उखाड़नी है।

यह हमारी अंदरूनी फौजी कार्रवाई का ही विस्तार होगा। इसमें पाकिस्तान भी हमारा साथ देगा, क्योंकि आतंकवाद अब हम से ज्यादा उसे तंग कर रहा है। भारतीय फौज यदि अफगानिस्तान में पाँच साल भी रह गई तो वह बकायदा एक अफगान-फौज भी खड़ी कर देगी। भारत चाहे तो नाटो शक्तियों को सारा खर्चा उठाने को राजी कर सकता है। क्या वर्तमान सरकार इतनी गहरी और दूरंदेशी कूटनीति चला सकती है?

1998 के परमाणु-विस्फोट के बाद यह दूसरा मौका है, जब भारत अपने महाशक्ति होने का शंखनाद कर सकता है। जो लक्ष्य बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव में फौजें भेजकर भारत सिद्ध नहीं कर सका, वे लक्ष्य अब अफगानिस्तान में सिद्ध होंगे। भारतीय विदेश नीति की असीम संभावनाओं के द्वार खुल पड़ेंगे।

जनवरी 1981 में जब प्रधानमंत्री बबरक कारमल ने मुझसे भारतीय फौज काबुल भिजवाने का अनुरोध किया था तो मैंने उन्हें अनेक कारण गिनाए थे, नहीं भिजवाने के लिए। हमारी प्रधानमंत्री इंदिराजी भी उन कारणों से सहमत थीं, लेकिन अब हालात बिलकुल बदल गए हैं। यह कितनी विचित्र बात है कि हम अफगानिस्तान में अरबों रुपया बहाने को तैयार हैं, लेकिन फौज भेजने के बारे में सोचते भी नहीं।

हम कैसी महाशक्ति हैं, जो सेवा-संधान के लिए तैयार हैं, लेकिन शक्ति-संधान से बिदकते हैं? क्या यह विचित्र नहीं कि हजारों मील दूर से आकर हमारे क्षेत्र पर अमेरिका हावी है और हम धेनु-मुद्रा धारण किए हुए हैं? हम सिंह-मुद्रा कब धारण करेंगे?
(लेखक अफगानिस्तान मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ हैं।)
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