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ब्‍लॉग-चर्चा में आज अनामदास का चिट्ठा
इसी पोस्‍ट में आगे वे लिखते हैं, - 'स्‍त्री स्‍वरूप की पूजा तभी हो सकती है जब वह शेर पर सवार हो, उसके हाथों में तलवार-कृपाण-धनुष-बाण हो या फिर उसे जीते-जी जलाकर सती कर दिया गया हो, दफ़्तर जाने वाली, घर चलाने वाली, बच्चे पालने वाली, मोपेड चलाने वाली औरतें तो बस सीटी सुनने या कुहनी खाने के योग्य हैं।'

ये तो कुछ थोड़े से उदाहरण हैं। ऐसे तमाम मुद्दों पर अनामदास की पैनी और सटीक नजर है। किसी भी मुद्दे का एक सही, पूर्वाग्रह मुक्‍त और ईमानदार विश्‍लेषण अनामदासजी के चिट्ठे की खासियत है। भावुकतापूर्ण कविताएँ, आत्‍माख्‍यान से मुक्‍त ये ब्‍लॉग उन तमाम सवालों पर बात करता है, जिस पर आमतौर पर बात नहीं की जाती, या कि जिस पर बात न किए जाने के लिए भी एक मौन सहमति है।

भारत की नैतिकता गई तेल लेने, कृषि प्रधान देश की सेवा प्रधान संस्‍कृति और हमारी अपनी जबान की साठवीं बरसी जैसी कुछ पोस्‍ट इस ब्‍लॉग की बेहतरीन पोस्‍ट हैं। समाज, जीवन और संस्‍कृति की विडंबनाओं, जीवन के दोहरे चेहरों और चरित्रों पर अनामदास उँगली रखते हैं।
  'स्त्री स्वरूप की पूजा तभी हो सकती है जब वह शेर पर सवार हो, उसके हाथों में तलवार-कृपाण-धनुष-बाण हो या फिर उसे जीते-जी जलाकर सती कर दिया गया हो, दफ़्तर जाने वाली, घर चलाने वाली, बच्चे पालने वाली औरतें तो बस सीटी सुनने या कुहनी खाने के योग्य हैं।'      
बातें बहुत बार व्‍यंग्‍य की शैली में होती हैं, लेकिन उसे उस तरह के हास्‍य व्‍यंग्‍य का नाम नहीं दिया जा सकता, जिसे आप सुनें और हँसी में उड़ा दें। ये जरूर मखौल है उस दुनिया का, जिसमें रहते हैं और जिसके गुण गाते हैं, लेकिन जिसका असली चेहरा समाज के पॉपुलर महिमामंडित चेहरे से ठीक उलट है।


जो चीजों को ठीक-ठीक वैसा ही समझना चाहते हैं, जैसी कि वे हैं, जो गौरव-गाथाओं में, महिमामंडन में आकंठ डूबे हुए नहीं हैं, जिनके भीतर एक ऑब्‍जर्वर है, जो बारीकी से दुनिया को देखना और समझना चाहता है, जो कुछ बेहतर और ईमानदार-सा पढ़ना चाहते हैं, वे इस अनाम ब्‍लॉग पर आएँ, जो यूँ तो अनामदास का ब्‍लॉग है, लेकिन जिसके साथ परिचय और अपनापे का रिश्‍ता बनने में बहुत वक्‍त भी नहीं लगता।

ब्‍लॉग - अनामदास का चिट्ठा
URL - http://anamdasblog.blogspot.com/
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